डीईओ के विकल्प पर तबादले ने खोली शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली की परतें, अब सवाल मंत्री गजेन्द्र यादव, शिक्षा सचिव डॉ कमलप्रीत सिंह की कार्यशैली पर भी…करीब 700 शिक्षक-व्याख्याताओं के स्थानांतरण को लेकर शिक्षक संघों का मोर्चा, मुख्यमंत्री समन्वय से हुए निर्णय की निष्पक्ष जांच की मांग; मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव और सचिवालय में शिक्षा विभाग देख रहे संयुक्त सचिव प्रभात मलिक के सामने बड़ी जिम्मेदारी।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में हाल ही में जारी स्थानांतरण आदेश अब सामान्य प्रशासनिक कवायद से आगे बढ़कर सरकार की निर्णय प्रक्रिया और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने लगा है। करीब 700 शिक्षक एवं व्याख्याताओं के स्थानांतरण से जुड़े आदेश में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को स्पष्ट पदस्थापना देने के बजाय जिला शिक्षा अधिकारी यानी डीईओ के विकल्प पर भेजे जाने को लेकर विभिन्न शिक्षक संगठनों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है। मामला केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि किस शिक्षक का तबादला कहां हुआ, बल्कि असली सवाल यह है कि स्थानांतरण की पूरी प्रक्रिया किस आधार पर तैयार की गई, किन मापदंडों को अपनाया गया और जब प्रशासनिक स्थानांतरण का दावा किया गया तो बड़ी संख्या में कर्मचारियों को अंतिम पदस्थापना से वंचित रखकर डीईओ के विकल्प पर भेजने की आवश्यकता क्यों पड़ी।स्थानांतरण आदेश सामने आने के बाद शिक्षक संगठनों की नाराजगी लगातार बढ़ रही है। संगठनों का सवाल है कि यदि विभाग ने स्थानांतरण के लिए प्रशासनिक आवश्यकता, रिक्त पद, विषयवार आवश्यकता और विद्यालयों की वास्तविक स्थिति को आधार बनाया था तो आदेश में पदस्थापना को स्पष्ट करने के बजाय डीईओ के विकल्प की व्यवस्था क्यों रखी गई। यह व्यवस्था आगे चलकर किस प्रकार लागू होगी, डीईओ किन आधारों पर पदस्थापना तय करेंगे और क्या उस प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं, इन सवालों का जवाब फिलहाल सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं दिखाई देता।यहीं से इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी सामने आती है। बताया जा रहा है कि स्थानांतरण प्रक्रिया मुख्यमंत्री समन्वय से जुड़ी हुई है। यदि यह तथ्य आधिकारिक अभिलेखों से पुष्ट होता है, तो फिर मामले की जवाबदेही केवल स्कूल शिक्षा विभाग तक सीमित नहीं रह जाती। मुख्यमंत्री समन्वय से जुड़े किसी भी प्रशासनिक निर्णय में प्रस्ताव किस स्तर पर तैयार हुआ, विभाग ने क्या अनुशंसा की, किन अधिकारियों ने फाइल पर क्या टिप्पणी की, मुख्यमंत्री स्तर पर किन बिंदुओं को अनुमोदन मिला और अंतिम स्थानांतरण आदेश किस आधार पर तैयार हुआ, इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी हो जाती है। यही वह स्तर है जहां से अब इस विवाद का वास्तविक सच सामने आ सकता है।इस पूरे घटनाक्रम ने स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव , स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव डॉ कमलप्रीत सिंह की कार्यप्रणाली को लेकर भी राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि किसी भी व्यक्ति पर अनियमितता का निष्कर्ष जांच के बिना निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन जब एक ही आदेश को लेकर बड़ी संख्या में शिक्षक संगठन सवाल उठा रहे हों और स्थानांतरण की प्रक्रिया में डीईओ के विकल्प जैसी व्यवस्था पर आपत्ति सामने आ रही हो, तब मंत्री के नेतृत्व वाले विभाग से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह प्रत्येक सवाल का दस्तावेजी जवाब दे। विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि स्थानांतरण की आवश्यकता का आकलन कैसे हुआ, प्रस्ताव किस स्तर पर तैयार किया गया, पात्रता और प्राथमिकता का निर्धारण किस आधार पर किया गया तथा डीईओ के विकल्प पर भेजे गए कर्मचारियों के लिए आगे की पदस्थापना की प्रक्रिया क्या होगी।मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि स्थानांतरण वास्तव में प्रशासनिक आधार पर किए गए हैं तो प्रशासनिक आधार का अर्थ भी सार्वजनिक होना चाहिए। केवल आदेश में ‘प्रशासनिक आधार’ लिख देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रशासनिक आधार के पीछे संबंधित जिले में पदों की उपलब्धता, विषयवार शिक्षकों की आवश्यकता, विद्यालयों की स्थिति, पदस्थापना की प्राथमिकता और विभागीय आवश्यकता जैसे ठोस तथ्य होने चाहिए। यदि इन आधारों का पालन हुआ है तो सरकार को इन्हें सामने रखने में किसी तरह की कठिनाई नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि इन दस्तावेजों और वास्तविक स्थानांतरण आदेश के बीच अंतर पाया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से प्रक्रिया पर सवाल और गहरे होंगे।शिक्षक संगठनों के विरोध ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। कर्मचारी संगठनों की आपत्तियों को महज विरोध की राजनीति बताकर खारिज करने के बजाय सरकार को यह देखना चाहिए कि उनकी शिकायतों में कितनी तथ्यात्मकता है। आखिर शिक्षक संगठन किन बिंदुओं पर आपत्ति कर रहे हैं, कितने कर्मचारियों को डीईओ के विकल्प पर भेजा गया, क्या समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार हुआ, क्या रिक्त पदों की वास्तविक स्थिति के अनुरूप स्थानांतरण हुए और क्या किसी कर्मचारी को मनचाही या प्रतिकूल पदस्थापना देने के लिए प्रक्रिया में कोई असमानता रही—इन सभी सवालों का जवाब दस्तावेजों के परीक्षण से ही मिल सकता है।अब सबसे अधिक नजर मुख्यमंत्री सचिवालय की भूमिका पर है। यदि स्थानांतरण प्रक्रिया मुख्यमंत्री समन्वय के माध्यम से आगे बढ़ी है तो मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह तथा मुख्यमंत्री सचिवालय में शिक्षा विभाग देख रहे संयुक्त सचिव प्रभात मलिक के स्तर पर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है। यह जांच केवल स्थानांतरण आदेश की समीक्षा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि मूल प्रस्ताव से लेकर अंतिम आदेश तक पूरी फाइल का परीक्षण होना चाहिए। किस अधिकारी ने क्या प्रस्ताव दिया, किन पदों को आधार बनाया गया, किन नामों को किस कारण से शामिल किया गया, डीईओ के विकल्प की व्यवस्था किस स्तर पर तय हुई और अंतिम अनुमोदन किन शर्तों पर दिया गया—इन सवालों के जवाब फाइल परीक्षण से आसानी से सामने आ सकते हैं।इस मामले में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सरकार के लिए नुकसान नहीं बल्कि अवसर साबित हो सकती है। यदि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप हुई है तो जांच से सरकार की पारदर्शिता पर भरोसा बढ़ेगा और शिक्षक संगठनों के आरोपों का तथ्यात्मक जवाब भी सामने आ जाएगा। दूसरी ओर यदि जांच में प्रक्रिया संबंधी गंभीर विसंगतियां सामने आती हैं तो समय रहते उन्हें सुधारा जा सकेगा और जिम्मेदारी भी तय की जा सकेगी। लेकिन यदि सवाल लगातार उठते रहें और सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जांच न हो, तो इससे संदेह और गहरा होने की आशंका रहेगी।सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार स्थानांतरण जैसे संवेदनशील प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता के अपने दावे को व्यवहार में भी साबित करेगी। डीईओ के विकल्प पर किए गए स्थानांतरणों ने शिक्षा विभाग की व्यवस्था के साथ-साथ निर्णय प्रक्रिया की विश्वसनीयता को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब गेंद मुख्यमंत्री सचिवालय के पाले में है। शिक्षक संगठनों के आरोपों, स्थानांतरण आदेश और विभागीय रिकॉर्ड का निष्पक्ष परीक्षण कर यदि सरकार सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट कर दे कि आखिर डीईओ के विकल्प पर इतनी बड़ी संख्या में स्थानांतरण क्यों किए गए और इसके पीछे क्या प्रशासनिक आवश्यकता थी, तो विवाद का पटाक्षेप हो सकता है। लेकिन यदि जांच से बचने की कोशिश होती है, तो यही सवाल आगे चलकर सरकार की पारदर्शिता और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।फिलहाल यह मामला केवल तबादले का नहीं है। यह उस प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता का सवाल है, जिसके आधार पर सैकड़ों शिक्षकों और व्याख्याताओं के भविष्य से जुड़े निर्णय लिए गए हैं। इसलिए अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर दस्तावेजों की जांच की है। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और मुख्यमंत्री सचिवालय में शिक्षा विभाग देख रहे संयुक्त सचिव प्रभात मलिक के स्तर से यदि निष्पक्ष जांच कराई जाती है तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि स्थानांतरण प्रक्रिया में कहीं कोई नियमगत या प्रशासनिक विसंगति हुई है अथवा पूरा निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही लिया गया है। यही जांच यह भी तय करेगी कि विवाद केवल व्यवस्था को लेकर है या वास्तव में निर्णय लेने की प्रक्रिया में ऐसे सवाल मौजूद हैं, जिनका जवाब सरकार को देना होगा।




