
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के सुरजपुर जिला अंतर्गत प्रतापपुर लघु वनोपज गोदाम खोरमा से जुड़े 198 मानक बोरा तेंदूपत्ता के कथित गायब होने का मामला अब सिर्फ विभागीय फाइलों तक सीमित नहीं रहा है। मामले में शिकायतकर्ता द्वारा मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 का दरवाजा खटखटाए जाने के बाद वन विभाग ने अपने जवाब में यह स्वीकार किया है कि पूरे प्रकरण की जांच पहले ही कराई जा चुकी है और गोदाम प्रभारी को दोषी पाया गया है। इसके बावजूद अब तक वास्तविक जिम्मेदारी तय कर कानूनी कार्रवाई हुई या नहीं, इसे लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।यह मामला मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के टोकन नंबर WP260900192463, शिकायत दिनांक 15 सितंबर 2026, से जुड़ा है। शिकायतकर्ता राकेश मित्तल ने आरोप लगाया था कि करीब दो वर्ष पहले खोरमा स्थित लघु वनोपज गोदाम में 198 मानक बोरा तेंदूपत्ता चोरी/हेराफेरी का मामला सामने आया था। मामले की जांच के लिए टीम गठित हुई थी और जांच के दौरान गोदाम प्रभारी के साथ ठेकेदार की भूमिका को लेकर भी आरोप सामने आए थे।वन परिक्षेत्राधिकारी प्रतापपुर द्वारा 19 सितंबर 2026 को जारी जवाब में कहा गया है कि 198 मानक बोरा तेंदूपत्ता से संबंधित प्रकरण की जांच प्रबंध संचालक, जिला यूनियन सूरजपुर द्वारा गठित जांच दल से कराई जा चुकी है। विभागीय जवाब के अनुसार, जांच के बाद तेंदूपत्ता गोदाम प्रभारी को दोषी पाया गया है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विभाग ने यह भी लिखा है कि दोषी पाए गए गोदाम प्रभारी के खाते से नियमानुसार वसूली कर ठेकेदार को राशि दिए जाने की कार्रवाई की जाएगी।यहीं से इस पूरे प्रकरण में कई गंभीर सवाल जन्म लेते हैं—यदि जांच में दोष तय हो चुका है तो अब तक कार्रवाई की स्थिति क्या है? वसूली कितनी निर्धारित हुई? वसूली वास्तव में हुई या नहीं? और यदि 198 मानक बोरा तेंदूपत्ता के मामले में ठेकेदार को नुकसान हुआ, तो उसकी भरपाई किस आधार पर और किसके जिम्मे तय की गई?शिकायतकर्ता ने अपनी मुख्यमंत्री हेल्पलाइन शिकायत में यह भी उल्लेख किया कि उसने पूरे मामले में हुई कार्रवाई की जानकारी सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी थी, लेकिन उसे अपेक्षित जानकारी नहीं मिली। इसके बाद मामला मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक पहुंचा।यह तथ्य अपने आप में विभागीय पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़ा करता है। एक ओर विभाग कह रहा है कि जांच पूरी हो चुकी है और संबंधित गोदाम प्रभारी दोषी पाया गया है, वहीं दूसरी ओर शिकायतकर्ता का कहना है कि उसे जांच और कार्रवाई की जानकारी प्राप्त नहीं हुई।प्रतापपुर से सूरजपुर तक फाइल, जिम्मेदारी किसकी?वन परिक्षेत्राधिकारी ने अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि मामला अब जिला यूनियन सूरजपुर के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार में है और आवश्यक आगामी प्रशासनिक एवं वैधानिक कार्रवाई जिला यूनियन सूरजपुर स्तर से की जा रही है।यानी शिकायत का जवाब तो प्रतापपुर वन परिक्षेत्र कार्यालय से जारी हो गया, लेकिन वास्तविक कार्रवाई की गेंद अब सूरजपुर जिला यूनियन के पाले में है।यहीं सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—क्या 198 मानक बोरा तेंदूपत्ता के मामले में सिर्फ आर्थिक वसूली ही पर्याप्त कार्रवाई मानी जाएगी, या यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता, गबन अथवा हेराफेरी के तथ्य सामने आए हैं तो उसके अनुसार वैधानिक कार्रवाई भी की गई है?वन विभाग के उपलब्ध जवाब में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि जांच रिपोर्ट में कुल कितनी वित्तीय क्षति निर्धारित हुई, कितनी वसूली प्रस्तावित है, दोषी के विरुद्ध विभागीय दंड क्या तय हुआ और किसी आपराधिक प्रकरण की कार्रवाई की गई अथवा नहीं।जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होगी तो खुल सकते हैं कई राजइस मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज अब जांच दल की मूल रिपोर्ट बन जाती है। यदि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होती है तो यह पता चल सकता है कि—198 मानक बोरा तेंदूपत्ता की कमी कैसे सामने आई?कुल कितनी आर्थिक क्षति निर्धारित की गई?गोदाम प्रभारी की क्या जिम्मेदारी तय हुई?ठेकेदार की भूमिका के संबंध में जांच में क्या निष्कर्ष निकला?किस अधिकारी की निगरानी में गोदाम का संचालन हो रहा था?दोषी से कितनी राशि वसूलने का निर्णय हुआ?अब तक कितनी राशि वास्तव में वसूल हुई?क्या विभागीय कार्रवाई पूरी हुई या अभी लंबित है?क्या मामले में किसी आपराधिक प्रकरण की आवश्यकता महसूस की गई?छत्तीसगढ़ की मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 नागरिकों की शिकायतों के त्वरित और जवाबदेह निराकरण के लिए सरकारी मंच है। ऐसे में इस मामले में शिकायतकर्ता को विभाग की ओर से यह बताना कि जांच हो चुकी है और गोदाम प्रभारी दोषी पाया गया है, निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन जांच के निष्कर्ष से लेकर वास्तविक कार्रवाई और वसूली तक की पूरी स्थिति सार्वजनिक होना इस मामले की पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा।सूरजपुर जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर जिला वन कार्यालय का विवरण भी उपलब्ध है, जिससे स्पष्ट है कि जिला स्तर पर वन प्रशासन की अपनी संरचना और कार्यालय व्यवस्था है। अब असली सवाल 198 बोरा तेंदूपत्ता का ही नहीं, बल्कि उस जांच रिपोर्ट का है—जिसमें दोषी कौन पाया गया, कितना नुकसान हुआ और कार्रवाई कितनी आगे बढ़ी? मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत के बाद विभागीय जवाब सामने आ चुका है, लेकिन जवाब में उठे ये सवाल अभी भी अपने अंतिम उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।




