
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग में 6 अगस्त 2026 को जारी हुआ 122 पन्नों का स्थानांतरण आदेश अब सवालों के घेरे में आता जा रहा है। करीब 500 शिक्षक और व्याख्याताओं के प्रशासनिक आधार पर किए गए तबादलों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि हाल ही में युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया पूरी तरह सही और आवश्यकता के अनुरूप की गई थी, तो उसके बाद भी जिलों में पद रिक्त कैसे हो गए?स्थानांतरण आदेश को लेकर विभागीय स्तर पर उठ रहे सवाल केवल स्थानांतरण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि युक्तियुक्तकरण की पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।युक्तियुक्तकरण सही था तो रिक्त पद कैसे?शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों की संख्या और उपलब्ध शिक्षकों के अनुपात के आधार पर आवश्यकता वाले स्थानों पर शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना था। ऐसे में युक्तियुक्तकरण के बाद यदि किसी जिले या संस्था में पद रिक्त रह गए और उन्हीं रिक्त पदों पर अब स्थानांतरण किए जा रहे हैं, तो स्वाभाविक सवाल है—क्या युक्तियुक्तकरण में जरूरत का सही आकलन हुआ था?यदि आकलन सही था तो रिक्तियां क्यों बनीं?और यदि रिक्तियां पहले से थीं, तो युक्तियुक्तकरण के दौरान उनका समाधान क्यों नहीं किया गया?इन सवालों का स्पष्ट जवाब शिक्षा विभाग को देना होगा।122 पन्नों में प्रशासनिक आधार और ‘डीईओ के विकल्प’ का खेल?जारी आदेश की एक बड़ी खासियत यह बताई जा रही है कि बड़ी संख्या में शिक्षकों और व्याख्याताओं को जिला शिक्षा अधिकारी के विकल्प पर स्थानांतरित किया गया है। यानी आदेश में स्थानांतरण के बाद पदस्थापना के लिए डीईओ स्तर पर विकल्प की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।यहीं से नई बहस शुरू होती है।जब स्थानांतरण प्रशासनिक आधार पर किया जा रहा है, तब सवाल यह है कि संबंधित शिक्षक को किस संस्था में पदस्थ किया जाएगा, इसका अंतिम निर्णय किस आधार पर होगा? क्या इसके लिए कोई स्पष्ट, सार्वजनिक और समान मापदंड तय है? अथवा डीईओ के विकल्प के नाम पर मनचाही पदस्थापना की गुंजाइश छोड़ी गई है?आदेश प्रशासनिक, लेकिन विकल्प व्यक्तिगत—तो पारदर्शिता की गारंटी कौन देगा?‘नारियल-लड्डू’ की चर्चा क्यों?शिक्षा विभाग में स्थानांतरण और पदस्थापना हमेशा से संवेदनशील विषय रहे हैं। ऐसे में अब डीईओ के विकल्प पर भी ‘नारियल-लड्डू’ वाले खेल की चर्चाएं सामने आना विभाग के लिए गंभीर संकेत है।यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी पर बिना प्रमाण भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया जा सकता। लेकिन यदि किसी प्रक्रिया को लेकर लेन-देन या सुविधा शुल्क जैसी चर्चाएं विभाग के भीतर और बाहर जोर पकड़ रही हैं, तो सरकार और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है कि पूरी प्रक्रिया को इतना पारदर्शी बनाए कि किसी भी तरह की शंका की गुंजाइश न रहे।विकल्प की व्यवस्था बनेगी वरदान या विवाद का कारण?डीईओ के विकल्प पर पदस्थापना की व्यवस्था यदि स्पष्ट नियम, रिक्त पदों की सार्वजनिक सूची, वरिष्ठता/आवश्यकता के निर्धारित मापदंड और ऑनलाइन पारदर्शी प्रक्रिया के साथ लागू की जाती है तो विवाद की संभावना कम हो सकती है।लेकिन यदि विकल्प का अर्थ यह है कि स्थानांतरण के बाद पदस्थापना का रास्ता पूरी तरह स्थानीय स्तर पर तय होगा, तो यही व्यवस्था भविष्य में विवाद का सबसे बड़ा कारण बन सकती है।सवाल यह भी है कि 122 पन्नों के आदेश में कितने ऐसे शिक्षक हैं जिन्हें डीईओ के विकल्प पर भेजा गया है और किन-किन जिलों में उन्हें पदस्थ किया जाना है?सरकार को देना चाहिए इन सवालों का जवाबयुक्तियुक्तकरण के बाद जिलों में पद रिक्त क्यों हुए?क्या युक्तियुक्तकरण के समय रिक्त पदों का सही आकलन किया गया था?6 अगस्त के स्थानांतरण आदेश में कितने शिक्षक और व्याख्याता डीईओ के विकल्प पर भेजे गए हैं?डीईओ के विकल्प पर पदस्थापना के लिए क्या कोई लिखित मापदंड निर्धारित है?क्या रिक्त पदों की सूची सार्वजनिक की गई है?क्या विकल्प के आधार पर पदस्थापना की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और रिकॉर्डेड होगी?क्या सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि किसी भी शिक्षक को मनचाहा स्थान पाने के लिए किसी प्रकार का आर्थिक दबाव या अनुचित माध्यम न अपनाना पड़े?सवाल बड़ा है, जवाब उससे भी बड़ा होना चाहिए122 पन्नों का आदेश जारी करना प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है, लेकिन 122 पन्नों के आदेश से उठे सवालों का जवाब भी उतनी ही पारदर्शिता से देना होगा।युक्तियुक्तकरण के बाद रिक्त पद, प्रशासनिक आधार पर बड़े पैमाने पर स्थानांतरण और उसके बाद डीईओ के विकल्प पर पदस्थापना—इन तीनों कड़ियों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।अब निगाह इस बात पर है कि शिक्षा विभाग रिक्त पदों की वास्तविक स्थिति, स्थानांतरण का आधार और डीईओ के विकल्प पर होने वाली पदस्थापनाओं के मापदंड सार्वजनिक करता है या नहीं। क्योंकि सवाल सिर्फ तबादले का नहीं है।सवाल यह है कि युक्तियुक्तकरण के बाद भी पद खाली कैसे हुए और अब उन खाली पदों पर ‘विकल्प’ के नाम पर क्या होने वाला है?यही वह सवाल है, जिसका जवाब आने वाले दिनों में शिक्षा विभाग की पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता तय करेगा।



