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संपादक की कलम से…सिर्फ़ कुर्सी गई तो क्या, ज़मीर भी सवालों में है; जब तक नहीं बदलेगा निज़ाम, हर इस्तीफ़ा बेमानी है..इस्तीफ़ा अंत नहीं, शिक्षा व्यवस्था के पुनर्निर्माण की शुरुआत होना चाहिए।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल नीट-यूजी जैसी परीक्षा में पेपर लीक होना केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र की कमजोरी का प्रतीक है जिस पर करोड़ों युवाओं का भविष्य टिका है। यदि युवाओं के व्यापक विरोध-प्रदर्शन और जनदबाव के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दिया है, तो यह राजनीतिक जवाबदेही का एक कदम माना जा सकता है। लेकिन असली प्रश्न आज भी वहीं खड़ा है—क्या केवल इस्तीफ़ा देने से व्यवस्था बदल जाएगी?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्री का इस्तीफ़ा नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने का संकेत होता है। लेकिन यदि उसी प्रशासनिक ढांचे, परीक्षा एजेंसियों, भ्रष्ट नेटवर्क और जवाबदेहीहीन व्यवस्था के साथ आगे बढ़ा जाए, तो नया मंत्री भी उसी पुराने सिस्टम का हिस्सा बन जाएगा। इसलिए समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की है।भारत में वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाएँ सामने आती रही हैं। कभी शिक्षक भर्ती, कभी पुलिस भर्ती, कभी लोक सेवा आयोग और अब चिकित्सा प्रवेश परीक्षा।

हर बार जांच समिति बनती है, कुछ गिरफ्तारियाँ होती हैं, राजनीतिक बयान आते हैं और कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन जिन लाखों विद्यार्थियों की वर्षों की मेहनत बर्बाद होती है, उनकी मानसिक पीड़ा का कोई हिसाब नहीं होता।

यह भी समझना होगा कि पेपर लीक किसी अकेले व्यक्ति का अपराध नहीं होता। इसके पीछे एक संगठित नेटवर्क सक्रिय रहता है, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ, परीक्षा केंद्रों से जुड़े लोग, शिक्षा माफिया और कई बार प्रभावशाली संरक्षण भी शामिल होता है। यदि इस पूरे नेटवर्क को जड़ से समाप्त नहीं किया गया, तो केवल मंत्री बदलने से भविष्य सुरक्षित नहीं होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाया जाए। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, एन्क्रिप्टेड वितरण प्रणाली, परीक्षा केंद्रों का स्वतंत्र ऑडिट, अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया—ये सभी सुधार केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि ज़मीन पर दिखाई देने चाहिए।

सबसे बड़ी चिंता युवाओं का टूटता हुआ विश्वास है। एक विद्यार्थी वर्षों तक दिन-रात मेहनत करता है, परिवार अपनी जमा-पूंजी उसकी पढ़ाई पर खर्च करता है और जब परीक्षा की विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो जाए, तो यह केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की साख पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। यदि युवा व्यवस्था पर भरोसा खो देंगे, तो यह किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे गंभीर संकट होगा।

सरकारें बदलती रहती हैं, मंत्री आते-जाते रहते हैं, लेकिन संस्थाओं की विश्वसनीयता ही लोकतंत्र की वास्तविक ताकत होती है। इसलिए आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय या पराजय की नहीं, बल्कि ऐसी पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था की है जिसमें किसी भी विद्यार्थी को यह डर न रहे कि उसकी मेहनत किसी पेपर माफिया के हाथों हार जाएगी।

इस्तीफ़ा यदि व्यापक सुधारों का पहला कदम बनता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि वह केवल जनाक्रोश शांत करने का राजनीतिक उपाय बनकर रह जाए, तो इतिहास उसे एक औपचारिक घटना से अधिक महत्व नहीं देगा।

नीट विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की परीक्षा व्यवस्था केवल सुधार नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन की मांग कर रही है।

युवाओं को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ऐसा तंत्र चाहिए जिसमें उनकी मेहनत, ईमानदारी और सपनों की रक्षा हो सके। व्यक्ति बदलने से नहीं, व्यवस्था बदलने से ही न्याय होगा।

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