
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसके जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब उसे किसी से सहयोग, समर्थन या मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे समय वह विनम्रतापूर्वक आग्रह करता है। किंतु विडंबना यह है कि आज के समय में कई लोग किसी के सच्चे और शालीन आग्रह को उसकी कमजोरी या गिड़गिड़ाहट समझ बैठते हैं। यह केवल व्यक्ति की सोच का नहीं, बल्कि समाज में बदलते संवेदनात्मक मूल्यों का भी परिचायक है।आग्रह का अर्थ कभी भी आत्मसम्मान का त्याग नहीं होता। यह केवल संवाद का एक सभ्य और संस्कारित माध्यम है। जब कोई व्यक्ति सम्मानपूर्वक अपनी बात रखता है, तो उसका उद्देश्य संबंधों को बनाए रखना, सहयोग प्राप्त करना या किसी उचित कार्य को आगे बढ़ाना होता है। लेकिन जो लोग विनम्रता को कमजोरी समझते हैं, वे अक्सर अहंकार के चश्मे से दुनिया को देखते हैं। उन्हें लगता है कि सामने वाला जितना अधिक निवेदन कर रहा है, उतना ही अधिक वह निर्बल है।वास्तविकता यह है कि विनम्र होना और गिड़गिड़ाना दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं। विनम्रता व्यक्ति के संस्कारों की पहचान है, जबकि गिड़गिड़ाना विवशता की अभिव्यक्ति हो सकती है। दुर्भाग्य से आज कई लोग इन दोनों के बीच का अंतर समझने की कोशिश नहीं करते। वे बार-बार किए गए आग्रह को सम्मान की भाषा नहीं, बल्कि निर्भरता की भाषा मान लेते हैं।जीवन यह भी सिखाता है कि जहाँ किसी आग्रह का सम्मान न हो, वहाँ बार-बार स्वयं को छोटा करने की आवश्यकता नहीं है। आत्मसम्मान हर व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि एक-दो बार विनम्र निवेदन के बाद भी सामने वाला आपकी भावना को नहीं समझता, तो मौन ही सबसे प्रभावशाली उत्तर बन जाता है। कई बार शब्दों से अधिक व्यक्ति की खामोशी उसकी गरिमा को स्थापित करती है।समाज को यह समझना होगा कि हर आग्रह स्वार्थ से प्रेरित नहीं होता। अनेक बार उसके पीछे विश्वास, अपनापन, रिश्तों की गरिमा और मानवीय संवेदनाएँ छिपी होती हैं। यदि हम हर निवेदन को गिड़गिड़ाहट समझेंगे, तो धीरे-धीरे लोग एक-दूसरे से संवाद करना ही छोड़ देंगे और रिश्तों में औपचारिकता तथा दूरी बढ़ती जाएगी।अंततः, किसी का विनम्र आग्रह उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसके संस्कार और धैर्य का प्रमाण होता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम आग्रह को सम्मान दें, व्यक्ति की भावना को समझें और अपने व्यवहार से यह सिद्ध करें कि संवेदनशीलता आज भी समाज की सबसे बड़ी ताकत है। क्योंकि जो लोग हर विनम्रता को मजबूरी समझ लेते हैं, वे अक्सर जीवन के सबसे सच्चे रिश्ते खो देते हैं।




