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शिक्षा विभाग में कथित फर्जी स्थानांतरण आदेश का मामला: 19 व्याख्याताओं-कर्मचारियों के तबादले पर उठे सवाल,एफआईआर क्यों नहीं?

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में स्थानांतरण आदेशों की प्रमाणिकता को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है। विभाग के तत्कालीन अवर सचिव आर.पी. वर्मा के हस्ताक्षर से 19 व्याख्याताओं और अन्य कर्मचारियों के समन्वय से स्थानांतरण का आदेश जारी होने का मामला सामने आया। बताया जा रहा है कि लोक शिक्षण संचालनालय ने उक्त आदेश को फर्जी करार दिया है। यदि विभागीय स्तर पर इस आदेश को फर्जी घोषित किया गया है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब तक इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने की दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?शासकीय विभागों में स्थानांतरण की प्रक्रिया केवल कर्मचारियों की पदस्थापना बदलने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था, नियमों की पारदर्शिता और शासन की विश्वसनीयता से भी जुड़ी होती है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी के हस्ताक्षर का इस्तेमाल कर स्थानांतरण आदेश जारी किए जाने का मामला सामने आया है, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित आदेश वास्तव में किस स्तर से जारी हुआ, उस पर हस्ताक्षर किसने किए और आदेश को तैयार करने तथा प्रसारित करने में किन लोगों की भूमिका रही।19 कर्मचारियों के स्थानांतरण का मामला, जांच के दायरे में कई सवालमामले में 19 व्याख्याताओं और अन्य कर्मचारियों के समन्वय से स्थानांतरण किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि संबंधित आदेश किस सक्षम प्राधिकारी के अनुमोदन से जारी हुआ था। क्या आदेश विधिवत विभागीय प्रक्रिया के तहत जारी किया गया था या इसके लिए निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया?यदि लोक शिक्षण संचालनालय ने इस आदेश को फर्जी बताया है, तो उस निष्कर्ष का आधार क्या है? क्या विभाग ने इस संबंध में कोई लिखित जांच रिपोर्ट जारी की है? क्या संबंधित दस्तावेजों, हस्ताक्षरों और आदेश जारी करने की प्रक्रिया का विधिवत परीक्षण किया गया है? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है, ताकि मामले की वास्तविकता स्पष्ट हो सके।आदेश फर्जी तो जिम्मेदार कौन?इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जिम्मेदारी तय करने का है। यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि आदेश जाली था या किसी अधिकारी के हस्ताक्षर का अनधिकृत इस्तेमाल किया गया था, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।सवाल यह भी है कि यदि आदेश वास्तव में फर्जी था, तो उसे तैयार करने, जारी करने, प्रसारित करने अथवा उसके आधार पर स्थानांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने में किन लोगों की भूमिका रही? क्या किसी कर्मचारी ने इस आदेश के आधार पर कार्यभार ग्रहण किया? क्या संबंधित कार्यालयों ने आदेश की सत्यता का सत्यापन किया था? इन बिंदुओं पर जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला केवल दस्तावेजी अनियमितता का है या इसके पीछे कोई सुनियोजित गतिविधि थी।हालांकि, जांच और आधिकारिक दस्तावेजों के अभाव में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। इसलिए आवश्यक है कि विभाग पूरे मामले की तथ्यात्मक स्थिति सार्वजनिक करे और जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर कार्रवाई सुनिश्चित करे।एफआईआर दर्ज कराने में देरी क्यों?इस प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि लोक शिक्षण संचालनालय ने संबंधित आदेश को फर्जी बताया है, तो पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की स्थिति क्या है? क्या विभाग ने अब तक कोई लिखित शिकायत दी है? यदि शिकायत नहीं दी गई है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या विभागीय जांच पूरी होने की प्रतीक्षा की जा रही है या कोई अन्य प्रशासनिक प्रक्रिया लंबित है?इन सवालों का जवाब स्कूल शिक्षा विभाग और लोक शिक्षण संचालनालय को देना चाहिए। केवल किसी आदेश को फर्जी बता देना पर्याप्त नहीं है। यदि दस्तावेज में कूटरचना या हस्ताक्षर के दुरुपयोग के पर्याप्त आधार मिलते हैं, तो मामले की प्रकृति के अनुसार पुलिस और संबंधित जांच एजेंसियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।यह भी ध्यान रखना होगा कि एफआईआर दर्ज होना और किसी व्यक्ति का दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। निष्पक्ष जांच का उद्देश्य तथ्यों को सामने लाना और वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान करना होना चाहिए।पारदर्शिता से ही दूर होगा संदेहशिक्षा विभाग राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस विभाग के आदेशों पर हजारों शिक्षकों और कर्मचारियों की पदस्थापना तथा सेवा संबंधी निर्णय निर्भर करते हैं। यदि स्थानांतरण आदेशों की प्रमाणिकता पर सवाल उठते हैं और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो स्वाभाविक रूप से प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं।ऐसे मामलों में विभाग को चुप्पी साधने के बजाय तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए। संबंधित आदेश की प्रति, उसके जारी होने की प्रक्रिया, लोक शिक्षण संचालनालय की आपत्ति तथा अब तक की गई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक होने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।शासन से जवाब मांगते सवालछत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग और लोक शिक्षण संचालनालय को इस मामले में स्पष्ट करना चाहिए कि 19 व्याख्याताओं और अन्य कर्मचारियों के स्थानांतरण से संबंधित आदेश की वास्तविक स्थिति क्या है। यदि आदेश फर्जी पाया गया है, तो अब तक की जांच में क्या तथ्य सामने आए हैं? क्या पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है? यदि नहीं, तो शिकायत दर्ज कराने में देरी का कारण क्या है? क्या आदेश के आधार पर किसी कर्मचारी को लाभ मिला या किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचा? और सबसे महत्वपूर्ण, इस पूरे प्रकरण की जिम्मेदारी किसकी है?इन सवालों का जवाब किसी एक अधिकारी या कर्मचारी के हित से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि मामला सरकारी आदेशों की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा है।अब निगाहें स्कूल शिक्षा विभाग और लोक शिक्षण संचालनालय पर हैं। संबंधित आदेश को फर्जी बताए जाने के दावे की आधिकारिक पुष्टि, जांच की स्थिति और पुलिस कार्रवाई के संबंध में स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है। यदि अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि आदेश को फर्जी बताने के दावे में कोई तथ्यात्मक अंतर है, तो विभाग को वह भी स्पष्ट करना चाहिए।क्योंकि सरकारी व्यवस्था में केवल आदेश जारी करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि आदेश की प्रमाणिकता सुनिश्चित करना और अनियमितता सामने आने पर जवाबदेही तय करना भी उतना ही आवश्यक है।

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