,नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी


छत्तीसगढ़ विधानसभा के मार्च 2024 सत्र में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत द्वारा मरवाही वनमंडल में कथित अनियमितताओं और लगभग 40 करोड़ रुपये के घोटालों से जुड़े मामलों को प्रमुखता से उठाया गया था। सदन में सरकार ने स्वीकार किया था कि बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित हैं तथा दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई का आश्वासन दिया था।
अब विभागीय अभिलेखों से सामने आई जानकारी इस बात की पुष्टि करती है कि इन मामलों में 7 विभागीय प्रकरणों के अंतर्गत कुल 35 अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय जांच संस्थित की गई, जिनमें अधिकांश मामलों का निराकरण कर दंडात्मक कार्रवाई भी की जा चुकी है।
विधानसभा में डॉ. चरणदास महंत ने सरकार से पूछा था कि वर्ष 2021, 2022 और 2023 की कुल 72 शिकायतें लंबे समय से लंबित क्यों हैं, जबकि इनमें करोड़ों रुपये की अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास कार्यों और मनरेगा के कार्यों में गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं। इसके जवाब में वन मंत्री केदार कश्यप ने सदन को आश्वस्त किया था कि प्राप्त 79 मामलों में से 7 मामलों की जांच चल रही है तथा शेष 72 मामलों की भी छह माह के भीतर जांच पूरी कर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।
अब उपलब्ध विभागीय दस्तावेज बताते हैं कि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई अधिकारियों पर आर्थिक और सेवा संबंधी दंड भी लगाए गए।सबसे बड़ी कार्रवाई तत्कालीन प्रभारी वनमंडलाधिकारी राजेश कुमार मिश्रा के विरुद्ध हुई। सेवानिवृत्ति के बाद उनके विरुद्ध छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम 1976 के तहत कार्रवाई करते हुए उनकी देय पेंशन से दो वर्षों तक 10 प्रतिशत राशि (लगभग 1.22 लाख रुपये) की कटौती का दंड लगाया गया और प्रकरण का निराकरण किया गया।इसी प्रकार तत्कालीन उप वन मंडलाधिकारी के.पी. डिंडोरे के मामले में पहले पदावनति की मुख्य शास्ति दी गई। बाद में शासन के आदेश से उन्हें आगामी वेतन वृद्धि तक पदावनत रखने तथा निलंबन अवधि को कर्तव्य अवधि मान्य करने का आदेश जारी कर प्रकरण समाप्त किया गया।
तत्कालीन सहायक अधिकारी गोपाल प्रसाद जांगड़े के विरुद्ध भी विभागीय जांच पूरी होने के बाद उनकी पेंशन में दो वर्षों तक 10 प्रतिशत कटौती का दंड अधिरोपित किया गया।विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार सेवानिवृत्त उप वनक्षेत्रपाल राजकुमार शर्मा के विरुद्ध भी पेंशन नियमों के तहत दो वर्षों तक 10 प्रतिशत पेंशन कटौती का दंड दिया गया। यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि विधानसभा में इस बात पर प्रश्न उठा था कि सेवानिवृत्त कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई समाप्त क्यों की गई थी। इसके बाद सरकार ने स्वयं सदन में कहा था कि प्रकरण को पुनः खोलकर उचित कार्रवाई की जाएगी।जांच के दायरे में आए वनपाल अनूज कुमार मिश्रा, उदय तिवारी, अश्वनी दुबे और अमरीश दुबे की दो-दो वार्षिक वेतन वृद्धि संचयी प्रभाव से रोकते हुए विभागीय प्रकरणों का निस्तारण किया गया।इसी तरह वनरक्षक वीरेन्द्र साहू, दीपक कोर्राम, देवेन्द्र कश्यप, पन्नालाल जांगड़े, नवीन बंजारे, नीतू ध्रुव तथा लाल बहादुर कौशिक के विरुद्ध भी विभागीय जांच पूरी होने के बाद दो-दो वेतन वृद्धि संचयी प्रभाव से रोकने की सजा दी गई।
दस्तावेज यह भी दर्शाते हैं कि अधिकांश मामलों में जांच वर्ष 2022 और 2023 में संस्थित की गई थी, जबकि अंतिम दंडात्मक आदेश 2024 और 2025 के दौरान जारी हुए। इससे स्पष्ट है कि विधानसभा में दिए गए आश्वासन के बाद विभाग ने लंबित मामलों को निपटाने की प्रक्रिया तेज की।
हालांकि, सबसे बड़ा प्रश्न अब भी बरकरार है। विधानसभा में जिन 72 शिकायतों और लगभग 40 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था, क्या उन सभी मामलों की जांच पूरी हो चुकी है? यदि हां, तो क्या सभी जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई हुई, अथवा केवल कुछ अधिकारियों तक ही कार्रवाई सीमित रही? साथ ही, क्या विभाग ने कथित वित्तीय अनियमितताओं से हुई शासकीय क्षति की वसूली भी सुनिश्चित की है, या कार्रवाई केवल वेतन वृद्धि रोकने और पेंशन कटौती तक सीमित रही?इन सवालों के जवाब अब भी सार्वजनिक रूप से सामने आने बाकी हैं।
ऐसे में विधानसभा में दिए गए सरकारी आश्वासनों और विभागीय कार्रवाई की वास्तविक स्थिति पर विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करना पारदर्शिता और जवाबदेही की दृष्टि से आवश्यक माना जा रहा है।



