
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में राजस्व मामलों के त्वरित और पारदर्शी निराकरण की दिशा में राजस्व एवं आपदा प्रबंधन तथा पुनर्वास विभाग ने महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है। भूमि, नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा और स्वामित्व से जुड़े मामलों के निराकरण को प्राथमिकता देने से राज्यभर में राजस्व न्यायालयों के कामकाज में तेजी आई है। विभागीय स्तर पर नियमित समीक्षा, डिजिटल ट्रैकिंग और लंबित मामलों का समयावधि के अनुसार वर्गीकरण इस पूरी व्यवस्था की अहम कड़ी बनकर सामने आया है।राज्य के राजस्व न्यायालयों में कुल 4,67,415 प्रकरण दर्ज थे, जिनमें से 3,80,224 प्रकरणों का निराकरण किया जा चुका है। इस तरह कुल निराकरण दर 81.35 प्रतिशत तक पहुंची है। शेष 87,191 प्रकरण लंबित हैं, जिनके निपटारे के लिए भी समयबद्ध रणनीति के तहत कार्य जारी है।आम नागरिकों को सीधे राहतराजस्व विवादों का सीधा संबंध आम नागरिक की जमीन, मकान, कृषि और आजीविका से होता है। ऐसे मामलों में लंबे समय तक निर्णय नहीं होने से नागरिकों को बार-बार कार्यालयों और न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लंबित प्रकरणों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने की दिशा में चल रही प्रक्रिया से समय और संसाधनों की बचत की उम्मीद बढ़ी है।विभागीय कार्यप्रणाली में डिजिटल निगरानी और नियमित समीक्षा को महत्व दिए जाने से अधिकारियों के स्तर पर लंबित मामलों की स्थिति पर नजर रखना आसान हुआ है। इसी व्यवस्था के तहत पुराने मामलों को अलग से चिन्हित कर उनके निराकरण को प्राथमिकता दी जा रही है।सुकमा से नारायणपुर तक बेहतर निराकरणराज्य के दूरस्थ और आदिवासी बहुल जिलों में भी राजस्व मामलों के निराकरण में उल्लेखनीय आंकड़े सामने आए हैं। सुकमा में 92.70 प्रतिशत, नारायणपुर में 92.28 प्रतिशत, दंतेवाड़ा में 91.50 प्रतिशत और बीजापुर में 89.67 प्रतिशत प्रकरणों का निराकरण दर्ज किया गया है।बड़े जिलों में भी बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा हुआ है। बस्तर में 17,600 में से 15,745, बलौदाबाजार-भाटापारा में 20,905 में से 18,494, रायपुर में 34,226 में से 29,824 और बिलासपुर में 29,495 में से 24,539 प्रकरणों का निराकरण किया गया है।लंबित मामलों की वैज्ञानिक निगरानीराजस्व न्याय व्यवस्था में केवल नए मामलों के निपटारे के बजाय पुराने लंबित प्रकरणों को भी विशेष प्राथमिकता दी जा रही है। कुल 87,191 लंबित मामलों को उनकी अवधि के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।इनमें 0 से 6 माह के 51,401, 6 माह से 1 वर्ष के 13,218, 1 से 3 वर्ष के 15,918, 3 से 5 वर्ष के 3,903 और पांच वर्ष से अधिक पुराने 2,751 प्रकरण शामिल हैं। इस वर्गीकरण का उद्देश्य लंबे समय से लंबित मामलों को चिन्हित कर उनके निराकरण की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाना है।ई-धरती और आधुनिक सर्वेक्षण से भू-अभिलेखों में बदलावराजस्व न्याय के साथ भू-अभिलेखों को अधिक व्यवस्थित और डिजिटल बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। राज्य में 431 वन ग्राम से परिवर्तित राजस्व ग्राम और 596 असर्वेक्षित अथवा मसाहती ग्रामों सहित कुल 1,027 ग्रामों को सर्वेक्षण के लिए चिन्हित किया गया है।इनमें से 284 ग्रामों का सर्वेक्षण पूरा कर डाटा भुइयां पोर्टल पर अपलोड किया जा चुका है, जबकि 196 ग्रामों में अंतिम प्रकाशन की प्रक्रिया जारी है। अबूझमाड़ और नारायणपुर क्षेत्र में भी सर्वेक्षण और डिजिटल भू-अभिलेख निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी है।प्रशासनिक मॉनिटरिंग बनी महत्वपूर्ण कड़ीराजस्व एवं आपदा प्रबंधन तथा पुनर्वास विभाग की मौजूदा कार्यप्रणाली में समयबद्ध सुनवाई, डिजिटल ट्रैकिंग, नियमित समीक्षा और पुराने मामलों की निगरानी को विशेष महत्व मिलता दिखाई दे रहा है। सचिव शम्मी आबिदी के प्रशासनिक नेतृत्व में विभागीय स्तर पर इन व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाने की दिशा में निरंतर निगरानी का महत्व बढ़ा है।इसका उद्देश्य केवल आंकड़ों में निराकरण दर बढ़ाना नहीं, बल्कि भूमि से जुड़े विवादों और अभिलेखीय समस्याओं के कारण आम नागरिकों को होने वाली परेशानी को कम करना है।80 फीसदी से अधिक निराकरण वाले कई जिलेराज्य के कई जिलों में 80 प्रतिशत से अधिक प्रकरणों के निराकरण का आंकड़ा दर्ज किया गया है। राजनांदगांव में 83.45 प्रतिशत, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई में 83.42 प्रतिशत, कोरिया में 81.87 प्रतिशत, सारंगढ़-बिलाईगढ़ में 81.84 प्रतिशत, धमतरी में 81.65 प्रतिशत और जशपुर में 80.67 प्रतिशत निराकरण दर दर्ज की गई है।हालांकि 87 हजार से अधिक मामले अभी लंबित हैं, इसलिए मौजूदा उपलब्धियों के साथ इन मामलों के समयबद्ध निराकरण पर भी निगाह बनी हुई है। खासकर पांच वर्ष से अधिक पुराने 2,751 प्रकरण यह बताते हैं कि राजस्व न्याय में लंबित मामलों का पूरी तरह समाधान अभी भी महत्वपूर्ण प्रशासनिक चुनौती है।कुल मिलाकर, राजस्व न्यायालयों के प्रदर्शन में आई तेजी, डिजिटल भू-अभिलेख, आधुनिक सर्वेक्षण और लंबित मामलों की श्रेणीवार निगरानी से छत्तीसगढ़ में राजस्व प्रशासन को अधिक जवाबदेह और समयबद्ध बनाने की दिशा में प्रयास दिखाई दे रहे हैं। अब इन पहलों की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि लंबित मामलों का निपटारा कितनी तेजी और स्थायित्व के साथ होता है तथा आम नागरिकों को इसका प्रत्यक्ष लाभ कितना मिलता है।




