
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लेकर न्यायधानी बिलासपुर तक शहरों के प्रमुख बाजारों में पार्किंग की समस्या लगातार गंभीर बनी हुई है। बाजारों का विस्तार हुआ, वाहनों की संख्या बढ़ी, व्यापारिक गतिविधियां कई गुना बढ़ीं, लेकिन उसके अनुपात में व्यवस्थित और पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी। नतीजा यह है कि बाजार पहुंचने वाला ग्राहक वाहन खड़ा करने के लिए जगह तलाशता रहता है और अंततः सड़क किनारे, मुख्य मार्ग पर अथवा दुकान के सामने वाहन खड़ा करने को मजबूर होता है। यही अव्यवस्थित पार्किंग धीरे-धीरे यातायात जाम का स्थायी कारण बनती जा रही है।राजधानी रायपुर में समय-समय पर यातायात पुलिस और नगर निगम द्वारा अतिक्रमण तथा नो-पार्किंग के खिलाफ कार्रवाई की जाती रही है। हाल ही में मालवीय रोड और एमजी रोड क्षेत्र में संयुक्त अभियान चलाकर नो-पार्किंग में खड़े वाहनों को हटाया गया तथा दुकानों के बाहर सड़क और फुटपाथ पर रखे सामान को भी हटवाया गया। कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि समस्या प्रशासन के संज्ञान में है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अभियान समाप्त होने के बाद वही स्थिति दोबारा क्यों दिखाई देने लगती है।दरअसल पार्किंग की समस्या केवल वाहन चालकों की लापरवाही का परिणाम नहीं है। बाजारों की मौजूदा संरचना, संकरी सड़कें, दुकानों के सामने अतिक्रमण, सड़क किनारे अस्थायी व्यावसायिक गतिविधियां और पर्याप्त पार्किंग स्थलों का अभाव एक-दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे हैं। जब किसी बाजार में हजारों लोग खरीदारी के लिए पहुंचते हैं और उनके वाहनों के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं होता, तब केवल चालान काटना या वाहन क्रेन से उठाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।न्यायधानी बिलासपुर में भी पुराने और प्रमुख बाजार क्षेत्रों में यही चुनौती दिखाई देती है। बाजारों के आसपास सड़क की चौड़ाई सीमित है, जबकि दोपहिया और चारपहिया वाहनों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। खरीदारी के लिए आने वाले लोगों के सामने सबसे पहले यही सवाल रहता है कि वाहन कहां खड़ा करें। पार्किंग स्थल दूर होने पर ग्राहक सड़क किनारे वाहन खड़ा करना आसान समझता है और कुछ ही समय में एक वाहन से शुरू हुई अव्यवस्था पूरे मार्ग को प्रभावित करने लगती है।यह स्थिति केवल यातायात की समस्या नहीं बल्कि शहर की व्यापारिक व्यवस्था और नागरिक सुविधा से भी जुड़ी हुई है। बाजार में यदि ग्राहक को वाहन खड़ा करने के लिए जगह नहीं मिले तो वह अनावश्यक रूप से सड़क पर घूमता है, इससे यातायात का दबाव बढ़ता है और पैदल चलने वालों के लिए भी जगह कम पड़ती है। फुटपाथ पर दुकानों का सामान और सड़क पर खड़े वाहन मिलकर पैदल यात्रियों को मुख्य सड़क पर आने के लिए मजबूर करते हैं। इससे दुर्घटना की आशंका भी बढ़ती है।छत्तीसगढ़ के अन्य प्रमुख शहरों में भी पार्किंग की समस्या को देखते हुए मल्टीलेवल पार्किंग जैसे विकल्पों पर काम की चर्चा सामने आती रही है। उदाहरण के तौर पर भिलाई के आकाशगंगा-सुपेला क्षेत्र में मल्टीलेवल पार्किंग और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की योजना तथा अन्य बाजार क्षेत्रों में पार्किंग विकसित करने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। इससे यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि राजधानी और न्यायधानी जैसे प्रमुख शहरों के पुराने बाजारों के लिए दीर्घकालिक पार्किंग नीति कितनी प्रभावी ढंग से लागू की जा रही है।विडंबना यह है कि प्रशासन के पास नो-पार्किंग के बोर्ड हैं, चालान की व्यवस्था है, क्रेन है, यातायात पुलिस है और अतिक्रमण हटाने के अभियान भी हैं, लेकिन इसके बावजूद बाजारों में पार्किंग संकट खत्म नहीं हो रहा। इससे साफ है कि समस्या केवल नियम लागू करने की नहीं, बल्कि शहर की यातायात योजना और पार्किंग प्रबंधन की भी है। जिस बाजार में पार्किंग की जरूरत का आकलन किए बिना व्यापारिक गतिविधियां बढ़ती जाती हैं, वहां बाद में केवल कार्रवाई के माध्यम से यातायात को स्थायी रूप से व्यवस्थित करना मुश्किल हो जाता है।जरूरत इस बात की है कि राजधानी और न्यायधानी के प्रमुख बाजारों का अलग-अलग यातायात एवं पार्किंग ऑडिट कराया जाए। प्रत्येक बाजार में उपलब्ध पार्किंग क्षमता, रोजाना आने वाले वाहनों की संख्या, पीक आवर में यातायात दबाव, पैदल यात्रियों की आवाजाही और अतिक्रमण की स्थिति का वास्तविक आकलन किया जाए। इसके आधार पर मल्टीलेवल पार्किंग, ऑफ-स्ट्रीट पार्किंग, निर्धारित पार्किंग जोन और आवश्यकता के अनुसार वन-वे यातायात व्यवस्था जैसे विकल्पों पर स्थायी निर्णय लिया जाना चाहिए।इसके साथ ही बाजारों के व्यापारियों को भी जिम्मेदारी से जोड़ना जरूरी है। दुकान की सीमा से बाहर सामान रखना, ग्राहकों के लिए सड़क घेरना या निजी उपयोग के लिए सार्वजनिक पार्किंग स्थल पर कब्जा करना किसी भी स्थिति में शहर की यातायात व्यवस्था के हित में नहीं है। रायपुर में हालिया कार्रवाई के दौरान भी दुकानों के बाहर रखे सामान को हटाने और निर्धारित सीमा में ही व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करने की हिदायत दी गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या शहरों की यातायात व्यवस्था केवल अभियान चलाकर और चालान काटकर सुधारी जा सकती है? यदि पार्किंग की पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था ही उपलब्ध नहीं होगी तो कार्रवाई के बाद भी समस्या लौटती रहेगी। इसलिए जिम्मेदार विभागों को तत्कालीन कार्रवाई से आगे बढ़कर दीर्घकालिक पार्किंग नीति पर काम करना होगा।राजधानी रायपुर और न्यायधानी बिलासपुर दोनों ही तेजी से बढ़ते शहर हैं। ऐसे में आने वाले वर्षों में वाहनों की संख्या और बाजारों का दबाव और बढ़ना स्वाभाविक है। यदि अभी भी पार्किंग और यातायात को लेकर ठोस योजना नहीं बनाई गई तो आज की परेशानी भविष्य में और गंभीर रूप ले सकती है। शहरों को केवल सड़क चौड़ी करने या नो-पार्किंग में चालान करने से व्यवस्थित नहीं किया जा सकता; इसके लिए सड़क, बाजार, पार्किंग, फुटपाथ और सार्वजनिक परिवहन को एक साथ देखते हुए समग्र यातायात व्यवस्था विकसित करनी होगी। फिलहाल राजधानी से न्यायधानी तक जमीनी तस्वीर यही सवाल खड़ा कर रही है कि आखिर पार्किंग संकट के स्थायी समाधान की जिम्मेदारी कौन लेगा और कब तक बाजारों में वाहन पार्किंग के लिए नागरिकों को सड़क और गलियों में जगह तलाशनी पड़ेगी।




