महानदी भवन में प्रवेश पास की व्यवस्था पर उठे सवाल, पत्रकारों को ही क्यों झेलनी पड़ रही कतार की परेशानी? चौथे स्तंभ के प्रतिनिधियों के साथ भेदभाव का आरोप, साप्ताहिक-मासिक समाचार पत्रों और वेबपोर्टल के पत्रकारों में आक्रोश; जनपद-जिला पंचायत अध्यक्ष, महापौर और डिप्टी कलेक्टर जैसे प्रतिष्ठित लोगों में भी नाराजगी।
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ शासन के मंत्रालय महानदी भवन में प्रवेश व्यवस्था को लेकर इन दिनों पत्रकारों और अन्य प्रतिष्ठित आगंतुकों के बीच असंतोष का माहौल दिखाई दे रहा है। शासन-प्रशासन के महत्वपूर्ण केंद्र महानदी भवन में जहां जनपद एवं जिला पंचायत अध्यक्ष, महापौर, डिप्टी कलेक्टर सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रतिष्ठित लोगों का नियमित आना-जाना होता है, वहीं देश के लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों को प्रवेश पास बनवाने के लिए आधा से एक घंटे तक कतार में खड़ा होना पड़ रहा है। इस व्यवस्था को लेकर पत्रकारों में नाराजगी बढ़ती जा रही है और अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर प्रवेश व्यवस्था में पत्रकारों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?सबसे अधिक परेशानी साप्ताहिक एवं मासिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा वेबपोर्टल से जुड़े पत्रकारों को होने की बात सामने आ रही है। इन संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को स्थायी प्रवेश पास के मामले में कथित रूप से अलग नजरिए से देखे जाने का आरोप है। पत्रकारों का कहना है कि समाचार पत्र दैनिक हो, साप्ताहिक हो, मासिक हो अथवा डिजिटल वेबपोर्टल—पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनता की आवाज को शासन और प्रशासन तक पहुंचाना तथा शासन की नीतियों और कार्यप्रणाली को जनता के सामने रखना है। ऐसे में केवल प्रकाशन की आवृत्ति अथवा माध्यम के आधार पर पत्रकारों के साथ अलग-अलग व्यवहार लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।महानदी भवन केवल सरकारी कार्यालयों का परिसर नहीं है, बल्कि प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां मुख्यमंत्री, मंत्री, मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव, सचिव एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालय हैं। प्रदेशभर के पत्रकार शासन के निर्णयों, बैठकों, नीतियों और प्रशासनिक गतिविधियों की जानकारी जुटाने के लिए यहां पहुंचते हैं। ऐसे में यदि किसी पत्रकार को हर बार प्रवेश के लिए लंबी कतार में लगना पड़े और पास बनाने की प्रक्रिया में अनावश्यक समय खर्च हो, तो इसका सीधा असर पत्रकारिता के काम पर पड़ना स्वाभाविक है।पत्रकारों का कहना है कि स्थायी प्रवेश पास की व्यवस्था का उद्देश्य ही नियमित रूप से मंत्रालय आने वाले अधिकृत पत्रकारों को सुगम प्रवेश उपलब्ध कराना होना चाहिए। यदि किसी मान्यता प्राप्त अथवा अधिकृत मीडिया संस्थान के प्रतिनिधि को भी बार-बार सामान्य आगंतुकों की तरह लाइन में लगना पड़े, तो फिर स्थायी पास की उपयोगिता पर ही सवाल खड़ा होता है। विशेषकर साप्ताहिक, मासिक पत्र-पत्रिकाओं और वेबपोर्टलों के पत्रकारों को लेकर यदि अलग व्यवस्था है तो उसके स्पष्ट एवं पारदर्शी नियम सार्वजनिक किए जाने चाहिए।इस व्यवस्था से केवल पत्रकार ही परेशान नहीं बताए जा रहे हैं। महानदी भवन आने वाले जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत अध्यक्ष, महापौर, डिप्टी कलेक्टर तथा अन्य प्रतिष्ठित नागरिकों को भी प्रवेश प्रक्रिया में लगने वाले समय को लेकर असुविधा का सामना करना पड़ता है। उनका कहना है कि महत्वपूर्ण शासकीय कार्य से मंत्रालय पहुंचने वाले लोगों के लिए प्रवेश प्रक्रिया सरल, व्यवस्थित और समयबद्ध होनी चाहिए। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा के आधार पर विशेष सुविधा देने की मांग नहीं, बल्कि निर्धारित श्रेणियों के लिए स्पष्ट और समान नियम लागू करने की आवश्यकता है।यहां सबसे बड़ा सवाल जनसंपर्क विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग की भूमिका को लेकर उठ रहा है। पत्रकारों को मंत्रालय तक पहुंच उपलब्ध कराने और मीडिया प्रतिनिधियों के लिए प्रवेश व्यवस्था को सुचारू बनाने में इन विभागों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में पत्रकारों का आरोप है कि स्थायी पास जारी करने की प्रक्रिया में स्पष्टता और समानता का अभाव है। यदि नियम हैं तो वे सभी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर समान रूप से लागू होने चाहिए और यदि किसी श्रेणी के पत्रकारों को स्थायी पास देने का प्रावधान नहीं है तो उसकी वजह भी सार्वजनिक होनी चाहिए।डिजिटल पत्रकारिता के बढ़ते प्रभाव के दौर में वेबपोर्टल और ऑनलाइन समाचार माध्यमों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज बड़ी संख्या में लोग समाचारों के लिए डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हैं। ऐसे में वेब पत्रकारों को केवल माध्यम के आधार पर कमतर आंकना पत्रकारिता की बदलती प्रकृति को नजरअंदाज करना होगा। इसी तरह साप्ताहिक और मासिक पत्र-पत्रिकाएं भी प्रदेश के सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को लगातार सामने लाती हैं।पत्रकारों का कहना है कि सरकार की योजनाओं और प्रशासनिक गतिविधियों की खबर जनता तक पहुंचाने वाला पत्रकार यदि मंत्रालय के मुख्य द्वार पर ही प्रवेश व्यवस्था की परेशानी में उलझा रहेगा तो वह अपना काम किस तरह प्रभावी ढंग से कर पाएगा? पत्रकारों के लिए मंत्रालय में प्रवेश कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि अपने पेशेवर दायित्व को निभाने की आवश्यकता है। इसलिए प्रवेश व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें सुरक्षा व्यवस्था भी बनी रहे और पत्रकारों को अनावश्यक परेशानी भी न हो।सुरक्षा के नाम पर व्यवस्था को कठोर बनाया जाना समझ में आता है, लेकिन सुरक्षा और सुविधा के बीच संतुलन बनाना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। आधुनिक तकनीक के दौर में अधिकृत पत्रकारों का डिजिटल डेटाबेस तैयार कर स्मार्ट या डिजिटल स्थायी पास, क्यूआर आधारित प्रवेश अथवा पूर्व-पंजीकृत प्रवेश जैसी व्यवस्था लागू की जा सकती है। इससे सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी और प्रवेश द्वार पर लगने वाली लंबी कतारों से भी राहत मिलेगी।अब समय आ गया है कि जनसंपर्क विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग इस पूरे मामले की समीक्षा करें। प्रदेश की राजधानी में स्थित मंत्रालय में पत्रकारों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें दैनिक, साप्ताहिक, मासिक समाचार पत्र-पत्रिकाओं तथा अधिकृत वेबपोर्टल के पत्रकारों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समान मापदंड निर्धारित हों। स्थायी पास की पात्रता, नवीनीकरण और प्रवेश संबंधी नियमों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के भेदभाव की गुंजाइश न रहे।लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले पत्रकार को सुविधा नहीं, सम्मान और निष्पक्ष व्यवस्था चाहिए। महानदी भवन में प्रवेश की व्यवस्था यदि प्रतिष्ठित जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और पत्रकारों के लिए परेशानी का कारण बन रही है तो इसे प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार का विषय माना जाना चाहिए। आखिर जिस चौथे स्तंभ की खबरों के आधार पर सरकार और प्रशासन तक जनता की आवाज पहुंचती है, उसी चौथे स्तंभ के प्रतिनिधियों को प्रवेश द्वार पर आधा-एक घंटे तक कतार में खड़ा करने की व्यवस्था कब बदलेगी? अब निगाहें जनसंपर्क विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग पर हैं कि वे इस समस्या का समाधान कब करते हैं।




