
तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों ‘सेवा’, ‘संकल्प’ और ‘आशीर्वाद’ जैसे बड़े-बड़े राजनीतिक शब्दों की गूंज सुनाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘आधुनिक विश्वकर्मा’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व तथा योगदान को लेकर लगातार राजनीतिक संदेश दे रही है। प्रधानमंत्री के प्रति सम्मान और राजनीतिक श्रेय देना सरकार का अधिकार है। लेकिन इसी राजनीतिक विमर्श के बीच ‘सर्वव्यापी’ का सवाल सीधा है, स्पष्ट है और खुलकर है—अगर नरेंद्र मोदी आधुनिक विश्वकर्मा हैं, तो फिर उस छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को उतनी ही मजबूती और प्रमुखता से क्यों नहीं सामने रखा जा रहा, जिसके निर्माण में उनके प्रधानमंत्रित्व काल की केंद्रीय भूमिका रही?यह सवाल नरेंद्र मोदी के विरोध में नहीं है। यह सवाल अटल बिहारी वाजपेयी के सम्मान का है। यह सवाल भाजपा की अपनी राजनीतिक विरासत के प्रति प्रतिबद्धता का है। और सबसे महत्वपूर्ण, यह सवाल छत्तीसगढ़ के इतिहास की उस स्मृति का है जिसे किसी सरकार, किसी दल या किसी दौर की राजनीति के हिसाब से छोटा-बड़ा नहीं किया जाना चाहिए।
1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ देश के नक्शे पर एक नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में संसद ने राज्य गठन की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी की। छत्तीसगढ़ के निर्माण की मांग इसके पहले लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों का विषय रही थी, लेकिन राज्य गठन का ऐतिहासिक निर्णय अटलजी के प्रधानमंत्रित्व काल में साकार हुआ।
यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक स्मृति और भाजपा की राजनीतिक परंपरा में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम राज्य निर्माण से गहराई से जुड़ा हुआ है।तो फिर सवाल यह है कि जिस छत्तीसगढ़ को अटलजी की राजनीतिक पहल और उनके नेतृत्व में हुए राज्य गठन की ऐतिहासिक विरासत से जोड़ा जाता है, उसी छत्तीसगढ़ में अटलजी की विरासत आज सरकारी राजनीतिक विमर्श में कितनी दिखाई देती है?क्या अटलजी केवल चुनावी भाषणों, पुण्यतिथियों और जयंती के अवसर पर याद किए जाने वाले नेता बनकर रह गए हैं?क्या उनके नाम पर कार्यक्रम आयोजित करना ही उनकी विरासत के प्रति सम्मान का पर्याप्त प्रमाण है?या फिर सरकार को यह भी बताना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के निर्माता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति को स्थायी और संस्थागत रूप देने के लिए उसकी दीर्घकालिक योजना क्या है?यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थे। वे भारतीय राजनीति के ऐसे नेता रहे जिनकी पहचान संवाद, लोकतांत्रिक मर्यादा, सहमति और व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता से बनी। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में उनका नाम राज्य गठन की उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है, जिसने मध्यप्रदेश से अलग एक नए राज्य की राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक यात्रा की शुरुआत की।आज छत्तीसगढ़ की सत्ता भाजपा के हाथ में है। ऐसे में अटलजी की विरासत को लेकर सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है।यदि भाजपा की सरकार अपने राजनीतिक पुरोधाओं को सम्मान देने की बात करती है, तो यह सम्मान केवल तस्वीरों और माल्यार्पण तक सीमित क्यों रहे? अटलजी के नाम पर ऐसी स्थायी संस्थाएं, स्मारक, अध्ययन केंद्र, शोध संस्थान, साहित्यिक एवं लोकतांत्रिक विमर्श के मंच और युवा पीढ़ी को उनके विचारों से जोड़ने वाले कार्यक्रम क्यों नहीं व्यापक रूप से दिखाई देते?
यहां एक और सवाल है—क्या राजनीतिक विरासत भी समय के साथ ‘री-ब्रांड’ होती है?आज यदि किसी समकालीन नेता को विकास का आधुनिक विश्वकर्मा कहा जाता है तो यह राजनीतिक प्रशंसा हो सकती है। लेकिन क्या किसी नए नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए पुराने नेतृत्व की ऐतिहासिक भूमिका धुंधली हो जानी चाहिए?इतिहास में योगदान कोई शून्य-योग का खेल नहीं है। नरेंद्र मोदी को सम्मान देने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी को पीछे करने की जरूरत नहीं है और अटलजी को सम्मान देने के लिए मोदीजी के योगदान को नकारने की भी जरूरत नहीं है। दोनों को उनके-अपने समय, भूमिका और ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जा सकता है।यही तो परिपक्व राजनीति की पहचान होनी चाहिए।आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में अनेक योजनाएं और विकास परियोजनाएं चल रही हैं। राज्य सरकार भी केंद्र की योजनाओं को छत्तीसगढ़ में लागू करने और उनका राजनीतिक श्रेय प्रस्तुत करने का अधिकार रखती है। लेकिन इसके समानांतर राज्य सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि वह अपने राज्य के निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा को नई पीढ़ी के सामने ईमानदारी से रखे।छत्तीसगढ़ का इतिहास 2000 में शुरू नहीं हुआ था और न ही 2026 में समाप्त होगा।राज्य बनने के पीछे दशकों का आंदोलन था। अनेक लोगों का संघर्ष था। अनेक राजनीतिक धाराओं की भूमिका थी। और अंततः केंद्र की राजनीतिक इच्छा-शक्ति ने राज्य निर्माण को संवैधानिक रूप दिया। इस पूरी यात्रा को किसी एक व्यक्ति के नाम तक सीमित करना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा और किसी महत्वपूर्ण भूमिका को भुला देना भी उचित नहीं होगा।इसीलिए ‘सर्वव्यापी’ का सवाल किसी दल के खिलाफ आरोप नहीं, बल्कि सत्ता से एक ऐतिहासिक जवाबदेही का सवाल है।विष्णु देव साय सरकार को बताना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के निर्माण में अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका को वह किस तरह स्थायी रूप से संरक्षित और प्रचारित करने जा रही है?
क्या राज्य में अटलजी के नाम से कोई ऐसी बड़ी संस्थागत पहल होगी जो आने वाली पीढ़ियों को बताए कि छत्तीसगढ़ राज्य कैसे बना?
क्या स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रम और सार्वजनिक इतिहास में राज्य निर्माण की पूरी कहानी को पर्याप्त स्थान दिया जाएगा?क्या अटलजी के नाम पर कोई ऐसा राष्ट्रीय स्तर का शोध एवं अध्ययन केंद्र विकसित किया जाएगा जहां छत्तीसगढ़ निर्माण आंदोलन, राज्य की राजनीति और अटलजी की भूमिका पर गंभीर अध्ययन हो?क्या राजधानी से लेकर संभाग और जिलों तक अटलजी की स्मृति को केवल राजनीतिक आयोजनों से आगे ले जाकर जनस्मृति का हिस्सा बनाया जाएगा?और सबसे बड़ा सवाल—क्या सरकार यह स्पष्ट करेगी कि अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत उसके लिए वास्तव में कितनी महत्वपूर्ण है?क्योंकि राजनीति में शब्द बहुत कुछ कहते हैं, लेकिन प्राथमिकताएं उससे कहीं अधिक कहती हैं।आज ‘सेवा’ की बात हो रही है, ‘संकल्प’ की बात हो रही है, ‘आशीर्वाद’ की बात हो रही है। इन शब्दों के बीच एक और शब्द जुड़ना चाहिए—‘इतिहास’।
जिस राज्य के गठन को भाजपा लंबे समय से अटल बिहारी वाजपेयी की ऐतिहासिक उपलब्धियों में गिनाती रही है, वहां अटलजी की स्मृति को राजनीतिक सुविधा के हिसाब से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सम्मान के साथ स्थापित किया जाना चाहिए।अटलजी को याद करना किसी एक दल का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। यह छत्तीसगढ़ की सामूहिक स्मृति का हिस्सा होना चाहिए।और यही वह जगह है जहां वर्तमान सरकार से सवाल पूछा जाना जरूरी है।क्या छत्तीसगढ़ में अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को वह सम्मान मिलेगा, जिसकी अपेक्षा उनके नाम से बने इस राज्य की जनता कर सकती है?क्योंकि प्रधानमंत्री बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक नारे बदलते हैं और विकास के मॉडल भी बदलते हैं—लेकिन राज्य के निर्माण का इतिहास नहीं बदलना चाहिए।
छत्तीसगढ़ को आधुनिक बनाने की दौड़ में आज के नेताओं का योगदान दर्ज होना चाहिए, लेकिन उस इतिहास की पहली महत्वपूर्ण राजनीतिक इबारतों को भी मिटाया नहीं जाना चाहिए।नरेंद्र मोदी को ‘आधुनिक विश्वकर्मा’ कहने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी को छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक स्मृति में उनका उचित स्थान दिलाना भी उतना ही जरूरी है।
क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि अटलजी को कितना याद किया जा रहा है।सवाल यह है कि—जिस अटल ने छत्तीसगढ़ को राज्य का नाम और पहचान दिलाने की ऐतिहासिक प्रक्रिया को मुकाम तक पहुंचाया, क्या उसी छत्तीसगढ़ की सत्ता आज अटल की विरासत को उसका पूरा सम्मान दे रही है?यह सवाल सत्ता से है।यह सवाल इतिहास से है।और यह सवाल छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढ़ियों से भी है।




