
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के निर्वाचन क्षेत्र बिल्हा के विकासखंड शिक्षा विभाग में सामने आए कथित फर्जी मेडिकल भुगतान घोटाले ने अब शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में शिक्षक पति-पत्नी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज हो चुकी है। पति के जेल में होने और पत्नी के फरार बताए जाने के बाद अब असली सवाल यह उठ रहा है कि कथित फर्जी मेडिकल भुगतान केवल लाभ लेने वाले व्यक्तियों के भरोसे आखिर कैसे हो गया? जिन विभागीय स्तरों से दस्तावेजों की जांच हुई, जिन अधिकारियों की संस्तुति और अनुमोदन के बाद भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ी, उनकी जवाबदेही कब तय होगी?मामला अब केवल दो व्यक्तियों तक सीमित मानकर बंद कर देने का नहीं है। यदि मेडिकल भुगतान के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों, बिलों या अभिलेखों का इस्तेमाल हुआ और उसके आधार पर शासकीय राशि का भुगतान हुआ, तो भुगतान से पहले होने वाली विभागीय जांच, सत्यापन, अनुशंसा और स्वीकृति की पूरी श्रृंखला की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है। आखिर किस स्तर पर दस्तावेजों की जांच हुई, किस अधिकारी या कर्मचारी ने भुगतान की अनुशंसा की, किसके हस्ताक्षर से प्रक्रिया आगे बढ़ी और जिला शिक्षा विभाग बिलासपुर तक मामला किस प्रकार पहुंचा—इन सभी सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि कथित फर्जीवाड़ा इतना गंभीर था कि आरोपी शिक्षक के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज हुआ और उसे जेल जाना पड़ा, तो क्या विभागीय जांच केवल आरोपियों की पहचान तक ही सीमित रहेगी? जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी दस्तावेजों की जांच करने, अभिलेखों का सत्यापन करने और शासकीय धन के भुगतान से पहले उसकी वैधता सुनिश्चित करने की थी, उनकी भूमिका की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या लापरवाही, मिलीभगत या पर्यवेक्षण में गंभीर कमी की संभावनाओं को दरकिनार कर दिया जाएगा?विकासखंड शिक्षा विभाग बिल्हा और जिला शिक्षा विभाग बिलासपुर की प्रशासनिक जवाबदेही भी इस मामले में महत्वपूर्ण है। किसी भी मेडिकल प्रतिपूर्ति भुगतान की प्रक्रिया में केवल आवेदनकर्ता ही शामिल नहीं होता, बल्कि आवेदन के परीक्षण से लेकर संबंधित दस्तावेजों के सत्यापन और भुगतान तक कई स्तरों की प्रशासनिक प्रक्रिया होती है। इसलिए जांच का दायरा केवल शिक्षक दंपती तक सीमित रखने के बजाय उस पूरी फाइल की पड़ताल की जानी चाहिए, जिसके माध्यम से कथित भुगतान स्वीकृत और जारी हुआ।स्थानीय स्तर पर अब यह चर्चा तेज है कि यदि आरोपी पति-पत्नी पर कानूनी कार्रवाई संभव है तो विभागीय स्तर पर कथित लापरवाही या संभावित भूमिका के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई कब होगी? क्या विभागीय जिम्मेदारों से पूछताछ की जाएगी? क्या मेडिकल बिलों और दस्तावेजों का सत्यापन करने वाले अधिकारियों की पहचान होगी? क्या भुगतान की पूरी फाइल, नोटशीट और संस्तुतियों की जांच कराई जाएगी? और यदि किसी स्तर पर जानबूझकर अनियमितता, मिलीभगत या गंभीर लापरवाही प्रमाणित होती है तो क्या उनके विरुद्ध भी एफआईआर दर्ज होगी?बिल्हा के इस मामले ने शिक्षा विभाग के भीतर शासकीय भुगतान व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि एक कथित फर्जी मेडिकल भुगतान प्रकरण सामने आया है, तो यह भी जांच का विषय है कि क्या इसी प्रकार के अन्य भुगतान मामलों की भी विशेष ऑडिट या विभागीय जांच कराई गई है अथवा कराई जाएगी। केवल एक प्रकरण में आरोपियों पर कार्रवाई करके व्यवस्था को दोषमुक्त नहीं माना जा सकता।पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े इस संवेदनशील मामले में शासन और शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों से यह अपेक्षा की जा रही है कि जांच निष्पक्ष, व्यापक और बिना किसी संरक्षण के हो। दोषी चाहे शिक्षक हों, कर्मचारी हों या अधिकारी—कानून और विभागीय कार्रवाई का मानदंड सभी के लिए समान होना चाहिए।अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि फर्जी मेडिकल भुगतान मामले में दर्ज एफआईआर के बाद जांच की दिशा कितनी दूर तक जाती है। पति जेल में है, पत्नी फरार बताई जा रही है, लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है—यदि कथित रूप से फर्जी भुगतान हुआ, तो उसे स्वीकृत करने और शासकीय धन जारी करने की प्रशासनिक जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? और विकासखंड शिक्षा विभाग बिल्हा से लेकर जिला शिक्षा विभाग बिलासपुर तक जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर कानूनी कार्रवाई कब होगी?यह सवाल केवल एक मेडिकल भुगतान का नहीं, बल्कि शासकीय व्यवस्था में जवाबदेही का है। आरोपी पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन व्यवस्था की जांच उससे भी ज्यादा जरूरी है।




