
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

स्कूल शिक्षा विभाग में व्याख्याताओं के स्थानांतरण से जुड़ा एक मामला मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की स्पष्ट टीप के बाद भी लंबित बना हुआ है। मुख्यमंत्री कार्यालय से प्राप्त निर्देशों के बावजूद अब तक स्थानांतरण संबंधी प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ने से प्रभावित शिक्षकों में निराशा और विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठने लगे हैं।जानकारी के अनुसार स्कूल शिक्षा विभाग के अवर सचिव आर.पी. वर्मा ने पत्र क्रमांक ESTB/25528/2026-SCHOOL EDUCATION SECTION-1/574190/2026 के माध्यम से संचालक लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई), छत्तीसगढ़ को निर्देशित किया था कि माननीय मुख्यमंत्री द्वारा अंकित टीप के परिप्रेक्ष्य में प्राप्त अभ्यावेदनों का परीक्षण कर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए। पत्र में स्पष्ट रूप से मुख्यमंत्री की टीप का उल्लेख करते हुए विभागीय स्तर पर आवश्यक पहल करने के निर्देश दिए गए थे।
बताया जा रहा है कि इसी प्रकरण में करीब छह माह पूर्व सेवानिवृत्त उप संचालक लोक शिक्षण संचालनालय आशुतोष चावरे द्वारा संबंधित व्याख्याताओं के स्थानांतरण के संबंध में परीक्षण उपरांत अनुशंसा प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा गया था। लेकिन उक्त प्रस्ताव पर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका है।
अब जब स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने स्थानांतरण संबंधी अभ्यावेदनों पर कार्रवाई के लिए स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को निर्देशित किया है, तब भी डीपीआई स्तर से पुनः प्रस्ताव मंगाए जाने की प्रक्रिया ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विभागीय जानकारों का कहना है कि जब पूर्व में ही सक्षम अधिकारी द्वारा परीक्षण कर अनुशंसा प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है, तो उसी विषय पर दोबारा प्रस्ताव की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, यह स्पष्ट नहीं है।
मुख्यमंत्री की टीप के बाद भी क्यों लंबित है निर्णय?
शिक्षक संगठनों और प्रभावित व्याख्याताओं का कहना है कि स्थानांतरण जैसे विषयों में पहले ही लंबी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अभ्यावेदनों का परीक्षण, दस्तावेजों की जांच और अनुशंसा की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी यदि फाइलें अलग-अलग स्तरों पर घूमती रहेंगी तो शासन की मंशा पर भी असर पड़ेगा।शिक्षकों का कहना है कि मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं संज्ञान लेकर कार्रवाई के निर्देश दिए जाना इस बात का संकेत है कि प्रकरण को गंभीरता से लिया गया है। ऐसे में विभागीय स्तर पर त्वरित निर्णय लेकर लंबित मामलों का निराकरण किया जाना चाहिए।
प्रशासनिक प्रक्रिया या अनावश्यक विलंब?
स्कूल शिक्षा विभाग में स्थानांतरण संबंधी मामलों को लेकर पहले भी देरी के आरोप लगते रहे हैं। इस मामले में भी सवाल उठ रहा है कि मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद यदि संबंधित शाखा और डीपीआई के बीच ही प्रस्तावों का आदान-प्रदान चलता रहा तो प्रभावित कर्मचारियों को न्याय कब मिलेगा।अब निगाहें स्कूल शिक्षा विभाग और लोक शिक्षण संचालनालय की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। देखना होगा कि मुख्यमंत्री की टीप के बाद लंबित स्थानांतरण प्रस्तावों पर शीघ्र निर्णय लिया जाता है या मामला एक बार फिर विभागीय प्रक्रिया में उलझा रहता है।




