
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
पत्रकारों के अधिकार, एकजुटता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के उद्देश्य से स्थापित बिलासपुर प्रेस क्लब इन दिनों अपने मूल उद्देश्य से भटकता हुआ दिखाई दे रहा है। पत्रकारों की आवाज़ बुलंद करने वाला मंच अब स्वयं आंतरिक विवादों, गुटबाजी और राजनीतिक खींचतान का केंद्र बन गया है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के बीच का विवाद अब आपसी बैठकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिकायतों का सिलसिला जिला कलेक्टर कार्यालय तक पहुंच गया है।स्थिति यह है कि प्रेस क्लब के नाम पर दो अलग-अलग व्हाट्सएप ग्रुप संचालित हो रहे हैं और दोनों मंचों पर लगातार आरोप-प्रत्यारोप, सफाई, प्रतिवाद और व्यक्तिगत टिप्पणियों का दौर चल रहा है। जिस मंच पर पत्रकारिता की गरिमा, लोकतांत्रिक संवाद और पेशेवर मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए, वहां अब गुटीय राजनीति हावी होती दिखाई दे रही है।
सूत्रों के अनुसार वर्तमान पदाधिकारियों के बीच मतभेद इतने गहरे हो चुके हैं कि एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतें, आरोप और दस्तावेज सार्वजनिक किए जा रहे हैं। इससे यह संदेश जा रहा है कि प्रेस क्लब के भीतर संवाद और सामंजस्य की जगह अविश्वास और टकराव ने ले ली है। इसका असर केवल पदाधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य सदस्य भी असमंजस और असहज स्थिति का सामना कर रहे हैं।दिलचस्प बात यह भी है कि विवाद केवल वर्तमान कार्यकारिणी तक सीमित नहीं रहा। चर्चाओं में वर्ष 2014 की कार्यकारिणी और उस समय के पदाधिकारियों का भी उल्लेख किया जा रहा है।
एक पूर्व अध्यक्ष भी सार्वजनिक रूप से पुराने कार्यकाल से जुड़े मुद्दों को सामने लाते नजर आ रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि वर्षों से दबे मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं।प्रेस क्लब जैसी संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पत्रकारों के हितों की रक्षा, प्रशिक्षण, संवाद और लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करने का माध्यम बने। लेकिन जब संस्था स्वयं आंतरिक विवादों में उलझ जाए तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। शहर के वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि व्यक्तिगत मतभेदों को सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर ले जाने से संस्था की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है और समाज में पत्रकारिता की सामूहिक छवि भी कमजोर पड़ती है।
जानकारों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन उनका समाधान संगठन के संविधान, पारदर्शी संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होना चाहिए। यदि विवाद लगातार सार्वजनिक होते रहे तो आने वाले समय में प्रेस क्लब की कार्यप्रणाली, सदस्यता और चुनावी प्रक्रिया को लेकर भी नए सवाल खड़े हो सकते हैं।फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिलासपुर प्रेस क्लब अपने मूल उद्देश्य की ओर लौट पाएगा, या फिर गुटबाजी और राजनीतिक ध्रुवीकरण उसकी पहचान बन जाएगा?
पत्रकारों की एकता और संस्था की गरिमा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सभी पक्ष व्यक्तिगत आरोपों से ऊपर उठकर संगठनात्मक हित को प्राथमिकता दें। क्योंकि यदि पत्रकारों का अपना मंच ही विवादों का अखाड़ा बन जाएगा, तो सत्ता और व्यवस्था से जवाबदेही मांगने की उसकी नैतिक शक्ति भी कमजोर पड़ सकती है।




