
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के वन विभाग में एक बार फिर प्रशासनिक फैसले को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। बिलासपुर संभाग के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वन मंडल में पदस्थ डीएफओ ग्रीष्मी चांद को शासन द्वारा यहां से हटाकर छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम में प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने का आदेश जारी किया गया है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के विशेष सचिव जे.पी. पाठक के हस्ताक्षर से जारी आदेश के बाद वन विभाग के भीतर और बाहर इस फैसले को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर मरवाही जैसे महत्वपूर्ण वन मंडल में वन संरक्षण, विभागीय पारदर्शिता और कथित अनियमितताओं के खिलाफ सख्ती से काम करने वाली अधिकारी को हटाकर वन विकास निगम में प्रतिनियुक्ति पर भेजने की जरूरत क्यों पड़ी? यदि प्रशासनिक आवश्यकता के चलते उनका स्थानांतरण किया जाना था, तो उन्हें प्रदेश के किसी अन्य बड़े वन मंडल की जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई? विभाग के इस फैसले को लेकर अब तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं।ग्रीष्मी चांद की मरवाही वन मंडल में पदस्थापना के बाद से वन विभाग की कार्यप्रणाली, वन संरक्षण, कैम्पा से जुड़े कार्यों तथा विभागीय गतिविधियों में पारदर्शिता को लेकर कई स्तरों पर सख्ती दिखाई गई। यही वजह है कि उनके अचानक तबादले को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि शासन के आदेश में प्रतिनियुक्ति के पीछे क्या प्रशासनिक कारण हैं, इसका स्पष्ट उल्लेख सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है, लेकिन विभागीय गलियारों में इस फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
मरवाही वन मंडल लंबे समय से विभिन्न कारणों से सुर्खियों में रहा है। वन क्षेत्र में होने वाले विकास कार्यों, कैम्पा मद की राशि, निर्माण कार्यों, पौधरोपण, वन संरक्षण और विभागीय खर्चों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में जब किसी अधिकारी द्वारा कथित अनियमितताओं पर सख्ती बरती जाती है और विभागीय व्यवस्था में पारदर्शिता लाने का प्रयास किया जाता है, तब उसी अधिकारी को अचानक महत्वपूर्ण वन मंडल से हटाने का निर्णय स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन जाता है।
क्या ईमानदारी की कीमत प्रतिनियुक्ति है?
यही सवाल अब वन विभाग के कर्मचारियों और आम लोगों के बीच भी उठ रहा है। यदि किसी अधिकारी का कार्यकाल प्रशासनिक दृष्टि से संतोषजनक रहा है और उसके खिलाफ कोई गंभीर प्रतिकूल तथ्य शासन के सामने नहीं है, तो फिर उसे किसी अन्य महत्वपूर्ण वन मंडल में जिम्मेदारी देने के बजाय वन विकास निगम में प्रतिनियुक्ति पर भेजने का निर्णय क्यों लिया गया? क्या यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई अन्य कारण है?
यह भी उल्लेखनीय है कि मरवाही जैसे संवेदनशील वन मंडल में अधिकारियों के लगातार बदलाव का सीधा असर विभागीय कामकाज और वन संरक्षण की योजनाओं पर पड़ सकता है। एक अधिकारी द्वारा शुरू किए गए कार्यों और सुधारात्मक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासनिक निरंतरता जरूरी होती है। ऐसे में अचानक बदलाव से उन कार्यों की गति पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।वन विभाग में लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि अधिकारियों के स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति के फैसले पारदर्शी आधार पर लिए जाएं और यदि किसी अधिकारी को महत्वपूर्ण पद से हटाया जाता है तो उसके पीछे प्रशासनिक कारण भी स्पष्ट होने चाहिए।
खासकर ऐसे मामलों में जहां संबंधित अधिकारी ने विभागीय स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता दी हो, वहां शासन के फैसले को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब दिया जाना जरूरी हो जाता है।ग्रीष्मी चांद को मरवाही से हटाकर वन विकास निगम भेजे जाने के फैसले ने अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह महज एक सामान्य प्रशासनिक तबादला है या फिर सख्त कार्यशैली की कीमत? शासन के आदेश में इसका उत्तर भले ही स्पष्ट न हो, लेकिन इस फैसले ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और अधिकारियों के स्थानांतरण की नीति पर बहस जरूर छेड़ दी है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि शासन इस प्रतिनियुक्ति के पीछे वास्तविक प्रशासनिक कारण क्या बताता है और क्या वन विभाग इस संबंध में कोई स्पष्टता सामने रखता है। क्योंकि यदि यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है तो उसके कारण सार्वजनिक किए जाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। वहीं यदि अधिकारी को उनके कार्यों के कारण हटाया गया है, तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि ईमानदार और निष्पक्ष कार्यशैली रखने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहन मिलेगा या उन्हें ही इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी?
मरवाही वन मंडल से जुड़े इस फैसले ने फिलहाल वन विभाग के गलियारों में एक ही चर्चा को जन्म दिया है—“डीएफओ को मिली ईमानदारी की सजा, या फिर यह महज प्रशासनिक बदलाव?” इसका वास्तविक जवाब अब शासन की ओर से ही सामने आना बाकी है।



