तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक गलियारों में एक बार फिर कुछ जिलों के कलेक्टरों को बदले जाने की सुगबुगाहट तेज होने की चर्चा है। संभावित फेरबदल की खबरों के बीच कुछ अधिकारी अपनी कुर्सी बचाने के लिए सत्ता और प्रशासन के प्रभावशाली गलियारों में संपर्क साधने और अपने-अपने स्तर पर ‘जुगाड़’ बैठाने में जुटे होने की चर्चाएं सामने आ रही हैं। हालांकि संभावित तबादलों को लेकर शासन स्तर से अभी कोई आधिकारिक सूची या घोषणा सामने नहीं आई है, लेकिन मंत्रालय से लेकर जिलों तक चल रही चर्चाओं ने प्रशासनिक हलकों में हलचल जरूर बढ़ा दी है।इन चर्चाओं के बीच सबसे गंभीर सवाल जिला खनिज संस्थान न्यास यानी डीएमएफ (District Mineral Foundation) मद को लेकर उठ रहे हैं। जिलों में खनिज प्रभावित क्षेत्रों के विकास और जनहित से जुड़े कार्यों के लिए उपलब्ध इस महत्वपूर्ण मद को लेकर लंबे समय से पारदर्शिता और प्राथमिकता के सवाल उठते रहे हैं। अब आरोप यह लगाए जा रहे हैं कि कुछ स्थानों पर डीएमएफ मद से कार्य स्वीकृत कराने और ठेकेदारों अथवा संबंधित एजेंसियों को काम दिलाने के लिए कथित तौर पर ‘कमीशन’ की व्यवस्था प्रभावी है।प्रशासनिक गलियारों में यह तक चर्चा है कि कथित रूप से 10 प्रतिशत तक कमीशन के बिना डीएमएफ के काम आगे बढ़ाना मुश्किल होता है। यदि यह आरोप कहीं वास्तविकता में बदल रहा है तो यह केवल आर्थिक अनियमितता का विषय नहीं, बल्कि शासन की उस पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है जिसके माध्यम से खनिज संपदा से प्राप्त राशि को प्रभावित क्षेत्रों के विकास में खर्च किया जाना है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र और दस्तावेजी पुष्टि आवश्यक है।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि डीएमएफ की राशि वास्तव में कमीशनखोरी की भेंट चढ़ रही है तो इसकी निगरानी कौन कर रहा है? कार्यों की स्वीकृति से लेकर निविदा, कार्यादेश, भुगतान और गुणवत्ता परीक्षण तक की पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती? क्या जिला स्तर पर होने वाली बैठकों और स्वीकृतियों की नियमित एवं निष्पक्ष समीक्षा होती है? और यदि होती है तो कथित कमीशनखोरी की चर्चाएं बार-बार प्रशासनिक गलियारों में क्यों सुनाई देती हैं?डीएमएफ कोई सामान्य बजट मद नहीं है। यह उन क्षेत्रों और लोगों के हितों से जुड़ा धन है, जहां खनन गतिविधियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है। ऐसे में इस मद से सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, अधोसंरचना और अन्य जनहितकारी कार्यों के बजाय यदि कथित तौर पर ठेकेदारी हित और कमीशन का खेल प्राथमिकता बनने लगे तो यह व्यवस्था की आत्मा के साथ खिलवाड़ होगा।कुर्सी बचाने की कवायद या प्रशासनिक मूल्यांकन?संभावित कलेक्टर तबादलों की चर्चा के बीच एक दूसरा सवाल भी महत्वपूर्ण है। आखिर किसी जिले के कलेक्टर का मूल्यांकन किन आधारों पर होना चाहिए—जनहित में काम, प्रशासनिक दक्षता, कानून-व्यवस्था, विकास योजनाओं की गति और पारदर्शिता या फिर राजनीतिक एवं प्रशासनिक पहुंच?यदि किसी अधिकारी की कुर्सी बचाने के लिए प्रभावशाली लोगों के माध्यम से दबाव बनाने की जरूरत पड़ रही है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता। पदस्थापना यदि योग्यता और प्रदर्शन के बजाय पहुंच एवं प्रभाव से प्रभावित होने लगे तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को ही उठाना पड़ता है।आज जरूरत इस बात की है कि संभावित तबादलों की अटकलों से अधिक कलेक्टरों के कार्यकाल और निर्णयों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जाए। किस जिले में डीएमएफ की कितनी राशि आई, किन कार्यों पर कितनी राशि स्वीकृत हुई, किन एजेंसियों को काम मिला, कार्यों की वास्तविक लागत क्या थी, भुगतान कितना हुआ और जमीनी स्तर पर उसका परिणाम क्या निकला—इन सभी सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।‘दस प्रतिशत’ की चर्चा पर हो निष्पक्ष जांचयदि डीएमएफ मद में 10 प्रतिशत कमीशन लिए जाने का आरोप कहीं लगाया जा रहा है तो शासन को इसे महज अफवाह मानकर नजरअंदाज करने के बजाय स्वतंत्र वित्तीय एवं प्रशासनिक जांच करानी चाहिए। पिछले वर्षों में स्वीकृत बड़े डीएमएफ कार्यों का रैंडम ऑडिट, कार्यादेश से भुगतान तक की फाइलों की जांच और जमीनी सत्यापन कराया जाए तो सच्चाई सामने आने में देर नहीं लगेगी।जरूरत पड़े तो ऐसे कार्यों में शामिल अधिकारियों, एजेंसियों और ठेकेदारों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। क्योंकि भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी ताकत पैसा नहीं, बल्कि चुप्पी और संरक्षण होता है।छत्तीसगढ़ में यदि कलेक्टर बदलते हैं तो यह शासन का सामान्य प्रशासनिक अधिकार है। लेकिन तबादलों के साथ एक और परंपरा मजबूत होनी चाहिए—हर जिले के प्रशासनिक कामकाज की पारदर्शी समीक्षा। कौन अधिकारी जनता के लिए काम कर रहा है और कौन व्यवस्था को निजी लाभ का माध्यम बना रहा है, इसका हिसाब भी होना चाहिए।सवाल किसी एक अधिकारी या किसी एक जिले का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें गरीब और खनन प्रभावित जनता के नाम पर उपलब्ध धन यदि कथित कमीशन की चर्चाओं में उलझ जाए तो विकास का दावा खोखला साबित होता है।कुर्सियां बदलना आसान है, लेकिन व्यवस्था बदलना कठिन। अब देखना यह है कि संभावित प्रशासनिक फेरबदल केवल चेहरों का बदलाव बनकर रह जाता है या डीएमएफ जैसे संवेदनशील मद में पारदर्शिता और जवाबदेही की नई शुरुआत भी करता है।



