
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ भाजपा की राजनीति में प्रदेश प्रभारी की भूमिका एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। वर्तमान प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी के नेतृत्व में पार्टी की संगठनात्मक गतिविधियों और बैठकों के बीच पूर्व प्रदेश प्रभारी डी. पुरंदेश्वरी के कार्यकाल से तुलना होने लगी है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या स्मृति ईरानी भी पुरंदेश्वरी की तरह मंत्रियों, विधायकों और सांसदों की कार्यप्रणाली पर सख्ती दिखाते हुए संगठन में जवाबदेही सुनिश्चित कर पाएंगी? या फिर प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका मुख्य रूप से बैठकों, संवाद और संगठनात्मक समन्वय तक सीमित रहेगी?पूर्व प्रदेश प्रभारी डी. पुरंदेश्वरी के कार्यकाल को याद करते हुए राजनीतिक हलकों में उनके संगठनात्मक हस्तक्षेप और नेताओं से जवाबदेही की अपेक्षाओं की चर्चा की जाती है। उनके दौर में पार्टी संगठन और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय, सरकार के कामकाज तथा कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं जैसे विषय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे। इसी पृष्ठभूमि में अब स्मृति ईरानी की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, दोनों नेताओं की कार्यप्रणाली में अंतर को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उनके कार्यकाल की बैठकों, निर्देशों और फैसलों का तथ्यात्मक आकलन आवश्यक है।वर्तमान में चल रही बैठकों के बीच राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि प्रदेश प्रभारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली की समीक्षा करना है। मंत्रियों के विभागीय कामकाज, विधायकों की क्षेत्रीय सक्रियता, सांसदों की जनता के प्रति जवाबदेही और कार्यकर्ताओं की समस्याओं के समाधान जैसे मुद्दों पर संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या बैठकों में इन विषयों पर स्पष्ट समीक्षा हो रही है और क्या संबंधित जनप्रतिनिधियों को सुधार के लिए ठोस निर्देश दिए जा रहे हैं?भाजपा की प्रदेश सरकार में मंत्रियों के कामकाज और जनप्रतिनिधियों की सक्रियता को लेकर जनता तथा पार्टी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। सत्ता में होने के कारण पार्टी के सामने सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर सामने आने वाली शिकायतों का समाधान करने की जिम्मेदारी भी है। यदि किसी क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, जनसमस्याओं के निराकरण में देरी अथवा जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो संगठन के लिए उनकी समीक्षा करना स्वाभाविक रूप से आवश्यक हो जाता है।इसी संदर्भ में स्मृति ईरानी की भूमिका को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज है। क्या वे प्रदेश के मंत्रियों, विधायकों और सांसदों से उनके कामकाज का हिसाब लेंगी? क्या संगठन के भीतर जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होंगे? और क्या पार्टी नेतृत्व उन शिकायतों पर भी ध्यान देगा, जिनका असर जमीनी स्तर पर संगठन की सक्रियता तथा जनता के साथ उसके संवाद पर पड़ सकता है? ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब आने वाले समय में प्रदेश प्रभारी की बैठकों, संगठनात्मक फैसलों और उनके क्रियान्वयन से सामने आएंगे।हालांकि, किसी प्रदेश प्रभारी की कार्यशैली का आकलन केवल बैठकों की संख्या या सख्त निर्देशों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि बैठकों में लिए गए निर्णयों का कितना पालन हुआ, जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली में क्या बदलाव आया और कार्यकर्ताओं की समस्याओं के समाधान में कितनी प्रगति हुई। पुरंदेश्वरी के कार्यकाल से तुलना करते समय भी इन्हीं मानकों को आधार बनाना अधिक उचित होगा।फिलहाल, छत्तीसगढ़ भाजपा की राजनीति में स्मृति ईरानी की भूमिका को लेकर उठ रही चर्चाओं के बीच संगठन की जवाबदेही और जनप्रतिनिधियों के कामकाज की समीक्षा प्रमुख विषय बनकर उभर रहे हैं। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि वर्तमान बैठकों से क्या ठोस दिशा निकलती है और प्रदेश प्रभारी के स्तर पर लिए गए निर्णय जमीनी राजनीति में किस तरह दिखाई देते हैं। राजनीतिक चर्चा का असली केंद्र यही है कि संगठनात्मक बैठकों का असर केवल कागजों और बयानों तक रहेगा या मंत्रियों, विधायकों और सांसदों की कार्यप्रणाली की समीक्षा के रूप में भी सामने आएगा।




