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2018 का भूमि पूजन… 2026 का श्रेय पूजन!डोंगरगढ़–कटघोरा रेल परियोजना पर फिर सियासत, पुराने शिलान्यास पर नया श्रेय लेने की कोशिश के आरोप।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

डोंगरगढ़–कटघोरा रेल परियोजना एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। पिछले दो दिनों से भाजपा नेताओं द्वारा मुख्यमंत्री और क्षेत्रीय सांसद की केंद्रीय रेल मंत्री से हुई मुलाकात को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। इसे परियोजना को गति मिलने और केंद्र की महत्वपूर्ण स्वीकृति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

लेकिन इस प्रचार के बाद कई गंभीर सवाल भी उठने लगे हैं।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि इस परियोजना को अब स्वीकृति मिली है, तो वर्ष 2018 में इसका भूमि पूजन किस आधार पर किया गया था (देखें आमंत्रण पत्र भूमि पूजन का) ? और यदि भूमि पूजन तथा परियोजना की औपचारिक शुरुआत पहले ही हो चुकी थी, तो आठ वर्षों बाद भी परियोजना धरातल पर क्यों दिखाई नहीं दे रही है?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी बड़ी परियोजना का भूमि पूजन तभी किया जाता है जब उसे सिद्धांततः स्वीकृति मिल चुकी हो। ऐसे में आज उसी परियोजना को नई उपलब्धि बताकर प्रस्तुत करना जनता के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न करता है।विपक्ष का आरोप है कि भाजपा सरकार विकास कार्यों को आगे बढ़ाने की बजाय पुराने कार्यों पर नया राजनीतिक श्रेय लेने में अधिक रुचि दिखा रही है। उनका कहना है कि यदि वास्तव में सरकार इस परियोजना को लेकर गंभीर है, तो जनता को यह बताया जाना चाहिए कि वर्ष 2018 से वर्ष 2026 तक परियोजना किस चरण में रही, कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितना कार्य पूरा हुआ और देरी के लिए कौन जिम्मेदार रहा।

डोंगरगढ़–कटघोरा रेल लाइन लंबे समय से क्षेत्र की बहुप्रतीक्षित परियोजनाओं में शामिल रही है। इसके पूरा होने से खनिज, उद्योग, व्यापार, पर्यटन और स्थानीय आवागमन को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जाती रही है। यही कारण है कि क्षेत्र की जनता केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि वास्तविक निर्माण कार्य देखना चाहती है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लोकतंत्र में किसी भी सरकार को अपनी उपलब्धियां बताने का पूरा अधिकार है, लेकिन पूर्व में घोषित एवं शिलान्यास हो चुकी परियोजनाओं को नए रूप में प्रस्तुत करने से पहले पूरी तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करना भी उतना ही आवश्यक है।

अब जनता के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि परियोजना आठ वर्ष पहले शुरू हो चुकी थी, तो उसकी प्रगति इतनी धीमी क्यों रही? क्या यह प्रशासनिक देरी थी, वित्तीय बाधा थी या फिर केवल राजनीतिक घोषणाओं तक ही मामला सीमित रहा?

जनता की अपेक्षा स्पष्ट है—उसे शिलान्यास और श्रेय की राजनीति से अधिक निर्माण कार्य, समयबद्ध क्रियान्वयन और परियोजना के पूर्ण होने की प्रतीक्षा है। आने वाले समय में सरकार को इन सवालों के तथ्यात्मक उत्तर देने होंगे, क्योंकि विकास का वास्तविक पैमाना प्रचार नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला कार्य होता है।

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