तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में वरिष्ठ अधिकारियों की व्यस्तता और आम नागरिकों के प्रति संवादहीनता को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। शासन-प्रशासन में बैठे वरिष्ठ अधिकारियों तक जब किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, पत्रकार या संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारी का संदेश पहुंचता है, तो स्वाभाविक अपेक्षा रहती है कि कम से कम उस संदेश का संक्षिप्त उत्तर देकर उसकी प्राप्ति की पुष्टि की जाए। लेकिन कई मामलों में ऐसा प्रतीत होता है कि संदेश पढ़े जाने के बावजूद जवाब देना आवश्यक नहीं समझा जाता। यही स्थिति अब प्रशासनिक कार्यसंस्कृति और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर रही है।दरअसल, किसी वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत इच्छा या स्वार्थ के लिए ही संपर्क करे, यह जरूरी नहीं है। अनेक बार किसी सामाजिक समस्या, जनहित के मुद्दे, किसी संस्था की मांग, प्रशासनिक परेशानी अथवा गंभीर शिकायत को शासन के संज्ञान में लाने के लिए ही अधिकारी से संपर्क किया जाता है। ऐसे में यदि संबंधित अधिकारी से मुलाकात का समय नहीं मिल पा रहा है तो कम से कम एक छोटा-सा संदेश—“प्रकरण देख रहे हैं”, “संबंधित अधिकारी को भेजा गया है”, “समय मिलने पर चर्चा करेंगे”—भी सामने वाले व्यक्ति के लिए पर्याप्त होता है।वरिष्ठ अधिकारियों की व्यस्तता निश्चित रूप से समझी जा सकती है। एक अधिकारी के पास अनेक विभागीय जिम्मेदारियां, बैठकों, फाइलों और प्रशासनिक निर्णयों का दबाव होता है। लेकिन क्या एक संदेश का जवाब देना भी इतना कठिन है कि कई-कई दिनों तक संदेश अनुत्तरित पड़े रहें? सवाल अधिकारी की व्यस्तता पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवाद की संस्कृति पर है।छत्तीसगढ़ में सरकार पारदर्शी, संवेदनशील और जवाबदेह प्रशासन की बात करती रही है। ऐसे में शासन के वरिष्ठ अधिकारियों और जनता के बीच संवाद की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। कोई व्यक्ति यदि पूरी उम्मीद के साथ किसी वरिष्ठ अधिकारी को अपनी बात पहुंचाता है और उसे यह तक पता नहीं चलता कि उसकी बात देखी गई या नहीं, तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से निराशा पैदा होती है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर मिलने वाला व्यक्ति बेवजह किसी अधिकारी का समय लेने नहीं पहुंचता। कई लोग महीनों तक किसी विषय पर जानकारी जुटाते हैं, दस्तावेज तैयार करते हैं और फिर किसी वरिष्ठ अधिकारी तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों को यदि लगातार नजरअंदाज किया जाए तो धीरे-धीरे व्यवस्था के प्रति भरोसा कमजोर होता है।यहां सवाल यह भी है कि क्या वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालयों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हो सकती, जिसके माध्यम से महत्वपूर्ण संदेशों और जनहित से जुड़े प्रकरणों की निगरानी की जा सके? यदि अधिकारी स्वयं जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं तो उनका स्टाफ भी संदेश प्राप्त होने की जानकारी दे सकता है। इससे न केवल संवाद बना रहेगा, बल्कि शिकायतकर्ता अथवा संबंधित व्यक्ति को यह भरोसा भी रहेगा कि उसकी बात व्यवस्था तक पहुंची है।अधिकारी और जनता के बीच दूरी पद की वजह से नहीं, व्यवहार की वजह से बढ़ती है। एक वरिष्ठ अधिकारी का पद निश्चित रूप से सम्माननीय है, लेकिन प्रशासनिक पद जनता से संवाद करने की जिम्मेदारी भी देता है। अधिकारी को हर संदेश का विस्तृत उत्तर देना संभव नहीं हो सकता, लेकिन शिष्टाचारपूर्वक दो शब्दों का जवाब देना प्रशासनिक गरिमा को कम नहीं करता, बल्कि उसे और मजबूत करता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में “फाइलों के साथ संवाद” और “जनता के साथ संवाद” दोनों को समान महत्व दिया जाए। क्योंकि सरकार की छवि केवल बड़े फैसलों से नहीं बनती, बल्कि इस बात से भी बनती है कि आम नागरिक अथवा प्रतिष्ठित व्यक्ति जब शासन के किसी जिम्मेदार अधिकारी तक अपनी बात पहुंचाता है, तो उसे किस तरह का व्यवहार मिलता है।वरिष्ठ अधिकारियों को यह समझना होगा कि पद बड़ा होने के साथ जवाबदेही भी बड़ी होती है। हर संदेश का तत्काल समाधान संभव नहीं, हर व्यक्ति से मुलाकात संभव नहीं, लेकिन संवाद बनाए रखना निश्चित रूप से संभव है। एक छोटा-सा जवाब कई बार किसी व्यक्ति की उम्मीद को जीवित रखता है।अब समय आ गया है कि प्रशासनिक व्यवस्था में इस छोटे लेकिन महत्वपूर्ण विषय पर भी गंभीरता से विचार किया जाए—क्या वरिष्ठ अधिकारी इतने व्यस्त हो गए हैं कि जनहित से जुड़े संदेशों का जवाब देना भी उनके लिए संभव नहीं रहा? या फिर प्रशासनिक संस्कृति में संवाद की प्राथमिकता ही धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है?इन सवालों का जवाब जरूरी है, क्योंकि सरकार जनता से चलती है और प्रशासन जनता के विश्वास से।




