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अफसरों की कमी या फैसले में देरी? परिवहन विभाग में दोहरी जिम्मेदारी, वरिष्ठ IPS की प्रतिनियुक्ति पर सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार के प्रशासनिक ढांचे में एक बार फिर महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो गया है। आखिर राज्य में वरिष्ठ अधिकारियों की कमी है या फिर महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति और फैसले लेने में देरी हो रही है? यह सवाल परिवहन विभाग की मौजूदा व्यवस्था को देखकर उठ रहा है, जहां एक ही वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के कंधों पर सचिव और परिवहन आयुक्त की दोहरी जिम्मेदारी लंबे समय से बनी हुई है।वर्तमान में एस. प्रकाश (IAS) परिवहन विभाग के सचिव होने के साथ-साथ परिवहन आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल रहे हैं। सरकारी अभिलेखों और विभागीय जानकारी के अनुसार, यह व्यवस्था 27 जनवरी 2025 से जारी है। यानी महत्वपूर्ण परिवहन विभाग लंबे समय से अतिरिक्त प्रभार के सहारे संचालित हो रहा है।मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि विभागीय और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी परिवहन विभाग में प्रतिनियुक्ति पर आकर परिवहन आयुक्त की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार बताए जा रहे हैं। संबंधित अधिकारी की इच्छा और उपलब्धता की जानकारी शासन स्तर तक पहुंचने की भी चर्चा है। इसके बावजूद अब तक प्रतिनियुक्ति अथवा पूर्णकालिक नियुक्ति को लेकर कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है।यहीं से सरकार की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। यदि कोई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी महत्वपूर्ण विभाग की पूर्णकालिक जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हैं, तो फिर परिवहन आयुक्त जैसे अहम पद को अतिरिक्त प्रभार के भरोसे चलाने की आवश्यकता क्यों बनी हुई है?प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यह मामला मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सचिवालय तक पहुंचने के बावजूद आगे नहीं बढ़ पा रहा है। सूत्रों के अनुसार, पुलिस और गृह विभाग के प्रशासनिक स्तर पर भी संबंधित अधिकारी की प्रतिनियुक्ति को लेकर अपेक्षित तेजी दिखाई नहीं दे रही है। हालांकि, इस पूरे मामले की आधिकारिक पुष्टि अभी तक सामने नहीं आई है और कथित रूप से प्रतिनियुक्ति के इच्छुक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की पहचान भी सार्वजनिक नहीं की गई है।इसके बावजूद सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। आखिर मामला किस स्तर पर अटका हुआ है? क्या कैडर नियंत्रण से जुड़ी कोई प्रक्रिया लंबित है? क्या गृह विभाग की सहमति नहीं मिल रही? क्या मुख्यमंत्री सचिवालय से अंतिम निर्णय होना बाकी है? या फिर शासन ने इस प्रस्ताव को अभी प्राथमिकता ही नहीं दी है?एस. प्रकाश के पास केवल परिवहन सचिव और परिवहन आयुक्त की जिम्मेदारी ही नहीं है। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार, उनके पास संसदीय कार्य विभाग के सचिव का अतिरिक्त दायित्व भी है। ऐसे में एक ही अधिकारी के कंधों पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होना प्रशासनिक कार्यकुशलता की दृष्टि से भी सवाल खड़े करता है।परिवहन विभाग कोई छोटा या सामान्य महकमा नहीं है। वाहन पंजीयन, ड्राइविंग लाइसेंस, सड़क सुरक्षा, यात्री एवं मालवाहक परिवहन व्यवस्था, मोटर वाहन कानूनों का पालन और प्रवर्तन जैसी जिम्मेदारियां इसी विभाग के अंतर्गत आती हैं। विभाग के रोजमर्रा के प्रशासनिक और मैदानी कार्यों के लिए पूर्णकालिक नेतृत्व की आवश्यकता स्वाभाविक है।विभाग में आईपीएस अधिकारियों की भूमिका भी कोई नई बात नहीं है। परिवहन विभाग की आधिकारिक जानकारी में अतिरिक्त परिवहन आयुक्त के रूप में डी. रविशंकर (IPS) का नाम दर्ज है। ऐसे में यदि कोई अन्य वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर आकर परिवहन आयुक्त की जिम्मेदारी संभालने के इच्छुक हैं, तो इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।सरकार के सामने अब सवाल सीधा है—क्या छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ अधिकारियों की इतनी कमी है कि सचिव को ही लंबे समय तक परिवहन आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार संभालना पड़े? या फिर योग्य और इच्छुक अधिकारी उपलब्ध होने के बावजूद नियुक्ति का फैसला समय पर नहीं हो पा रहा है?अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था कुछ समय के लिए प्रशासनिक आवश्यकता हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक महत्वपूर्ण पदों को इसी व्यवस्था के भरोसे चलाना सरकार की पदस्थापना नीति पर सवाल खड़ा करता है। परिवहन विभाग जैसे महत्वपूर्ण महकमे को पूर्णकालिक आयुक्त की आवश्यकता है और यदि ऐसा कोई अधिकारी उपलब्ध भी है तो निर्णय में देरी के कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए।अब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार को बताना चाहिए कि परिवहन आयुक्त का पद पूर्णकालिक रूप से कब भरा जाएगा? क्या वास्तव में किसी वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने प्रतिनियुक्ति पर आने की इच्छा जताई है? यदि हां, तो उस प्रस्ताव पर क्या कार्रवाई हुई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सरकार जल्द सचिव एवं परिवहन आयुक्त की दोहरी व्यवस्था समाप्त करेगी?परिवहन विभाग की वर्तमान स्थिति ने सरकार के सामने एक बड़ा प्रशासनिक सवाल खड़ा कर दिया है—अफसरों की कमी है या फैसले लेने में देरी? इसका जवाब अब सरकार को ही देना होगा।

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