
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी


आज 9 अगस्त है—विश्व आदिवासी दिवस। आज देश और दुनिया में आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, कला, भाषा और जीवनशैली को सम्मान देने के लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित होंगे। मंचों से आदिवासी समाज के गौरव और उसके योगदान की बातें होंगी, सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं के संदेश दिखाई देंगे और आदिवासी संस्कृति की खूबसूरत तस्वीरें साझा की जाएंगी। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल अपनी जगह खड़ा रहेगा कि क्या आदिवासी समाज की वास्तविक जिंदगी भी उतनी ही खूबसूरत है, जितनी तस्वीरों और भाषणों में दिखाई जाती है?छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य के लिए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। बस्तर से लेकर सरगुजा, जशपुर, कोरबा और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही तक प्रदेश के विशाल वनांचलों में आदिवासी समाज सदियों से जंगल, जमीन और जल के साथ अपना जीवन जीता आया है। प्रकृति का संरक्षण उसके लिए कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि उसकी जीवनशैली का हिस्सा रहा है। जिस जंगल को आज दुनिया पर्यावरण और जलवायु संरक्षण के लिए बचाने की बात कर रही है, उस जंगल की रक्षा आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से करता आया है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस समाज ने प्रकृति को बचाया, वही समाज आज भी अनेक स्थानों पर बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।प्रदेश के दूरस्थ आदिवासी गांवों की वास्तविक तस्वीर राजधानी और बड़े शहरों की चमक से अलग है। कहीं आज भी पक्की सड़क का इंतजार है, कहीं बरसात में नदी-नाले पार करना ग्रामीणों की मजबूरी है, कहीं अस्पताल तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है और कहीं स्कूल तो है, लेकिन पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। अनेक गांवों में युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर हैं और पलायन आज भी एक गंभीर चुनौती है। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि आखिर विकास का पैमाना क्या है और विकास का लाभ सबसे पहले किस तक पहुंचना चाहिए?यदि किसी आदिवासी गांव में आज भी सड़क, पुल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है तो केवल बड़े-बड़े विकास कार्यों और बजट की घोषणाओं को विकास की पूर्ण तस्वीर नहीं माना जा सकता। विकास की असली कसौटी यह होनी चाहिए कि प्रदेश के सबसे दूरस्थ गांव में रहने वाले व्यक्ति के जीवन में कितना बदलाव आया। जिस परिवार को अस्पताल पहुंचने के लिए घंटों पैदल चलना पड़ता है, जिस बच्चे को बेहतर शिक्षा के लिए गांव छोड़ना पड़ता है और जिस युवा को रोजगार के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता है, उसके लिए विकास के आंकड़ों का कोई अर्थ नहीं है।आदिवासी समाज को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जिसमें उसकी जमीन, जंगल, संस्कृति और पहचान ही खतरे में पड़ जाए। विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो हो, लेकिन उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाए। आदिवासी समाज विकास का विषय मात्र नहीं, बल्कि विकास का महत्वपूर्ण भागीदार होना चाहिए। ग्रामसभा को मजबूत करना, स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना और वनाधिकार सहित संवैधानिक अधिकारों का वास्तविक क्रियान्वयन इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।आज आवश्यकता केवल नई योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि पहले से चल रही योजनाओं के परिणामों की ईमानदार समीक्षा करने की है। सरकार को यह देखना होगा कि आदिवासी क्षेत्रों के लिए जारी बजट का कितना हिस्सा वास्तव में जमीन तक पहुंचा, कितने गांवों में सड़क और पुल बने, कितने स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं, कितने दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत हुईं, कितने युवाओं को रोजगार मिला और कितने पात्र परिवारों को उनके अधिकारों का वास्तविक लाभ मिला। योजनाओं की संख्या और बजट की राशि से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसका असर गांव के अंतिम व्यक्ति के जीवन में कितना दिखाई देता है।विश्व आदिवासी दिवस की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि एक दिन आदिवासी समाज को याद किया जाता है, उसकी संस्कृति का उत्सव मनाया जाता है और उसके गौरव की बातें होती हैं, लेकिन वर्ष के बाकी दिनों में उसकी मूल समस्याएं अक्सर चर्चा के केंद्र से बाहर हो जाती हैं। आदिवासी समाज को केवल सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में देखने की मानसिकता बदलनी होगी। वह केवल नृत्य, गीत, वेशभूषा और परंपराओं तक सीमित समाज नहीं है। वह अपने अधिकारों, अपनी जमीन, अपने जंगल और अपने भविष्य को लेकर निर्णय लेने वाला समान अधिकार वाला नागरिक है।छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपदा प्रदेश की ताकत है, लेकिन इस संपदा का वास्तविक लाभ उन लोगों तक भी पहुंचना चाहिए जिनकी पीढ़ियां इन जंगलों और पहाड़ों के बीच गुजरी हैं। खनिज और प्राकृतिक संसाधनों से प्रदेश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है, उद्योग और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं, लेकिन यह विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब इसके साथ पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकार और आदिवासी अस्मिता की रक्षा भी सुनिश्चित हो।आज विश्व आदिवासी दिवस पर सरकार, जनप्रतिनिधियों और समाज को यह विचार करना होगा कि हम आदिवासी समाज को केवल उसके उत्सव के दिन याद करेंगे या उसके अधिकारों और समस्याओं के लिए पूरे वर्ष खड़े होंगे। आदिवासी समाज को सहानुभूति से ज्यादा अधिकारों का प्रभावी क्रियान्वयन चाहिए, भाषणों से ज्यादा जमीन पर विकास चाहिए और प्रतीकात्मक सम्मान से ज्यादा निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी चाहिए।विश्व आदिवासी दिवस केवल शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। आज जरूरत इस बात की है कि आदिवासी अंचलों में विकास कागजों और फाइलों में नहीं, बल्कि गांव की सड़क, पुल, स्कूल, अस्पताल, पेयजल और रोजगार के रूप में दिखाई दे। आदिवासी अधिकार सरकारी दस्तावेजों में नहीं, बल्कि ग्रामसभा और जमीन पर दिखाई दें। आदिवासी बच्चे केवल योजनाओं के आंकड़ों में नहीं, बल्कि बेहतर शिक्षा और सुरक्षित भविष्य के साथ दिखाई दें और आदिवासी परिवार केवल चुनावी भाषणों में सम्मानित नहीं, बल्कि अपने जीवन में सम्मान और आत्मनिर्भरता महसूस करे।आखिरकार किसी समाज के सम्मान का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं है कि उसके नाम पर कितने कार्यक्रम आयोजित हुए, बल्कि यह है कि उस समाज के अंतिम व्यक्ति का जीवन कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और बेहतर हुआ। इसलिए विश्व आदिवासी दिवस पर सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए कि आदिवासी समाज को केवल तस्वीरों में सम्मान नहीं, बल्कि जमीन पर अधिकार, अवसर और विकास मिले। क्योंकि आदिवासी समाज मजबूत होगा तो छत्तीसगढ़ की संस्कृति मजबूत होगी, जंगल सुरक्षित होंगे, प्रकृति बचेगी और विकास की नींव भी मजबूत होगी।




