
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में औद्योगिक विकास को गति देने की दिशा में राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक स्तर पर किए जा रहे प्रयासों का असर अब निवेश प्रस्तावों के रूप में दिखाई देने लगा है। नवंबर 2024 में लागू औद्योगिक विकास नीति के बाद प्रदेश में करीब 8 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त होने तथा लगभग 290 परियोजनाओं से करीब 1.9 लाख रोजगार अवसरों की संभावना सामने आई है। इनमें लगभग 175 परियोजनाओं पर काम शुरू होने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे समय में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह की भूमिका को प्रशासनिक समन्वय और औद्योगिक निवेश से जुड़े निर्णयों के प्रभावी क्रियान्वयन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय और संबंधित विभागों के बीच बेहतर तालमेल, निवेशकों के साथ संवाद तथा परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की सक्रियता औद्योगिक विकास की गति को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण पक्ष होती है। हालांकि किसी अधिकारी की व्यक्तिगत भूमिका के प्रत्यक्ष परिणाम का आकलन करते समय सरकारी दस्तावेजों और परियोजना-वार उपलब्ध आंकड़ों को आधार बनाना आवश्यक है।छत्तीसगढ़ के औद्योगिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी दिखाई दे रहा है कि निवेश का दायरा केवल परंपरागत खनिज आधारित उद्योगों तक सीमित नहीं रह गया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, फूड प्रोसेसिंग और पर्यटन जैसे नए क्षेत्रों में भी निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं। इससे प्रदेश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में विविधता लाने की दिशा में प्रयासों का संकेत मिलता है। बस्तर जैसे क्षेत्र में भी औद्योगिक निवेश की संभावनाओं को विकास के व्यापक मॉडल से जोड़ने की कोशिश दिखाई दे रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कुल प्रस्तावित निवेश का करीब 18 प्रतिशत बस्तर संभाग की ओर निर्देशित है। यह स्थिति औद्योगिक विकास को केवल रायपुर-दुर्ग-बिलासपुर जैसे स्थापित औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित रखने के बजाय अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों तक पहुंचाने की नीति की ओर संकेत करती है। प्रदेश के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती निवेश प्रस्तावों को वास्तविक निवेश में बदलना, स्वीकृत परियोजनाओं की समयबद्ध स्थापना, आवश्यक अधोसंरचना उपलब्ध कराना और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सुनिश्चित करना है। केवल एमओयू या निवेश प्रस्तावों की संख्या से औद्योगिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता; परियोजनाओं का धरातल पर उतरना, उत्पादन शुरू होना और उससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलने वाला लाभ ही इसकी वास्तविक कसौटी होगा।इसी दृष्टि से मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह सहित वरिष्ठ प्रशासनिक तंत्र की भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि निवेश प्रस्तावों की निगरानी, विभागीय समन्वय, आवश्यक अनुमतियों की प्रक्रिया और औद्योगिक अधोसंरचना से जुड़े मामलों में निरंतर गति बनी रहती है तो छत्तीसगढ़ अपने पारंपरिक खनिज संसाधन आधारित औद्योगिक स्वरूप के साथ-साथ आधुनिक और रोजगारपरक उद्योगों का भी महत्वपूर्ण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। सरकार की घोषित दीर्घकालिक विकास दृष्टि भी औद्योगिक वृद्धि, अधोसंरचना और समावेशी आर्थिक विकास को आपस में जोड़ने पर केंद्रित है।कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में दिखाई दे रही औद्योगिक गतिविधियां प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर का संकेत दे रही हैं। अब प्रशासनिक नेतृत्व के सामने चुनौती इस गति को निरंतर बनाए रखने और प्रस्तावित निवेश को वास्तविक औद्योगिक इकाइयों, उत्पादन तथा रोजगार में बदलने की है। यही वह चरण होगा जो यह तय करेगा कि वर्तमान निवेश उत्साह आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ के औद्योगिक परिदृश्य में कितनी ठोस और स्थायी तस्वीर तैयार करता है।




