
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल में वृक्षारोपण कार्य के लिए गोबर खाद खरीदी में कथित अनियमितता, कूटरचना और मिथ्याव्ययता के गंभीर आरोपों ने अब प्रशासनिक स्तर पर आधिकारिक जांच का रूप ले लिया है। छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने इस मामले में प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को पत्र जारी कर शिकायत के प्रत्येक बिंदु की जांच कराने तथा अभिमत सहित बिंदुवार जांच प्रतिवेदन 30 दिनों के भीतर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अवर सचिव डी.आर. चन्द्रवंशी द्वारा 30 जुलाई 2026 को जारी पत्र क्रमांक ESTB-1024(1)/663/2026-IFS में स्पष्ट किया गया है कि पूर्व विधायक गुलाब कमरो द्वारा प्रेषित शिकायत में भारतीय वन सेवा के अधिकारी रौनक गोयल के विरुद्ध मरवाही वनमंडल में वृक्षारोपण कार्य हेतु गोबर खाद की खरीदी में अनियमितता, कूटरचना तथा मिथ्याव्ययता के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायत में दोषी अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई किए जाने की भी मांग की गई है।शासन ने शिकायत को केवल औपचारिक रूप से अग्रेषित नहीं किया है, बल्कि प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को निर्देशित किया है कि शिकायत में वर्णित सभी बिंदुओं की तथ्यात्मक जांच कराई जाए और प्रत्येक आरोप पर स्पष्ट अभिमत सहित विस्तृत प्रतिवेदन निर्धारित समय सीमा के भीतर विभाग को उपलब्ध कराया जाए। इससे संकेत मिलते हैं कि शासन इस प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए दस्तावेजी परीक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहता है।यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मरवाही वनमंडल में पिछले कुछ वर्षों के दौरान वृक्षारोपण, पौध संरक्षण, गोबर खाद खरीदी तथा अन्य विकास कार्यों को लेकर समय-समय पर विभिन्न स्तरों से सवाल उठते रहे हैं। यदि जांच में शिकायत के आरोप प्रमाणित होते हैं तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो जांच रिपोर्ट संबंधित अधिकारियों को राहत भी दे सकती है।वन विभाग के जानकारों का मानना है कि वृक्षारोपण जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं में खाद, पौध, परिवहन और रखरखाव पर बड़ी राशि व्यय होती है। ऐसे में वित्तीय पारदर्शिता और अभिलेखों की शुचिता अत्यंत आवश्यक है। किसी भी प्रकार की अनियमितता न केवल सरकारी धन के उपयोग पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े उद्देश्यों की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती है।अब निगाहें प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय की जांच प्रक्रिया पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 30 दिन के भीतर प्रस्तुत होने वाली जांच रिपोर्ट आरोपों की पुष्टि करती है या उन्हें खारिज करती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि शासन ने शिकायत को गंभीर मानते हुए औपचारिक जांच की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है और इस प्रकरण के निष्कर्ष भविष्य की प्रशासनिक एवं कानूनी कार्रवाई की दिशा तय कर सकते हैं।



