
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बखत युवा मन ला देश के भविष्य बताथें। विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत, फिट इंडिया, स्वच्छ भारत अऊ नशा मुक्त भारत जइसने कई अभियान देशभर मं चलत हें। ए अभियान मन के उद्देश्य ऊपर कोनो सवाल नई उठाय जा सकय, काबर नशा सचमुच समाज बर घातक अभिशाप आय। फेर लोकतंत्र मं सरकार ले सवाल पूछना घलो जनता के अधिकार आय।आज देशभर मं “नशा मुक्त युवा, विकसित भारत” के संकल्प दिलाय जात हवय। लाखों युवा हाथ उठाके शपथ लेवत हें। मंच ले बड़े-बड़े भाषण होवत हें। रेडियो मं “मन की बात” होवत हे। सोशल मीडिया मं अभियान चलत हे। फेर आम नागरिक के मन मं एके सवाल उठत हवय—का नशा सिरिफ शपथ ले खत्म हो जाही?अगर नशा देश बर खतरा आय, त सरकार ला सबले पहिली नशा के जड़ ऊपर हमला करना चाही। जिहां नशा बनत हे, जिहां बिकत हे, जिहां ले राजस्व आवत हे, उहां कड़ा नीति काबर नई बनत?आज देश के कतको राज मं सरकारी शराब दुकान चलत हें। तंबाकू, गुटखा, गुड़ाखू, बीड़ी अऊ सिगरेट के कारोबार करोड़ों-अरबों रुपिया के हवय। कानून चेतावनी लिखे के बात जरूर कहिथे, फेर उपलब्धता बने रहिथे। अवैध मादक पदार्थ के तस्करी घलो कानून प्रवर्तन एजेंसियों बर लगातार चुनौती बने हवय। आखिर ए विरोधाभास काबर?सरकार एक ओर कहिथे—”नशा छोड़व।” दूसर ओर जनता देखथे कि नशा से जुड़े कारोबार ले राजस्व घलो आवत हे। ए स्थिति मं युवा मन के मन मं भ्रम पैदा होना स्वाभाविक आय। सरकार के संदेश अऊ नीति मं एकरूपता दिखना जरूरी हवय।नशा सिरिफ एक व्यक्ति ला खराब नई करय। एक परिवार उजड़ जाथे। घर के कमई बर्बाद हो जाथे। महतारी के आंखी मं आंसू भर जाथे। छोटे-छोटे लइका मन पढ़ई छोड़ देथें। घरेलू हिंसा बढ़थे। अपराध बढ़थे। सड़क दुर्घटना बढ़थे। अस्पताल भर जाथें। पुलिस ऊपर दबाव बढ़थे। समाज के नैतिक ढांचा कमजोर हो जाथे।गांव के चौपाल ले शहर के मोहल्ला तक, नशा आज एक गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुके हवय। किसान होवय, मजदूर होवय, छात्र होवय या बेरोजगार युवा—कोनो वर्ग ए संकट ले अछूता नई हे।अगर सरकार सचमुच नशा मुक्त भारत बनाना चाहत हे, त सिरिफ जागरूकता अभियान पर्याप्त नई होही। जरूरत हे ठोस नीति, प्रभावी क्रियान्वयन अऊ समाज के सहभागिता के। नशा मुक्ति केंद्र बढ़े, खेल मैदान बढ़ें, रोजगार के अवसर बढ़ें, मानसिक स्वास्थ्य अऊ परामर्श सुविधा मजबूत होवय, अऊ अवैध नशा के कारोबार ऊपर कठोर कार्रवाई होवय।ए घलो सच आय कि समाज अऊ परिवार के जिम्मेदारी कम नई हे। माता-पिता, गुरु, समाजसेवी, शिक्षक अऊ जनप्रतिनिधि मन के भूमिका घलो महत्वपूर्ण हवय। फेर नीति बनाय के जिम्मेदारी आखिरकार सरकार के ऊपरच रहिथे।लोकतंत्र मं सवाल पूछना विरोध नई, बल्कि जवाबदेही के आधार आय। अगर प्रधानमंत्री युवा मन ला नशा छोड़इया के संदेश देथें, त जनता के घलो हक बनथे कि वो पूछय—नशा के उपलब्धता कम करे बर सरकार के दीर्घकालीन नीति का हवय? राजस्व अऊ जनस्वास्थ्य के बीच संतुलन कइसे बनही? अवैध नशा के नेटवर्क ला जड़ ले खत्म करे बर का अतिरिक्त कदम उठाए जावत हें?देश के युवा मन उपदेश ले जियादा अवसर चाहथें। वो मन खेल के मैदान चाहथें, रोजगार चाहथें, बेहतर शिक्षा चाहथें, स्वस्थ वातावरण चाहथें। जेन समाज मं उम्मीद मजबूत होथे, उहां नशा के आकर्षण अपने आप कम होथे।आज जरूरत ए बात के नई कि मंच ले हजारों लोग शपथ लेवं। जरूरत ए बात के हे कि आने वाला समय मं अइसन नीति बने जेन ले नशा तक पहुंच कठिन होवय, इलाज आसान होवय, अऊ युवा मन बर सकारात्मक विकल्प मजबूत होवय।नशा मुक्त भारत के सपना हर भारतीय के सपना आय। फेर ए सपना तभे साकार होही, जब भाषण, संकल्प अऊ नीति—तीनों एके दिशा मं चलहीं।देश के युवा मन तैयार हें। अब देश देखत हवय कि सरकार के अगला कदम कतका निर्णायक होथे।



