
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर अब केवल आम जनता ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक महकमे के भीतर भी असंतोष की चर्चाएं तेज होने लगी हैं। सरकार की स्थानांतरण नीति से लेकर मंत्रालय में फाइलों के निपटारे और अधिकारियों की कार्यशैली तक कई ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं, जिनका सीधा असर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ता दिखाई दे रहा है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मंत्रालय में बैठे जिम्मेदार अधिकारी ही निर्धारित समय-सीमा में निर्णय और कार्यवाही नहीं कर पा रहे हैं, तो जिलों में पदस्थ अधिकारियों से त्वरित परिणामों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? जिला स्तर पर कई प्रशासनिक कार्य मंत्रालय की स्वीकृति और मार्गदर्शन के इंतजार में अटकने की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसका खामियाजा अंततः आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है।स्थानांतरण नीति भी प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादलों को लेकर स्पष्टता, पारदर्शिता और समयबद्ध प्रक्रिया की अपेक्षा की जाती है, लेकिन यदि स्थानांतरण के मामलों में सिफारिश, प्रतीक्षा और अनिश्चितता का माहौल बने, तो प्रशासनिक अनुशासन और कार्यक्षमता दोनों प्रभावित होना स्वाभाविक है।विडंबना देखिए कि सरकार सुशासन, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्यवाही का दावा करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर यदि फाइलें समय पर आगे नहीं बढ़तीं, निर्णय लंबित रहते हैं और अधिकारी अपने अधिकारों के इस्तेमाल में असहज महसूस करते हैं, तो इन दावों की वास्तविक परीक्षा भी जरूरी है।मंत्रालय में बैठे अधिकारियों की जवाबदेही आखिर कौन तय करेगा? क्या केवल जिला स्तर के अधिकारियों से ही कामकाज का हिसाब मांगा जाएगा, या मंत्रालय के जिम्मेदार अधिकारियों की भी समय-सीमा और कार्यप्रणाली की समीक्षा होगी? जब ऊपर से निर्णय लेने में देरी होगी, तो नीचे की प्रशासनिक व्यवस्था आखिर कितनी तेजी से दौड़ पाएगी?मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है। सरकार को यह समझना होगा कि सुशासन का मतलब केवल बैठकों, निर्देशों और घोषणाओं तक सीमित नहीं है। सुशासन तब दिखाई देता है, जब आम आदमी का काम समय पर हो और सरकारी तंत्र जवाबदेह बने।अब सवाल सीधा है—क्या मुख्यमंत्री मंत्रालय की कार्यप्रणाली की समीक्षा कर प्रशासनिक जवाबदेही तय करेंगे, या फिर जनता और जिला स्तरीय अधिकारियों की परेशानियां इसी तरह फाइलों में दबी रहेंगी?




