
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ मंत्रालय में पिछले करीब 25 वर्षों से अपने पारंपरिक अंदाज में कामकाज करने के अभ्यस्त अधिकारियों के लिए अब परिस्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। सुबह 10 बजे की बैठक, विभागीय कामकाज का विस्तृत पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन (पीपीटी) और हर सवाल का तथ्यात्मक जवाब देने की अनिवार्यता ने अधिकारियों की कार्यशैली पर दबाव बढ़ा दिया है। मंत्रालय के गलियारों में चर्चा है कि मुख्य सचिव अब बैठकों को केवल औपचारिकता तक सीमित रखने के बजाय विभागीय कामकाज की वास्तविक स्थिति जानने पर जोर दे रहे हैं। यही वजह है कि अधिकारियों को अब बैठक में जाने से पहले पूरी तैयारी करनी पड़ रही है।पहले विभागीय प्रस्तुतियां तैयार करने की जिम्मेदारी अक्सर निचले स्तर के कर्मचारियों या अवर सचिवों तक सीमित रहती थी। कई बार विभागीय सचिवों के सामने पीपीटी प्रस्तुत कर बैठक की औपचारिकता पूरी कर ली जाती थी। लेकिन अब परिस्थितियां अलग बताई जा रही हैं। मुख्य सचिव को विभागों की योजनाओं, कार्यों की प्रगति और संबंधित विषयों की विस्तृत जानकारी होने के कारण सचिवों के लिए केवल प्रस्तुति के भरोसे बैठक में पहुंचना आसान नहीं रह गया है। बैठक में पूछे जाने वाले सवालों का जवाब देने के लिए अधिकारियों को संबंधित विषयों की बारीकियों तक समझ विकसित करनी पड़ रही है। ऐसे में विभागीय सचिवों को अब न केवल पीपीटी का अध्ययन करना पड़ रहा है, बल्कि अपने विभाग के कामकाज की वास्तविक स्थिति से भी पूरी तरह अवगत रहना पड़ रहा है।बैठकों के समय को लेकर भी अधिकारियों को किसी तरह की ढील मिलने की चर्चा नहीं है। सुबह 10 बजे बैठक निर्धारित होने का मतलब अब ठीक 10 बजे बैठक में उपस्थित होना माना जा रहा है। इसके अतिरिक्त, हर महीने आयोजित होने वाली वरिष्ठ सचिवों की बैठक ने भी अधिकारियों की व्यस्तता बढ़ा दी है। मंत्रालय में चर्चा है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान अधिकारियों ने जितनी बैठकों में हिस्सा नहीं लिया होगा, उससे कहीं अधिक बैठकों में उन्हें अब एक वर्ष के भीतर शामिल होना पड़ रहा है। इसका असर उनकी दिनचर्या और विभागीय तैयारियों पर भी पड़ रहा है।हालांकि, इस बदली हुई कार्यशैली को केवल अधिकारियों की परेशानी के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा। प्रशासनिक व्यवस्था में नियमित समीक्षा, समयबद्ध बैठकें और विभागीय योजनाओं की वास्तविक स्थिति की जानकारी जवाबदेही तय करने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। यदि इन बैठकों के जरिए योजनाओं की प्रगति, बजट के उपयोग, लंबित मामलों और जनहित से जुड़े कार्यों की समीक्षा हो रही है, तो इसका लाभ शासन की कार्यप्रणाली को मिल सकता है। वहीं, यदि बैठकों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उनके परिणामों का भी आकलन किया जाए, तो यह व्यवस्था और अधिक प्रभावी बन सकती है।दूसरी ओर, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि बैठकों और प्रस्तुतियों में लगने वाला समय विभागीय कामकाज की गति को प्रभावित तो नहीं कर रहा। प्रशासनिक दक्षता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितनी बैठकें आयोजित हुईं या कितने प्रेजेंटेशन दिए गए, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उन बैठकों के बाद कितने लंबित प्रकरणों का निराकरण हुआ, योजनाओं को कितनी गति मिली और आम जनता को कितना लाभ पहुंचा। पीपीटी में प्रस्तुत आंकड़ों और धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों के बीच सामंजस्य होना भी उतना ही जरूरी है।फिलहाल मंत्रालय में बदलती कार्यसंस्कृति को लेकर चर्चाएं तेज हैं। अधिकारियों के लिए यह दौर अधिक तैयारी, समयपालन और जवाबदेही का है, जबकि शासन के लिए यह अपनी प्रशासनिक व्यवस्था की वास्तविक क्षमता परखने का अवसर भी है। अब देखना यह होगा कि बैठकों की बढ़ती संख्या और सख्त समीक्षा की यह व्यवस्था विभागीय कार्यों में कितनी तेजी लाती है। क्योंकि प्रशासन की असली सफलता बैठकों की संख्या में नहीं, बल्कि उन बैठकों से निकलने वाले निर्णयों और आम जनता तक पहुंचने वाले परिणामों में दिखाई देती है।




