
विकास नंद (सर्वव्यापी)

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगरी खल्लारी अपनी प्राचीन विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और माता खल्लारी के प्रति अटूट आस्था के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। हरे-भरे वृक्षों और लताओं से आच्छादित पहाड़ी पर विराजित खल्लारी मातेश्वरी के दर्शन के लिए वर्षभर श्रद्धालु पहुंचते हैं। विशेष रूप से चैत्र और क्वार नवरात्रि के दौरान यहां भव्य धार्मिक आयोजन होते हैं। मनोकामना पूर्ति और ज्योति कलश स्थापना के लिए दूर-दराज से भक्त यहां आते हैं। चैत्र पूर्णिमा पर आयोजित होने वाला विशाल मेला भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
मृतकागढ़ से खल्लारी तक का ऐतिहासिक सफर
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, खल्लारी को प्राचीन काल में मृतकागढ़ और बाद में खल्लवाटिका के नाम से जाना जाता था।
वर्तमान में यह स्थान खल्लारी के नाम से प्रसिद्ध है।
रायपुर से लगभग 75 किलोमीटर दूर स्थित यह धार्मिक स्थल राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 353 पर महासमुंद और बागबाहरा के मध्य मुख्य मार्ग से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर है। सड़क और रेल मार्ग से जुड़े होने के कारण यहां पहुंचना सुविधाजनक है।खल्लारी नाम की व्याख्या ‘खल’ और ‘अरि’ शब्दों से जोड़कर की जाती है, जिसका भावार्थ दुष्टों अथवा शत्रुओं का नाश करने वाली शक्ति माना जाता है। यही कारण है कि माता खल्लारी को शक्ति स्वरूपा के रूप में पूजा जाता है।
खल्लारी की पहाड़ी लगभग 355 फीट ऊंची बताई जाती है।
पहाड़ी पर स्थित माता के मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 981 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। पहाड़ी से आसपास के प्राकृतिक दृश्य मन मोह लेते हैं। पहाड़ी के ऊपर करोड़ों रुपये की लागत से भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया है, जिसकी भव्यता नीचे से भी दिखाई देती है। पूर्व में यहां रोप-वे की सुविधा उपलब्ध थी, लेकिन दुर्घटना के बाद से यह सुविधा बंद है।
बेमचा गांव से जुड़ी है माता खल्लारी की लोकगाथा
माता खल्लारी के आगमन और पहाड़ी पर विराजमान होने को लेकर क्षेत्र में प्रचलित लोककथा अत्यंत रोचक है। मान्यता के अनुसार, माता खल्लारी का संबंध महासमुंद के निकट स्थित बेमचा गांव से रहा है। लोककथा में माता को षोडशी अर्थात युवती के रूप में वर्णित किया गया है, जो खल्लारी से लगभग दो किलोमीटर दूर गुजन पहाड़ी पर निवास करने वाली अपनी बहन खोरपा से मिलने जाया करती थीं।कथा के अनुसार, बंजारा नायक नामक राजा उनके अलौकिक रूप से प्रभावित होकर उनका पीछा करने लगा। माता ने उसे बार-बार समझाया कि वह कोई साधारण नारी नहीं, बल्कि बेमचा गांव की कुलदेवी खल्लारी माता हैं। इसके बावजूद राजा ने उनका पीछा करना नहीं छोड़ा।लोकमान्यता के अनुसार, माता ने उसे चेतावनी दी कि यदि वह खल्लारी पहाड़ी तक उनका पीछा करते हुए आया, तो पत्थर में परिवर्तित हो जाएगा। इसके बाद भी राजा नहीं माना और माता के श्राप से पत्थर बन गया। कथा के अनुसार, इसके पश्चात माता खल्लारी पहाड़ी में समा गईं और अपनी पहचान के प्रतीक स्वरूप हाथ की एक उंगली पहाड़ी पर छोड़ दी।बाद में माता के स्वप्न में दर्शन देने की मान्यता के आधार पर ग्रामीणों ने उस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया। समय के साथ मंदिर का विस्तार हुआ और आज यह विशाल धार्मिक परिसर के रूप में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है।
पहाड़ पर नहीं चढ़ पाने वाले भक्तों के लिए माता राऊर मंदिर
खल्लारी गांव में पहाड़ी स्थित मंदिर के अतिरिक्त माता का एक अन्य महत्वपूर्ण मंदिर भी है, जिसे माता राऊर के नाम से जाना जाता है।स्थानीय मान्यता के अनुसार, पहाड़ी पर विराजित माता ने एक मालगुजार को स्वप्न में आदेश दिया था कि उनकी फेंकी गई कटार अथवा त्रिशूल जहां गिरे, वहां उनकी प्रतिमा स्थापित की जाए। मान्यता थी कि वृद्ध और कमजोर श्रद्धालु पहाड़ी पर नहीं चढ़ पाते, इसलिए उन्हें गांव में स्थित मंदिर में भी पहाड़ी वाले मंदिर के समान पुण्य प्राप्त हो सके।इसके बाद गांव में मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्तमान में इस मंदिर परिसर का भी भव्य स्वरूप देने के लिए निर्माण कार्य कराया जा रहा है।दोनों मंदिरों में चैत्र और क्वार नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और अन्य आयोजन होते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों तक पहाड़ी स्थित मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद एवं भोजन भंडारे की व्यवस्था भी की जाती है।
संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर पहुंचते हैं दंपती
माता खल्लारी मंदिर से अनेक धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इनमें संतान प्राप्ति की मनोकामना प्रमुख मानी जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, निःसंतान दंपती माता के दरबार में श्रद्धा और विश्वास के साथ संतान प्राप्ति की कामना लेकर पहुंचते हैं।भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं और माता के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति देखने को मिलती है। चैत्र पूर्णिमा पर लगने वाला मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं को भी जीवंत करता है।
भगवान जगन्नाथ स्वामी का प्राचीन मंदिर भी ऐतिहासिक धरोहर
खल्लारी की पहचान केवल माता के मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां भगवान श्री जगन्नाथ स्वामी का प्राचीन मंदिर भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध शिलालेख संबंधी विवरणों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1414 ईस्वी में हुआ था। स्थानीय मान्यता में मंदिर के निर्माण को छह मासी रात्रि से भी जोड़ा जाता है।इसके अतिरिक्त, गांव के एक खेत में स्थित प्राचीन मंडप के खंडहर को स्थानीय लोग लखेसरी गुड़ी अथवा लाक्षागृह के नाम से जानते हैं। खल्लारी क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर प्राचीन प्रतिमाएं, मंदिर और पत्थरों से निर्मित पुरातात्विक अवशेष भी मिलते हैं। ये अवशेष क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की ओर संकेत करते हैं।
पांडवों और भीम से जुड़ी हैं लोकमान्यताएं
खल्लारी के इतिहास में महाभारत काल से जुड़ी लोककथाओं का भी उल्लेख मिलता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, वनवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र से गुजरे थे और उन्होंने यहां कुछ समय बिताया था।कथा के अनुसार, भीम ने पहाड़ी पर एक चट्टान पर अपने पैर से बलपूर्वक दबाव डाला था, जिससे चट्टान पर उनके पदचिह्न जैसी आकृति बन गई। इस प्रसंग को हिडिम्बा से जुड़ी लोककथा के साथ भी जोड़ा जाता है। आज भी पहाड़ी पर भीम से संबंधित बताए जाने वाले चिह्नों का उल्लेख किया जाता है। गांव के खेत में स्थित लाक्षागृह से जुड़ी मान्यताएं भी इस क्षेत्र की पौराणिक पहचान का हिस्सा हैं।हालांकि, इन प्रसंगों को स्थानीय लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं के रूप में देखा जाता है। इनके ऐतिहासिक पक्ष की पुष्टि के लिए पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक साक्ष्यों का अध्ययन आवश्यक है।
धार्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं
खल्लारी मातेश्वरी मंदिर, माता राऊर मंदिर, भगवान जगन्नाथ स्वामी का प्राचीन मंदिर और पहाड़ी का प्राकृतिक सौंदर्य इस क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से विशिष्ट बनाते हैं। नवरात्रि और चैत्र पूर्णिमा के दौरान यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या इस स्थल की व्यापक लोकप्रियता को दर्शाती है।खल्लारी की धार्मिक परंपराएं, प्राचीन अवशेष, लोककथाएं और प्राकृतिक वातावरण छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बेहतर पर्यटन सुविधाओं, ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं के विकास से खल्लारी को धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में और अधिक पहचान मिल सकती है।




