तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बिलासपुर जिले की राजस्व व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सकरी तहसील में कथित अवैध प्लाटिंग और राजस्व अभिलेखों से जुड़े मामले हों, तखतपुर तहसील में सामने आए विवादित प्रकरण हों या फिर बोदरी तहसील से जुड़े राजस्व मामलों की शिकायतें—इन सबको लेकर सवाल अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रह गए हैं। संबंधित मामलों की शिकायतें और उनके संबंध में उठाए गए सवाल प्रदेश के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक पहुंचने के बाद भी यदि जिला स्तर पर कार्रवाई दिखाई नहीं देती, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जांच की दिशा क्या है और जिम्मेदारी तय करने में इतनी देरी क्यों हो रही है?राजस्व विभाग आम नागरिक की जमीन, नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा, रजिस्ट्री के बाद राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रक्रिया और भू-अभिलेखों से सीधे जुड़ा विभाग है। ऐसे में तहसील स्तर पर किसी भी प्रकार की अनियमितता की शिकायत महज एक प्रशासनिक शिकायत नहीं रह जाती, बल्कि उसका सीधा असर आम नागरिक के अधिकार और संपत्ति से जुड़ता है। यही वजह है कि सकरी, तखतपुर और बोदरी तहसीलों से संबंधित शिकायतों को लेकर उठ रहे सवालों का निष्पक्ष और समयबद्ध परीक्षण जरूरी माना जा रहा है।सबसे अधिक चर्चा सकरी तहसील से जुड़े उन मामलों की है, जिनमें अवैध प्लाटिंग से संबंधित खसरों, प्रकरण क्रमांक, राजस्व रिकॉर्ड, रजिस्ट्री और नामांतरण की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। यदि किसी भूमि पर अवैध प्लाटिंग का आरोप है, तो यह देखना प्रशासन की जिम्मेदारी है कि संबंधित भूमि की वास्तविक स्थिति क्या थी, राजस्व रिकॉर्ड में क्या दर्ज था, किस स्तर पर कौन-सा आदेश जारी हुआ और उसके बाद क्या कार्रवाई की गई। लेकिन सवाल यह है कि शिकायत सामने आने के बाद जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कितनी आगे बढ़ी?इसी तरह तखतपुर और बोदरी तहसील से जुड़े मामलों को लेकर भी शिकायतकर्ताओं द्वारा गंभीर सवाल उठाए जाने की बात सामने आती रही है। इन मामलों में यदि दस्तावेज, आदेश, प्रकरण क्रमांक, राजस्व रिकॉर्ड अथवा अन्य साक्ष्य प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं, तो उनकी जांच केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित रहने के बजाय रिकॉर्ड आधारित तरीके से होनी चाहिए। आखिर किस अधिकारी ने क्या आदेश दिया, किस परिस्थिति में दिया, नियमों का पालन हुआ या नहीं और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ तो उसका उत्तरदायित्व किसका है—इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आ सकता है।अब मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि शिकायतों की गूंज जिला मुख्यालय से आगे बढ़कर प्रदेश के शीर्ष प्रशासनिक स्तर तक पहुंचने की बात कही जा रही है। ऐसे में जिला प्रशासन के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। एक ओर शिकायतकर्ताओं की बात की निष्पक्ष जांच हो और दूसरी ओर जिन अधिकारियों पर आरोप लगाए गए हैं, उन्हें भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले। यही प्रशासनिक जांच की बुनियादी निष्पक्षता है।लेकिन इसी बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि मामला गंभीर है तो कार्रवाई में देरी क्यों? क्या केवल शिकायतों को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भेज देना ही जांच की प्रक्रिया है? क्या संबंधित फाइलों को सुरक्षित कर उनका स्वतंत्र परीक्षण किया गया है? क्या संबंधित तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों से लिखित जवाब मांगा गया है? क्या राजस्व रिकॉर्ड में हुए बदलावों की समयरेखा तैयार की गई है? क्या संबंधित पटवारियों और राजस्व निरीक्षकों की भूमिका की भी जांच की जा रही है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या शिकायतों की जांच उसी प्रशासनिक श्रृंखला के भीतर हो रही है, जिस पर शिकायतों में सवाल उठाए गए हैं?यही वह बिंदु है जहां जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं। यदि जांच पूरी तरह निष्पक्ष है तो उसका परिणाम सामने आने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। यदि शिकायतें प्रथम दृष्टया निराधार हैं तो प्रशासन को स्पष्ट रूप से स्थिति सामने रखनी चाहिए। और यदि रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितता मिलती है तो जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। बीच की स्थिति सबसे ज्यादा संदेह पैदा करती है, जहां शिकायतें मौजूद हैं, दस्तावेज मौजूद हैं, सवाल मौजूद हैं, लेकिन कार्रवाई दिखाई नहीं देती।राजस्व मामलों में यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी अधिकारी के खिलाफ केवल आरोप लगने मात्र से उसे दोषी नहीं माना जा सकता। इसलिए आवश्यक है कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव स्तर तक पहुंची शिकायतों की स्वतंत्र, दस्तावेज आधारित और समयबद्ध जांच हो। यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित अधिकारियों को भी जांच के माध्यम से क्लीन चिट मिलने का अधिकार है, लेकिन यदि रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितता सामने आती है तो फिर कार्रवाई से बचने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।बिलासपुर के लोगों की नजर अब इस बात पर है कि जिला प्रशासन इन मामलों में क्या कदम उठाता है। क्या संबंधित तहसीलों की फाइलों का उच्चस्तरीय परीक्षण होगा? क्या विवादित भूमि प्रकरणों की अलग से समीक्षा की जाएगी? क्या शिकायतों में उल्लेखित अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी? क्या जांच किसी स्वतंत्र वरिष्ठ अधिकारी से कराई जाएगी? और यदि जांच में दोष सामने आता है तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई होगी?सबसे बड़ा सवाल यही है—जब शिकायतों की आवाज मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक पहुंच चुकी है, तो जिला स्तर पर कार्रवाई की बारी कब आएगी?बिलासपुर की राजस्व व्यवस्था के लिए यह केवल कुछ तहसीलों या कुछ अधिकारियों का मामला नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जिसके आधार पर आम नागरिक अपनी जमीन और उससे जुड़े दस्तावेजों को लेकर प्रशासन के पास जाता है। यदि शिकायत सही है तो कार्रवाई जरूरी है, और यदि शिकायत गलत है तो जांच के बाद उसे खारिज करना भी उतना ही जरूरी है। लेकिन दोनों परिस्थितियों में चुप्पी और अनिश्चितता किसी समाधान का रास्ता नहीं हो सकती।अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं—सकरी, तखतपुर और बोदरी के विवादित मामलों में जांच कब पूरी होगी, जिम्मेदारी कब तय होगी और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों पर कार्रवाई कब होगी?




