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आईसीयू में सिकल सेल मरीज, फिर भी बी-पॉजिटिव ब्लड के लिए डोनर की तलाश! आयुष्मान से इलाज तो हो रहा, लेकिन रक्त के नाम पर व्यवस्था बेबस—सरकारी दावों पर बिलासपुर जिला अस्पताल में बड़ा सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं और जरूरतमंद मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराने के सरकारी दावों के बीच बिलासपुर जिला अस्पताल से सामने आया एक मामला इन दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिला अस्पताल के आईसीयू में भर्ती सिकल सेल मरीज स्वाधीन सेठ, पिता स्वर्गीय प्रकाश चंद सेठ को बी-पॉजिटिव रक्त की आवश्यकता है, लेकिन परिजनों के अनुसार अस्पताल में रक्त उपलब्ध कराने के लिए डोनर की व्यवस्था करने को कहा जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि जब मरीज गंभीर अवस्था में आईसीयू में भर्ती है और उसका उपचार आयुष्मान योजना के अंतर्गत हो रहा है, तो आवश्यक रक्त उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?एक तरफ राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर योजनाओं और सुविधाओं के विस्तार की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी अस्पताल में भर्ती एक सिकल सेल मरीज के परिजनों को यदि अपने स्तर पर रक्तदाता तलाशने की मजबूरी सामने आती है, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। सिकल सेल जैसी बीमारी में रक्त की आवश्यकता कोई सामान्य सुविधा नहीं, बल्कि कई मरीजों के लिए उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। ऐसे में आईसीयू में भर्ती मरीज के लिए समय पर रक्त उपलब्ध होना सबसे प्राथमिक आवश्यकता होनी चाहिए।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आयुष्मान कार्ड से इलाज की सुविधा मिलने के बावजूद क्या रक्त की व्यवस्था मरीज के परिजनों की जिम्मेदारी है? यदि अस्पताल के पास उस समय बी-पॉजिटिव रक्त उपलब्ध नहीं था, तो क्या मरीज के लिए वैकल्पिक व्यवस्था तलाशने की कोई संस्थागत व्यवस्था है? क्या ब्लड बैंक में उपलब्धता की वास्तविक स्थिति परिजनों को स्पष्ट रूप से बताई गई? और यदि रक्त उपलब्ध था, तो मरीज को उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया?मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह केवल एक मरीज और उसके परिवार की परेशानी का सवाल नहीं है। यह सरकारी अस्पताल की ब्लड मैनेजमेंट व्यवस्था, सिकल सेल मरीजों के लिए संवेदनशील स्वास्थ्य प्रबंधन और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की वास्तविक स्थिति से जुड़ा प्रश्न है। मरीज आईसीयू में है और परिवार रक्त की तलाश में भटक रहा है—यह स्थिति अपने आप में स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।सरकार यदि सिकल सेल मरीजों के लिए विशेष स्वास्थ्य सुविधाओं और नि:शुल्क उपचार की व्यवस्था का दावा करती है, तो जिला अस्पताल स्तर पर यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसे मरीजों को आवश्यक रक्त उपलब्ध कराने की प्रक्रिया क्या है, रक्त की अनुपलब्धता की स्थिति में अस्पताल क्या वैकल्पिक व्यवस्था करता है और मरीज के परिजनों को डोनर खोजने के लिए कितना जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।यहां अस्पताल प्रबंधन से भी सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए—क्या आईसीयू में भर्ती स्वाधीन सेठ के लिए बी-पॉजिटिव रक्त उपलब्ध था? यदि उपलब्ध नहीं था तो अस्पताल ने तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था के लिए क्या कदम उठाए? यदि डोनर लाने को कहा गया, तो इसका लिखित प्रावधान क्या है? और सिकल सेल मरीजों के लिए जिला अस्पताल की आपातकालीन रक्त व्यवस्था आखिर कितनी तैयार है?सरकार की योजनाओं की सफलता का पैमाना केवल सरकारी घोषणाएं नहीं, बल्कि आईसीयू में भर्ती उस मरीज तक सुविधा पहुंचना है जिसे उसी समय उसकी जरूरत है। बिलासपुर जिला अस्पताल का यह मामला इसी कसौटी पर व्यवस्था की परीक्षा ले रहा है।अब आवश्यकता है कि स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन मामले की तत्काल जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें, मरीज को आवश्यक रक्त उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करें और यह भी सार्वजनिक करें कि सिकल सेल मरीजों के लिए जिला अस्पताल में रक्त की उपलब्धता और आपातकालीन आपूर्ति की क्या व्यवस्था है। क्योंकि सवाल सिर्फ स्वाधीन सेठ का नहीं, बल्कि उन तमाम मरीजों का है जो सरकारी अस्पताल को अंतिम सहारा मानकर पहुंचते हैं और संकट की घड़ी में यदि उन्हें भी रक्त के लिए डोनर तलाशना पड़े, तो फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों और अस्पताल की जमीनी व्यवस्था के बीच की दूरी पर जवाब कौन देगा?

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