
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
शिक्षा विभाग में लंबे समय तक विभिन्न जिम्मेदारियां निभा चुके डॉ. एम.एल. पटेल के मुंगेली जिला शिक्षा अधिकारी पद पर पदस्थ होते ही करीब दस साल पुराने बिल्हा के स्वीपर भुगतान मामले को लेकर समाचार प्रकाशित होने पर सवाल उठने लगे हैं। खास बात यह है कि डॉ. पटेल पिछले करीब पांच वर्षों से प्राचार्य के पद पर कार्यरत रहे, लेकिन उस दौरान इस पुराने मामले को लेकर ऐसी चर्चा या समाचार सामने नहीं आया। ऐसे में अब उनके जिला शिक्षा अधिकारी बनने के बाद अचानक पुराने प्रकरण को सुर्खियों में लाए जाने को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।बताया जा रहा है कि बिल्हा में स्वीपर भुगतान सहित अन्य कथित अनियमितताओं से जुड़ा मामला लगभग एक दशक पुराना है। यदि इस मामले में किसी स्तर पर गंभीर अनियमितता हुई थी तो स्वाभाविक सवाल यह है कि संबंधित समय पर इसकी जांच, कार्रवाई और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया क्या हुई? और यदि मामला लंबित था तो इतने वर्षों तक इसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं हुई?डॉ. पटेल के जिला शिक्षा अधिकारी बनने के बाद ही पुराने मामले को प्रमुखता से उठाए जाने की टाइमिंग भी सवालों के घेरे में है। क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई विभागीय अथवा व्यक्तिगत कारण है? इसका जवाब संबंधित दस्तावेज और विभागीय रिकॉर्ड ही दे सकते हैं।यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी पुराने मामले में किसी अधिकारी की भूमिका तय करने से पहले उस समय की उनकी वास्तविक पदस्थापना, अधिकार-क्षेत्र, निर्णय प्रक्रिया और उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों की पड़ताल आवश्यक है। केवल किसी पद पर वर्तमान पदस्थापना के आधार पर वर्षों पुराने मामले की जिम्मेदारी तय करना उचित नहीं माना जा सकता।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि डॉ. एम.एल. पटेल के मुंगेली जिला शिक्षा अधिकारी बनने के बाद ही दस साल पुराने मामले को क्यों उछाला जा रहा है? क्या उनके जिला शिक्षा अधिकारी बनने से किसी को परेशानी है? यदि ऐसा है तो वह कौन है और उसके पीछे कारण क्या है?बहरहाल, मामले की वास्तविकता सामने लाने के लिए पुराने दस्तावेजों, जांच रिपोर्ट, भुगतान संबंधी अभिलेख और उस समय पदस्थ अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है। इससे न केवल आरोपों की सच्चाई सामने आएगी, बल्कि यह भी स्पष्ट होगा कि पुराने प्रकरण को अब अचानक चर्चा में लाने के पीछे वास्तविक कारण क्या है।



