
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अब सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। भाजपा के वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों की नाराजगी सामने आने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर सरकार और प्रशासन के बीच समन्वय में कमी कहां रह गई है?भाजपा नेताओं का कहना है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में एक विधायक की अनुशंसा पर भी जनहित से जुड़े कई कामों को गति मिल जाती थी, लेकिन वर्तमान विष्णुदेव साय सरकार में स्थिति ऐसी बन गई है कि मुख्यमंत्री सचिवालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा भेजे गए पत्रों पर भी विभागीय स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पा रही है।जनप्रतिनिधियों का दर्द है कि जनता की समस्याओं को लेकर वे अधिकारियों के सामने लगातार प्रयास करते हैं, लेकिन जब विभागीय स्तर पर फाइलें आगे नहीं बढ़तीं तो इसका सीधा असर सरकार की छवि पर पड़ता है।”सरकार हमारी, लेकिन सुनवाई कहां?” — जनप्रतिनिधियों में बढ़ रही बेचैनीभाजपा के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा यह सवाल उठाया जाना सरकार के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा और शासन स्तर से भेजे गए निर्देशों को प्राथमिकता नहीं मिलने से जनता के बीच गलत संदेश जा रहा है।कई मामलों में मुख्यमंत्री सचिवालय से भेजे गए पत्रों पर भी विभागीय सचिवों द्वारा निर्णय नहीं लेने की बात सामने आने के बाद प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाललोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि जनता और सरकार के बीच महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। यदि उनकी अनुशंसाओं और शासन स्तर के निर्देशों पर समय पर कार्रवाई नहीं होती है तो इसका असर सीधे आम जनता के कामकाज पर पड़ता है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार को प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही और समन्वय मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि जनहित के मामलों में देरी न हो।फिलहाल भाजपा के भीतर से उठ रही यह आवाज आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बन सकती है। अब देखना होगा कि सरकार प्रशासनिक स्तर पर इस नाराजगी को कैसे दूर करती है।




