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धर्मांतरण पर सरकार सख्त, पेंड्रा में आरोपियों के समर्थन में सड़क पर भाजपा नेता! नितिन लॉरेस का बड़ा सवाल -‘मुख्यमंत्री जांच के आदेश दें और सड़क पर राजनीतिक संरक्षण दिखे, तो आखिर किसकी चलेगी?’ अतुल आर्थर को लेकर शिकायतों की निष्पक्ष जांच की मांग; भाजपा के स्थानीय नेताओं की भूमिका पर उठे सवाल।

नूर मोहम्मद ,जिला ब्यूरो चीफ, रायपुर/गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (सर्वव्यापी)

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर सरकार की सख्ती के बीच जीपीएम जिले से सामने आया एक पत्र राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में नए सवाल खड़े कर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं मसीह समुदाय प्रतिनिधि नितिन लॉरेस द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में एक ओर धर्मांतरण संबंधी शिकायतों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है, वहीं दूसरी ओर पेंड्रा में आरोपों से घिरे व्यक्ति के समर्थन में कथित तौर पर भाजपा से जुड़े लोगों के सड़क पर उतरने की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए गए हैं।गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम-2026 लागू हो चुका है और सरकार ने बल, दबाव, प्रलोभन अथवा धोखाधड़ी से होने वाले धर्मांतरण के विरुद्ध कड़े कानूनी प्रावधान किए हैं।

‘एक तरफ जांच, दूसरी तरफ राजनीतिक संरक्षण क्यों?’

प्रेस विज्ञप्ति का सबसे गंभीर पहलू यही है कि नितिन लॉरेस ने अतुल आर्थर से संबंधित पूर्व शिकायतों का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री, गृह विभाग तथा सक्षम प्रशासनिक स्तर पर निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।पत्र में दावा किया गया है कि शिकायतों में धर्मांतरण संबंधी गतिविधियों, ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में कथित गतिविधियों तथा विदेशी/एफसीआरए निधियों के कथित उपयोग जैसे गंभीर विषय उठाए गए हैं। साथ ही उपलब्ध फोटो, दस्तावेज और अन्य सामग्री के सत्यापन की मांग की गई है।लेकिन इसी के समानांतर पेंड्रा में आरोपों से घिरे व्यक्ति के समर्थन में भाजपा से जुड़े लोगों के सड़क पर उतरने को लेकर लॉरेस ने सवाल खड़ा किया है—क्या यह महज राजनीतिक समर्थन है या फिर जांच की प्रक्रिया पर प्रभाव डालने का प्रयास?यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पत्र में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। इसलिए इन आरोपों को जांच का विषय माना जाना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने का आधार।

सबसे बड़ा सवाल: सरकार जांच कराएगी या राजनीति भारी पड़ेगी?

लॉरेस के पत्र में बार-बार एक ही मूल प्रश्न उभरता है-यदि सरकार स्वयं शिकायतों की जांच की दिशा में आगे बढ़ रही है, तो किसी व्यक्ति के समर्थन में राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन क्यों?उन्होंने कहा है कि किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता, लेकिन निष्पक्ष जांच से पहले राजनीतिक संरक्षण भी उचित नहीं है।यही बात पूरे विवाद को महज व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाकर राजनीतिक जवाबदेही बनाम प्रशासनिक निष्पक्षता के सवाल तक पहुंचाती है।

भाजपा नेतृत्व से सीधे सवाल

प्रेस विज्ञप्ति में पेंड्रा-गौरेला के स्थानीय भाजपा पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। लॉरेस के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी स्थानीय स्तर से भाजपा के वरिष्ठ नेतृत्व तक पहुंचाई जाने की बात कही जा रही है।ऐसे में अब निगाहें भाजपा के जिला एवं प्रदेश नेतृत्व पर टिकती हैं कि वह इस पूरे मामले में क्या रुख अपनाता है।क्या पार्टी कानून और निष्पक्ष जांच के साथ खड़ी होगी, या किसी व्यक्ति विशेष के राजनीतिक बचाव के आरोपों पर स्पष्टीकरण देगी?

‘भाजपा किसी व्यक्ति की निजी ढाल नहीं’

पत्र में एक बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश भी दिया गया है-किसी व्यक्ति के निजी विवाद को पार्टी की प्रतिष्ठा से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।लॉरेस ने भाजपा कार्यकर्ताओं से अपील करते हुए कहा है कि यदि संबंधित व्यक्ति निर्दोष है तो निष्पक्ष जांच में यह स्पष्ट हो जाएगा और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कानून अपना काम करेगा।यानी विवाद का मूल सवाल ‘कौन किसके साथ खड़ा है’ नहीं, बल्कि ‘जांच कितनी निष्पक्ष होगी’ होना चाहिए।

अरुण पनालाल प्रकरण ने भी बढ़ाया राजनीतिक तापमान

प्रेस विज्ञप्ति में अरुण पनालाल से जुड़े मामले का भी उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भाजपा से जुड़े लोगों द्वारा उनके विरुद्ध शिकायत/FIR किए जाने की बातें सामने आती हैं।लॉरेस ने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत है तो उसकी जांच कानून के मुताबिक होनी चाहिए। साथ ही यदि उसी राजनीतिक समूह से जुड़े लोगों द्वारा अन्य मामलों में अलग-अलग रुख अपनाया जा रहा है, तो उसकी वजह भी सार्वजनिक होनी चाहिए। यही विरोधाभास अब राजनीतिक बहस का आधार बनता दिखाई दे रहा है।

‘फोटो आरोप सिद्ध नहीं करते, लेकिन जांच का आधार जरूर बन सकते हैं’

पत्र में एक अहम कानूनी और पत्रकारिता-संबंधी बात भी कही गई है – फोटो अथवा शिकायत अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करती।लेकिन यदि शिकायत के साथ फोटो, दस्तावेज, कार्यक्रमों की सामग्री अथवा अन्य प्रमाण उपलब्ध होने का दावा किया गया है, तो उनका सत्यापन जांच एजेंसी द्वारा किया जाना चाहिए। यही वजह है कि लॉरेस ने आरोप-प्रत्यारोप की जगह दस्तावेजी जांच पर जोर दिया है।

“सवालों के कटघरे में”अब जवाब किसे देना है?

1. जब धर्मांतरण संबंधी शिकायतों की जांच की मांग की जा रही है, तो आरोपों की निष्पक्ष जांच से पहले राजनीतिक समर्थन की जरूरत क्यों पड़ी?

2. क्या पेंड्रा के भाजपा पदाधिकारियों को पूरे मामले और शिकायतों की जानकारी है?

3. क्या भाजपा का जिला एवं प्रदेश नेतृत्व स्थानीय नेताओं की भूमिका से अवगत है?

4. क्या किसी व्यक्ति के निजी विवाद को पार्टी की राजनीतिक प्रतिष्ठा से जोड़ना उचित है?

5. यदि शिकायतें गलत हैं तो निष्पक्ष जांच से उन्हें खारिज कराने की पहल क्यों नहीं की जाती?

6. यदि शिकायतों में लगाए गए आरोपों में तथ्य हैं, तो राजनीतिक संरक्षण के आरोपों पर भाजपा क्या जवाब देगी?

7. क्या मुख्यमंत्री स्तर से जांच के निर्देश होने की स्थिति में कोई राजनीतिक दबाव जांच को प्रभावित कर सकता है?

8. क्या शिकायतों में उल्लिखित फोटो, दस्तावेज और वित्तीय गतिविधियों का स्वतंत्र सत्यापन कराया जाएगा?अब गेंद सरकार और भाजपा नेतृत्व के पाले में *पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि नितिन लॉरेस ने किसी व्यक्ति को सीधे दोषी घोषित करने के बजाय जांच की मांग की है। उनका स्पष्ट तर्क है—यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद संबंधित व्यक्ति स्वतः निर्दोष साबित हो जाएगा और यदि आरोप सही हैं तो कानून को अपना काम करने दिया जाना चाहिए।छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर नया कानून लागू होने के बाद ऐसे मामलों में प्रशासनिक जांच और भी महत्वपूर्ण हो गई है।अब असली परीक्षा यह है कि क्या पेंड्रा का यह विवाद राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहेगा, या शिकायतों में उठाए गए प्रत्येक बिंदु की दस्तावेजी और निष्पक्ष जांच होगी?*“अब सवाल जवाबदेही का”*“एक तरफ सरकार धर्मांतरण रोकने के लिए कानून को सख्त बना रही है, दूसरी तरफ पेंड्रा में उन्हीं आरोपों से घिरे लोगों के पक्ष में राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन क्यों दिखाई दे रहा है-आखिर कानून बड़ा है या राजनीतिक संरक्षण?”यही सवाल अब पेंड्रा से निकलकर भाजपा के वरिष्ठ नेतृत्व और शासन-प्रशासन के दरवाजे तक पहुंच गया है।

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