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कोयले से अरबों की कमाई, किसान को चंद लाखों का मुआवजा! एक एकड़ से कंपनी कमाए 15–20 करोड़, तो किसान को क्यों नहीं मिले उसके भविष्य का उचित हिस्सा?

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

देश में कोयला खनन परियोजनाओं के विस्तार के साथ भूमि अधिग्रहण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। प्रभावित किसानों का कहना है कि जिनकी जमीन पर खनन कर कंपनियां हजारों करोड़ रुपये का कारोबार करती हैं, उन्हीं किसानों को केवल एकमुश्त मुआवजा देकर हमेशा के लिए उनकी आजीविका, पर्यावरण और भविष्य छीन लिया जाता है।

किसानों और सामाजिक संगठनों का तर्क है कि यदि किसी एक एकड़ भूमि से निकलने वाला कोयला कंपनी को लगभग 15 से 20 करोड़ रुपये तक की आय देता है, तो उस भूमि के वास्तविक मालिक किसान को केवल 40 से 50 लाख रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि यदि किसानों को कम से कम 5 करोड़ रुपये प्रति एकड़ का उचित प्रतिफल मिले, तो वे अपने परिवार और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं।जानकारों के अनुसार, G-12 ग्रेड के कोयले (3400–3700 kcal/kg) की कीमत लगभग 1500 से 2500 रुपये प्रति टन तक रहती है।

यदि किसी खदान की उत्पादन क्षमता 15 मिलियन टन प्रतिवर्ष हो और औसत बिक्री मूल्य 2000 रुपये प्रति टन माना जाए, तो केवल बिक्री से ही लगभग 3000 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का कारोबार संभव है। 20 वर्षों की अवधि में यह आंकड़ा 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच सकता है। हालांकि वास्तविक लाभ कई अन्य कारकों—उत्पादन लागत, रॉयल्टी, कर, परिचालन व्यय और बाजार मूल्य—पर भी निर्भर करता है।

प्रभावित किसानों का कहना है कि कंपनी दशकों तक प्राकृतिक संसाधनों से लाभ कमाती है, जबकि किसान को केवल एक बार मुआवजा मिलता है और उसकी जमीन हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। ओपनकास्ट खनन के कारण कृषि योग्य भूमि बंजर होने, भूजल स्तर गिरने, धूल एवं PM2.5 प्रदूषण बढ़ने तथा गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है, जिसका सबसे अधिक असर स्थानीय ग्रामीणों पर पड़ता है।

किसानों का मानना है कि अब समय आ गया है कि वे केवल मुआवजे की नहीं, बल्कि खनिज संपदा में न्यायसंगत हिस्सेदारी की मांग करें। उनका कहना है कि भूमि देने वाले परिवारों को दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा, रोजगार, पुनर्वास, स्वास्थ्य सुविधाएं, पर्यावरण संरक्षण तथा खनन से होने वाले लाभ में भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

भूमि अधिग्रहण और खनन परियोजनाओं को लेकर प्रभावित क्षेत्रों में यह मांग लगातार जोर पकड़ रही है कि विकास का लाभ केवल कंपनियों तक सीमित न रहे, बल्कि जिन किसानों और ग्रामीणों की जमीन पर यह विकास खड़ा होता है, उन्हें भी उनकी हिस्सेदारी का न्यायपूर्ण अधिकार मिले।

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