
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही,नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
मरवाही वन मंडल में कथित वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों पर सरकार की कार्रवाई को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि लंबे समय से सामने आ रही शिकायतों और जांच से जुड़े मामलों को निर्णायक कार्रवाई तक पहुंचाने के बजाय कुछ प्रकरणों को नस्तीबद्ध किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि शिकायतों में तथ्य नहीं थे तो जांच की जरूरत क्यों पड़ी और यदि तथ्य सामने आए थे तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?मरवाही वन मंडल में तत्कालीन डीएफओ ग्रीष्मी चांद के कार्यकाल को लेकर भी लंबे समय से प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच नाराजगी की चर्चाएं रही हैं। उनके कार्यकाल के दौरान विभिन्न मामलों को लेकर शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि शिकायतों को लेकर कई बार अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट कराया गया, लेकिन अपेक्षित स्तर पर कार्रवाई नहीं हो सकी।बताया जाता है कि वन विभाग के पीसीसीएफ अरुण कुमार पाण्डेय ने सामने आई शिकायतों को गंभीरता से लिया और विभागीय स्तर पर स्थिति की समीक्षा की। इसके बाद तत्कालीन डीएफओ ग्रीष्मी चांद को मरवाही वन मंडल से हटाया गया। हालांकि स्थानांतरण या पद से हटाया जाना अपने आप में किसी अधिकारी के विरुद्ध दोष सिद्ध नहीं करता, लेकिन जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इससे जुड़े सभी आरोपों और शिकायतों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।हटाने के बाद भी सवाल—क्या पूरे कार्यकाल की होगी जांच?सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि तत्कालीन डीएफओ के कार्यकाल को लेकर इतनी शिकायतें थीं और विभाग के शीर्ष स्तर तक मामला पहुंचा, तो उनके पूरे कार्यकाल में स्वीकृत कार्यों, भुगतान, निर्माण, पौधारोपण, CAMPA मद सहित अन्य योजनाओं के खर्च और प्रशासनिक निर्णयों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जा रही है?जनप्रतिनिधियों का कहना है कि किसी अधिकारी को हटाना समस्या का समाधान नहीं है। यदि शिकायतें गंभीर हैं तो प्रत्येक शिकायत की बिंदुवार जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।‘फाइल नस्तीबद्ध करने से सवाल खत्म नहीं होंगे’मरवाही वन मंडल को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित सभी शिकायतों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि शिकायतों को केवल फाइल बंद कर देने या नस्तीबद्ध कर देने से उन पर उठे सवाल समाप्त नहीं होते।उनका कहना है कि सरकार यदि वास्तव में पारदर्शिता और सुशासन के प्रति प्रतिबद्ध है तो मरवाही वन मंडल के तत्कालीन डीएफओ के पूरे कार्यकाल की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति जनता के सामने रखे।जांच हुई तो सामने आ सकता है पूरा सचमरवाही वन मंडल में पिछले कुछ समय से कथित अनियमितताओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि जांच किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाने के बजाय दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड के आधार पर की जाए। स्वीकृत कार्यों से लेकर भुगतान, माप पुस्तिका, बिल-वाउचर, सामग्री खरीदी, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र और संबंधित अधिकारियों की भूमिका तक की जांच हो तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।अब निगाहें सरकार और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं कि वे इन शिकायतों को केवल प्रशासनिक फाइलों तक सीमित रखते हैं या फिर निष्पक्ष जांच के माध्यम से पूरे मामले की सच्चाई सामने लाते हैं।जनप्रतिनिधियों की मांग स्पष्ट है—मरवाही वन मंडल में शिकायतों को नस्तीबद्ध करने के बजाय उनकी निष्पक्ष जांच हो और यदि कहीं भी भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।




