
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ लोक शिक्षण संचालनालय ने 27 जुलाई 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जुलाई 2026 के वेतन से केवल उन्हीं दिनों का वेतन आहरित किया जाएगा, जिन दिनों शिक्षक एवं कर्मचारी की उपस्थिति ऑनलाइन अटेंडेंस के माध्यम से दर्ज होगी।
संचालनालय ने सभी संभागीय संयुक्त संचालकों और जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि ऑनलाइन उपस्थिति के आधार पर ही वेतन भुगतान सुनिश्चित किया जाए और आदेश का कड़ाई से पालन कराया जाए।
शिक्षा विभाग के इस फैसले को प्रशासनिक दृष्टि से बड़ा कदम माना जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की समय पर उपस्थिति और नियमित कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। विभाग को उम्मीद है कि ऑनलाइन उपस्थिति व्यवस्था से अनुशासन बढ़ेगा और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होगी।हालांकि शिक्षा जगत से जुड़े कई जानकारों का मानना है कि केवल ऑनलाइन अटेंडेंस लागू कर देने से सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं आएगा। उनका कहना है कि मोबाइल पर उपस्थिति दर्ज करना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण कराना दो अलग-अलग विषय हैं।
यदि विद्यालय में पढ़ाई का स्तर कमजोर रहेगा, शिक्षकों की जवाबदेही केवल उपस्थिति तक सीमित रहेगी और परिणामों का मूल्यांकन नहीं होगा, तो शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव नहीं है।सबसे अधिक चर्चा उस मुद्दे पर हो रही है कि बड़ी संख्या में सरकारी शिक्षक स्वयं अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ाते हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि जब तक सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक, अधिकारी और नीति निर्धारक अपने बच्चों को भी सरकारी विद्यालयों में शिक्षा दिलाने का विश्वास नहीं दिखाएंगे, तब तक सरकारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति समाज का भरोसा पूरी तरह मजबूत नहीं हो सकेगा। यदि शिक्षक के अपने परिवार का भविष्य भी उसी विद्यालय से जुड़ जाए, तो स्वाभाविक रूप से विद्यालय की गुणवत्ता, अनुशासन, शिक्षण सामग्री और परिणामों पर अधिक गंभीरता दिखाई देगी।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि ऑनलाइन अटेंडेंस एक प्रशासनिक निगरानी का माध्यम है, लेकिन शिक्षा सुधार का वास्तविक आधार गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, नियमित कक्षा संचालन, विद्यार्थियों के सीखने का स्तर, अभिभावकों की भागीदारी और शिक्षकों की नैतिक जवाबदेही है। केवल उपस्थिति दर्ज होने से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि पूरे समय प्रभावी शिक्षण भी हुआ है।प्रदेश के कई सरकारी विद्यालयों में आज भी शिक्षकों की कमी, विषय विशेषज्ञों का अभाव, आधारभूत सुविधाओं की कमी और गिरते शैक्षणिक परिणाम जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। ऐसे में केवल वेतन को ऑनलाइन उपस्थिति से जोड़ देना शिक्षा सुधार की दिशा में पहला कदम तो हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता।शिक्षा व्यवस्था पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में सरकारी विद्यालयों को निजी स्कूलों के समकक्ष बनाना चाहती है, तो उसे उपस्थिति के साथ-साथ शिक्षण गुणवत्ता, परीक्षा परिणाम, विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता और विद्यालयों के समग्र प्रदर्शन को भी जवाबदेही का आधार बनाना होगा। साथ ही यह सामाजिक बहस भी लगातार उठती रही है कि सरकारी सेवाओं से जुड़े लोगों को सरकारी संस्थानों पर भरोसा दिखाने की पहल स्वयं करनी चाहिए।
ऑनलाइन अटेंडेंस का नया आदेश निश्चित रूप से अनुशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहल है, लेकिन सरकारी शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन तभी दिखाई देगा, जब उपस्थिति के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पारदर्शी मूल्यांकन और सरकारी विद्यालयों के प्रति स्वयं शिक्षकों एवं अधिकारियों का विश्वास भी समान रूप से मजबूत होगा।




