
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार को लेकर सबसे बड़ा सवाल अब यह नहीं है कि सरकार की नीयत क्या है, बल्कि यह है कि सरकार की नीयत का असर प्रशासन के अंतिम छोर तक आखिर दिखाई क्यों नहीं दे रहा है। शांत, सहज और सौम्य स्वभाव मुख्यमंत्री की अपनी विशेषता हो सकती है, लेकिन शासन-प्रशासन केवल सौम्यता से नहीं चलता। कहीं-कहीं कठोर निर्णय, जवाबदेही और समयबद्ध कार्रवाई भी शासन का अनिवार्य हिस्सा होते हैं। यही वह मोड़ है जहां अब मुख्यमंत्री को अपने शांत स्वभाव के साथ भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र जैसी प्रशासनिक धार दिखाने की आवश्यकता महसूस होती है।प्रदेश में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और जनशिकायतों की व्यवस्था का उद्देश्य आम नागरिक को सरकारी दफ्तरों की चौखट पर बार-बार भटकने से बचाना है। लेकिन यदि शिकायत दर्ज होती है, उसका निराकरण कागजों में हो जाता है और शिकायतकर्ता की वास्तविक समस्या वहीं की वहीं रहती है, तो फिर ऐसी व्यवस्था जनविश्वास बढ़ाने के बजाय व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। शिकायत बंद करने और समस्या समाप्त करने के बीच का अंतर प्रशासन को समझना होगा। फाइल में लगा हुआ ‘निराकरण’ तभी वास्तविक निराकरण है, जब जमीन पर नागरिक को उसका परिणाम दिखाई दे।सड़कों की स्थिति भी शासन की कार्यक्षमता का सबसे प्रत्यक्ष आईना होती है। सड़क केवल डामर और गिट्टी का नाम नहीं है, वह सरकार की मौजूदगी का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जब सड़कें टूटती हैं, निर्माण के कुछ समय बाद ही उखड़ने लगती हैं या मरम्मत के नाम पर बार-बार सरकारी धन खर्च होता है, तब सवाल केवल निर्माण एजेंसी से नहीं, बल्कि निगरानी की पूरी व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए। आखिर गुणवत्ता की जिम्मेदारी तय कौन करेगा और खराब काम के बाद कार्रवाई किस पर होगी?स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों में भी सरकार को केवल योजनाओं और घोषणाओं के आंकड़ों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। अस्पताल में चिकित्सक, दवाइयां और जांच की सुविधा कितनी प्रभावी है, स्कूल में शिक्षक और पढ़ाई की वास्तविक स्थिति क्या है, यह किसी सरकारी रिपोर्ट से ज्यादा महत्वपूर्ण है। प्रदेश का आम नागरिक सरकारी अस्पताल और सरकारी स्कूल में जब सुविधा खोजता है, तब उसे शासन की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती है।आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति भी इसी व्यापक प्रशासनिक चुनौती का हिस्सा है। जिन केंद्रों के माध्यम से प्रदेश के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और माताओं तक शासन की योजनाएं पहुंचनी हैं, वहां यदि भवन, पोषण, संसाधन अथवा नियमित संचालन को लेकर शिकायतें बनी रहती हैं तो यह केवल महिला एवं बाल विकास विभाग की समस्या नहीं रह जाती। यह सरकार की अंतिम छोर तक पहुंच की परीक्षा बन जाती है।राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर उठते सवाल तो और भी गंभीर हैं। नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा, भू-अभिलेख और जमीन से जुड़े मामलों में आम नागरिक की सबसे ज्यादा निर्भरता राजस्व तंत्र पर रहती है। ऐसे में यदि कहीं अनियमितता, भ्रष्टाचार अथवा कथित घोटाले की शिकायत सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष और समयबद्ध जांच आवश्यक है। किसी अधिकारी या कर्मचारी को केवल आरोप के आधार पर दोषी मान लेना उचित नहीं, लेकिन शिकायतों को दबा देना अथवा जांच को लंबा खींचना भी उतना ही अनुचित है। सरकार को स्पष्ट संदेश देना होगा कि राजस्व कार्यालय जनता की सुविधा के केंद्र हैं, लेन-देन और प्रभाव के नहीं।सबसे बड़ा प्रश्न अब मंत्रिमंडल की कार्यप्रणाली पर भी उठना स्वाभाविक है। मुख्यमंत्री अकेले पूरे प्रदेश का प्रशासन नहीं चला सकते। प्रत्येक मंत्री अपने विभाग का राजनीतिक नेतृत्व करता है और विभागीय मशीनरी को दिशा देने की जिम्मेदारी भी उसी की है। इसलिए सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन केवल मुख्यमंत्री के चेहरे से नहीं, बल्कि प्रत्येक विभाग की कार्यशैली और उसके परिणामों से होना चाहिए। जहां विभागीय स्तर पर शिकायतें लगातार सामने आ रही हों, वहां समीक्षा बैठकों की औपचारिकता से आगे बढ़कर परिणाम आधारित जवाबदेही तय करने का समय है।यहीं मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मुख्यमंत्री सचिवालय केवल पत्राचार और बैठकों का केंद्र बनकर नहीं रह सकता। यदि सरकार की योजनाओं और निर्णयों को जमीन पर उतारना है तो प्रभारी सचिवों से जवाब मांगने के साथ-साथ जिला स्तर की वास्तविक स्थिति को भी सीधे समझना होगा। जरूरत इस बात की है कि सचिवालय की समीक्षा व्यवस्था केवल वीडियो कॉन्फ्रेंस और विभागीय प्रस्तुतियों तक सीमित न रहे, बल्कि जिलों की वास्तविक समस्याओं, लंबित प्रकरणों और शिकायतों की गहराई से समीक्षा हो।कभी-कभी सचिवालय में प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट और जिले की जमीन पर दिखाई देने वाली वास्तविकता के बीच इतना बड़ा अंतर होता है कि दोनों को देखकर लगता है जैसे वे दो अलग-अलग प्रदेशों की तस्वीरें हों। कागज पर सड़क पूरी, जमीन पर गड्ढे; रिपोर्ट में शिकायत का निराकरण, नागरिक के हाथ में समस्या; आंकड़ों में स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर, अस्पताल में मरीज परेशान; शिक्षा के लक्ष्य पूरे, लेकिन कक्षा में सीखने का स्तर सवालों में—यदि ऐसी स्थिति कहीं है तो सरकार को आंकड़ों की नहीं, वास्तविकता की समीक्षा करनी होगी।मुख्यमंत्री को अब ‘रिपोर्टेड गुड गवर्नेंस’ से आगे बढ़कर ‘फील्ड गवर्नेंस’ की ओर जाना होगा। अधिकारियों से यह पूछना पर्याप्त नहीं होगा कि काम कितना हुआ; उनसे यह भी पूछा जाना चाहिए कि काम का लाभ किसे मिला, कितने समय में मिला और शिकायत होने पर जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई।प्रशासन में सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब नीचे का अधिकारी ऊपर को वही बताता है जो ऊपर सुनना चाहता है। ऐसी व्यवस्था में शिकायतें कम नहीं होतीं, केवल रिपोर्टों में कम दिखाई देती हैं। मुख्यमंत्री सचिवालय को इस दीवार को तोड़ना होगा। जिला स्तर पर अचानक समीक्षा, शिकायतकर्ताओं से सीधे संवाद, लंबित प्रकरणों की क्रॉस-चेकिंग और दोषी पाए जाने पर समयबद्ध कार्रवाई ही प्रशासनिक मशीनरी में वास्तविक भय और जवाबदेही दोनों पैदा कर सकती है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सबसे बड़ी ताकत उनकी सहजता और शांत नेतृत्व शैली है। लेकिन अब इसी सहजता के भीतर दृढ़ता दिखाई देने की जरूरत है। शासन में करुणा होनी चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार के प्रति कठोरता भी होनी चाहिए। अधिकारियों पर विश्वास होना चाहिए, लेकिन जवाबदेही उससे बड़ी होनी चाहिए। योजनाओं की घोषणा होनी चाहिए, लेकिन उसकी निगरानी उससे भी ज्यादा मजबूत होनी चाहिए।छत्तीसगढ़ की जनता ने सरकार को केवल घोषणाओं के लिए नहीं, बल्कि परिवर्तन के लिए जनादेश दिया है। इसलिए अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री सचिवालय प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र को एक स्पष्ट संदेश दे—काम में लापरवाही, शिकायतों की कागजी खानापूर्ति, घटिया निर्माण, योजनाओं में अनियमितता और जनता को अनावश्यक परेशान करने की प्रवृत्ति किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं होगी।विष्णु नाम अपने आप में संरक्षण और व्यवस्था का प्रतीक है। अब आवश्यकता इस बात की है कि मुख्यमंत्री उस विष्णु चक्र की धार प्रशासनिक सुस्ती, भ्रष्टाचार और जवाबदेही से बच निकलने वाली व्यवस्था की ओर मोड़ें। और प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह यदि स्वयं जिला स्तर पर जाकर प्रभारी सचिवों और अधिकारियों के साथ वास्तविक समीक्षा की शुरुआत करते हैं, तो सचिवालय और जमीन के बीच की दूरी निश्चित रूप से कम की जा सकती है।क्योंकि जनता को अब नई फाइल नहीं, नया परिणाम चाहिए। नई समीक्षा बैठक नहीं, पुरानी समस्याओं का समाधान चाहिए। नई घोषणा नहीं, जमीन पर बदलाव चाहिए।सरकार के पास समय भी है, शक्ति भी है और अवसर भी। अब जरूरत केवल उस शक्ति के प्रभावी इस्तेमाल की है। शांत नेतृत्व की अपनी गरिमा है, लेकिन जब व्यवस्था सुस्त पड़ने लगे तो सुदर्शन चक्र चलाना भी राजधर्म का ही एक हिस्सा है।




