
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
वन विभाग एक बार फिर वित्तीय अनियमितताओं और कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। कोरिया जिले में पौधा वितरण एवं रूट शूट (राइजोम/रूट शूट) खरीदी से जुड़े मामले में लोकपाल द्वारा तत्कालीन उप वनमंडलाधिकारी (एसडीओ) तथा संबंधित परिक्षेत्र अधिकारियों (रेंजर्स) पर पाँच-पाँच लाख रुपये की क्षतिपूर्ति राशि जमा करने का आदेश दिए जाने के बाद विभाग की कार्यप्रणाली पर बहस तेज हो गई है। इस कार्रवाई ने यह संकेत दिया कि यदि अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं तो अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय की जा सकती है।
मार्च 2024 से जुड़े इस प्रकरण में मनरेगा एवं वन विभाग के माध्यम से किए गए पौधरोपण तथा रूट शूट खरीदी में वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप सामने आए थे। लोकपाल के आदेश के बाद यह मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रदेश में वन विभाग के कार्यों की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़े होने लगे।इधर, मरवाही सहित प्रदेश के कई वन मंडलों में कैम्पा (CAMPA) मद के कार्यों को लेकर भी समय-समय पर गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं।
आरोप हैं कि करोड़ों रुपये के पौधरोपण, सुरक्षा कार्य, नर्सरी संचालन, संरचनात्मक निर्माण और अन्य विकास कार्यों में पारदर्शिता का अभाव रहा है। कई सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने इन कार्यों के स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) की मांग भी उठाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वन विभाग में होने वाले अधिकांश कार्य दुर्गम क्षेत्रों में किए जाते हैं, जहां आम नागरिकों की निगरानी सीमित रहती है। ऐसे में यदि तकनीकी सत्यापन, जियो टैगिंग, ड्रोन सर्वे, थर्ड पार्टी निरीक्षण और सोशल ऑडिट नियमित रूप से न हो तो अनियमितताओं की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।प्रदेश में नई प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाल रहे प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) अरुण कुमार पाण्डेय के सामने सबसे बड़ी चुनौती विभाग की साख को मजबूत करने की मानी जा रही है।
वन महकमे से जुड़े लोगों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या वे केवल प्रशासनिक बैठकों तक सीमित रहेंगे या फिर शिकायतों और आरोपों की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई भी सुनिश्चित करेंगे।वन एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष बड़ी राशि खर्च करती हैं। यदि इन योजनाओं में वित्तीय अनियमितताएं होती हैं तो उसका सीधा असर पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका पर पड़ता है।
इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्येक कैम्पा कार्य, पौधरोपण योजना और नर्सरी संचालन का सार्वजनिक विवरण पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए तथा समय-समय पर स्वतंत्र एजेंसियों से ऑडिट कराया जाना चाहिए।अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या कोरिया जिले की कार्रवाई पूरे प्रदेश के लिए एक उदाहरण बनेगी?
क्या मरवाही सहित अन्य वन मंडलों में लगाए गए आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पीसीसीएफ अरुण कुमार पाण्डेय वन विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही की नई मिसाल स्थापित करेंगे?इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले समय में विभाग की कार्यशैली और सरकार की भ्रष्टाचार के प्रति प्रतिबद्धता को स्पष्ट करेंगे।




