
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
ईद मिलाद-उन-नबी का पर्व केवल धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए प्रेम, करुणा, शांति और भाईचारे के उस संदेश को याद करने का अवसर है, जिसकी आज के दौर में सबसे अधिक आवश्यकता है। हज़रत मोहम्मद साहब का जीवन और उनका संदेश किसी एक समाज, समुदाय या वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसमें संपूर्ण मानव समाज के लिए ऐसी प्रेरणा निहित है, जो एक बेहतर, न्यायपूर्ण और संवेदनशील दुनिया की आधारशिला बन सकती है।आज हम तकनीक के युग में हैं, विकास के नए आयाम गढ़ रहे हैं, अंतरिक्ष तक पहुँच चुके हैं, लेकिन क्या हम वास्तव में इंसानियत के उस मुकाम तक पहुँच पाए हैं, जहाँ एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के दुःख को अपना दुःख समझ सके? यही वह प्रश्न है, जो ईद मिलाद-उन-नबी के अवसर पर हमें स्वयं से पूछना चाहिए।हज़रत मोहम्मद साहब के जीवन का सबसे बड़ा संदेश यही था कि इंसान की महानता उसके धन, पद, शक्ति या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और व्यवहार से तय होती है। जरूरतमंद की सहायता करना, भूखे को भोजन देना, कमजोर के साथ न्याय करना, पड़ोसी का सम्मान करना और समाज में शांति तथा सद्भाव बनाए रखना—ये केवल आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि एक सभ्य समाज की वास्तविक पहचान हैं।आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में नफरत की भाषा तेजी से फैल रही है, धर्म और पहचान के नाम पर समाजों को बाँटने का प्रयास किया जा रहा है, तब हज़रत मोहम्मद साहब का संदेश हमें चेतावनी भी देता है और रास्ता भी दिखाता है। चेतावनी इसलिए कि नफरत अंततः समाज को कमजोर करती है और रास्ता इसलिए कि प्रेम तथा करुणा ही मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की सबसे बड़ी शक्ति है।यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अक्सर अपने-अपने धार्मिक और सामाजिक प्रतीकों का सम्मान तो करते हैं, लेकिन उनके बताए मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारने में पीछे रह जाते हैं। कोई पर्व तभी सार्थक होता है, जब उसके संदेश को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन में स्थान दिया जाए। यदि हमारे घरों में समृद्धि है और पड़ोस में कोई भूखा सो रहा है, यदि हम शांति की बातें करते हैं और व्यवहार में कटुता रखते हैं, यदि हम इंसानियत का दावा करते हैं और जरूरत के समय किसी जरूरतमंद से मुंह मोड़ लेते हैं, तो हमारे उत्सवों की आत्मा अधूरी रह जाती है।भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में एकता रही है। अनेक धर्म, अनेक भाषाएँ, अनेक संस्कृतियाँ और अनेक परंपराओं के बावजूद इस देश की आत्मा सदैव एक-दूसरे के पर्वों में सहभागी होने की रही है। ईद मिलाद-उन-नबी भी इसी साझी संस्कृति और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने का अवसर है। जब एक समुदाय की खुशियों में दूसरा समुदाय सहभागी बनता है, तब केवल एक पर्व नहीं मनाया जाता, बल्कि राष्ट्र की एकता और सामाजिक विश्वास को मजबूत किया जाता है।छत्तीसगढ़ की माटी भी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे की माटी है। यहाँ की संस्कृति का मूल भाव ही अपनत्व है। हमारे लोकजीवन में जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनने की परंपरा रही है। आज आवश्यकता है कि हम इस परंपरा को केवल स्मृतियों तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने वर्तमान और भविष्य का आधार बनाएं।ईद मिलाद-उन-नबी का वास्तविक संदेश शायद यही है कि दुनिया को बदलने से पहले हम अपने भीतर की कठोरता को बदलें। समाज में प्रेम चाहिए तो हमें प्रेम बाँटना होगा। शांति चाहिए तो हमें अपने व्यवहार में शांति लानी होगी। भाईचारा चाहिए तो हमें भेदभाव की दीवारें गिरानी होंगी। इंसानियत चाहिए तो हमें इंसान के दुःख को पहचानना होगा।आज समाज के सामने बेरोजगारी, गरीबी, सामाजिक असमानता, हिंसा और नफरत जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं। इन चुनौतियों का सामना केवल कानून और प्रशासन के बल पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज के भीतर संवेदना, आपसी विश्वास और मानवीयता की भावना को मजबूत करना होगा। यही वह मार्ग है, जिस पर चलकर एक समरस और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण किया जा सकता है।ईद मिलाद-उन-नबी के इस पावन अवसर पर सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए कि हम इंसानियत को अपने जीवन का सर्वोच्च मूल्य बनाएंगे। हम किसी भी व्यक्ति को उसकी पहचान से पहले एक इंसान के रूप में देखेंगे। हम जरूरतमंद की सहायता के लिए आगे आएंगे, नफरत के बजाय प्रेम की भाषा बोलेंगे और समाज को जोड़ने वाली हर पहल का समर्थन करेंगे।हज़रत मोहम्मद साहब का जीवन हमें यही प्रेरणा देता है कि सच्ची महानता दूसरों को छोटा दिखाने में नहीं, बल्कि दूसरों को सम्मान देने में है; शक्ति दूसरों को दबाने में नहीं, बल्कि कमजोर का सहारा बनने में है; और धर्म का सर्वोच्च स्वरूप विभाजन में नहीं, बल्कि मानवता की सेवा में दिखाई देता है।ईद मिलाद-उन-नबी के पावन अवसर पर आइए, हम केवल पर्व न मनाएं, बल्कि उसके संदेश को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। प्रेम को अपना व्यवहार, करुणा को अपना संस्कार, शांति को अपना उद्देश्य और इंसानियत को अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाएं।यही मिलाद का सच्चा संदेश है—और शायद आज के दौर में यही मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।ईद मिलाद-उन-नबी की समस्त मुस्लिम भाई-बहनों को हार्दिक मुबारकबाद और शुभकामनाएँ।ईद मिलाद-उन-नबी मुबारक!



