
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
महाराष्ट्र राज्य के वर्धा जिले के प्रादेशिक वन में पहली बार अति दुर्लभ एल्बीनो बुलबुल देखी गयी। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के मानवविज्ञान विभाग के एसोशिएट प्रोफेसर एवं वन्यजीव प्रेमी डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव हमेशा की तरह अपने प्रकृति प्रेमी साथियों डॉ. पीयूष पतंजलि एवं समीर अवस्थी के साथ बीते रविवार वर्धा के प्रादेशिक वन क्षेत्र में विचरण कर रहे थे कि उन्हें सड़क पर बैठी कुछ चिड़ियाँ दिखीं। कार समीप आने के कारण वे चिड़ियाँ उड़ कर सड़क के किनारे एक झाड़ी पर बैठ गईं। डॉ. यादव को उन चिड़ियों में एक चिड़िया असमान्य रूप से सफ़ेद रंग की दिखी। अपनी आशंका को मिटाने के लिए वे चिड़िया के करीब गए और उस सफ़ेद चिड़िया की पूछ के नीचे के लाल धब्बे (अंडर-टेल कवरट्स/वेंट) को देखकर समझ गए कि यह अति दुर्लभ एल्बीनो बुलबुल है। अपनी इस खोज को पुष्ट करने के लिए, मोबाइल से ली गयी तस्वीर को उन्होंने तुरंत वर्धा जिले के वनसंशोधन केंद्र के वनरक्षक और पक्षी विशेषज्ञ मनेशकुमार लिंगुराम सज्जन को भेजी। इस महत्त्वपूर्ण खोज से प्रभावित होकर एक घंटे के अंदर वनरक्षक मनेशकुमार वर्धा मुख्यालय से चालीस किलोमीटर दूर स्थित उस क्षेत्र में पहुँच गए। बाघ, तेंदुए, भालू और विषैले साँपों वाले जंगल के काफी अंदर तक डॉ. यादव और वनरक्षक मनेशकुमार घनी झाड़ियों, ऊंची घास और सघन पेड़ों में एल्बीनो बुलबुल का पैदल पीछा करते रहे तथा वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए उसकी तस्वीरें और विडियो रेकॉर्ड करते रहे। डॉ. यादव ने बताया कि लगभग तीस हज़ार में एक पक्षी में एल्बिनो होने की संभावना होती है। बुलबुल में यह और भी दुर्लभ है। पक्षियों में आनुवांशिक म्यूटेशन के कारण उनका प्राकृतिक रंग देने वाला पिग्मेंट ‘मेलेनिन’ बनना जब बंद हो जाता है और वह सफ़ेद रंग की (एल्बिनो) हो जाती हैं। यह एक बहुत दुर्लभ जन्मजात स्थिति होती है, जो कि माता-पिता से प्राप्त जींस के कारण उत्पन्न होती है। इसमें पक्षी के पंख पूरी तरह सफ़ेद (पूर्ण एल्बिनो) या आंशिक रूप से सफ़ेद (आंशिक एल्बिनो) तथा आँखें, चोंच और पैर गुलाबी अथवा लाल रंग के हो जाते हैं। अधिकांश एल्बिनो पक्षी अपनी निर्धारित आयु से पहले ही मर जाते हैं क्योंकि मेलेनिन पिग्मेंट न होने के कारण उनकी दृष्टि कमजोर होती है, जिसके कारण उन्हें भोजन खोजने में कठिनाई होती है। सफ़ेद रंग का होने के कारण वे दूर से ही शिकारी जानवरों व पक्षियों की नज़र में आ जाते हैं और कमजोर दृष्टि के कारण होने के कारण वे शिकारी जीवों का आसानी से शिकार हो जाते हैं। मेलेनिन न होने के कारण ऐसे पक्षियों की त्वचा और आँखों को धूप से भी नुकसान पहुंचता है। कई बार अलग दिखने के कारण साथी पक्षी इन्हें समूह से निकाल देते हैं। अलग दिखने के कारण ही अक्सर इन्हें साथी चुनने में भी दिक्कत आती है। भारत में पहली बार 1894 में तत्कालीन बॉम्बे में लेटर बेरी द्वारा आंशिक एल्बिनो बुलबुल रिपोर्ट की गयी थी। बेकर ने 1915 में असम, जोशुआ ने 1996 में तमिलनाडू, घोष और खान ने 2005 में मणिपुर में आंशिक एल्बिनो बुलबुल को दर्ज किया था। 1921 में एस. सी. लॉ द्वारा बंगाल प्रेसीडेंसी में पूर्ण एल्बिनो बुलबुल रिपोर्ट की गयी थी, जिसका जिक्र ‘जर्नल ऑफ द बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ में किया गया है। एल्बिनो बुलबुल देखा जाना इतना दुर्लभ है की अब से पहले महाराष्ट्र में इसकी रेपोर्टिंग गिनी-चुनी ही हुयी है। महाराष्ट्र में पहली बार 2011 में रायगढ़ जिले में पक्षी शोधकर्ता मेस्त्री और अन्य द्वारा आंशिक एल्बिनो बुलबुल रिपोर्ट की गयी। डॉ. गजेंद्र निकम और अन्य ने 2021 में बुलढाणा में आंशिक एल्बिनो बुलबुल रिपोर्ट की। फरवरी 2026 में कोंकण में आंशिक एल्बिनो बुलबुल को देखा गया। अब वर्धा में पहली बार अति दुर्लभ एल्बिनो बुलबुल को 26 जुलाई 2026 (रविवार) को डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव द्वारा दर्ज किया गया।



