तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में इन दिनों एक कथित बयान ने ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब अब केवल किसी एक अधिकारी से नहीं, बल्कि पूरी सरकार से मांगा जाना चाहिए। नवा रायपुर अटल नगर मंत्रालय में एक बड़े आईएएस अधिकारी द्वारा कथित तौर पर यह कहे जाने की चर्चा है कि “दो करोड़ रुपए देकर कलेक्टर बना हूं, मुख्यमंत्री भी नहीं हटा सकते।”‘सर्वव्यापी’ इस कथित बयान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता, लेकिन यदि यह बयान वास्तव में किसी कलेक्टर या वरिष्ठ अधिकारी ने दिया है तो यह सामान्य प्रशासनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि कलेक्टरों की पदस्थापना की पारदर्शिता, शासन के नियंत्रण और कथित आर्थिक लेन-देन से जुड़े बेहद गंभीर सवालों का विषय है।और मामला इसलिए भी गंभीर हो जाता है क्योंकि सत्ता पक्ष से जुड़े कुछ नेताओं के बीच भी कथित तौर पर यह चर्चा सामने आने लगी है कि कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक जैसे महत्वपूर्ण पदों की पदस्थापना में करोड़ों रुपये के लेन-देन के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि सत्ता पक्ष के भीतर से ही ऐसे सवाल उठ रहे हैं तो सरकार के लिए इन आरोपों को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।दो करोड़ का दावा सच है तो पैसा गया कहां?कथित बयान में सामने आई दो करोड़ रुपये की राशि सबसे बड़ा सवाल है।यदि यह केवल किसी अधिकारी की कथित डींग, अफवाह या राजनीतिक आरोप है तो सरकार को इसकी तत्काल स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लेकिन यदि कथन के पीछे कोई वास्तविक तथ्य है तो जांच का दायरा केवल संबंधित अधिकारी तक सीमित नहीं रह सकता।जांच में यह सामने आना चाहिए कि—क्या किसी प्रशासनिक पदस्थापना के लिए आर्थिक लेन-देन हुआ?कथित दो करोड़ रुपये किसे दिए गए?रकम नकद दी गई या किसी अन्य माध्यम से?क्या किसी बिचौलिए अथवा प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका थी?पदस्थापना की फाइल में किन अधिकारियों ने निर्णय लिया?क्या पदस्थापना निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप हुई?क्या शासन या किसी जांच एजेंसी को पहले से ऐसी कोई शिकायत मिली थी?यदि शिकायत मिली थी तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?‘मुख्यमंत्री भी नहीं हटा सकते’—तो फिर किसका संरक्षण?किसी अधिकारी का यह कथित दावा कि “मुख्यमंत्री भी नहीं हटा सकते”, अपने आप में प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।यदि यह बात प्रमाणित होती है तो सवाल यह नहीं रहेगा कि संबंधित अधिकारी कितना प्रभावशाली है। सवाल यह होगा कि उसके पीछे आखिर कौन-सी ताकत है, जिसके भरोसे वह निर्वाचित सरकार के मुखिया को भी चुनौती देने जैसी बात कह रहा है?यही वह बिंदु है जहां मामला एक अधिकारी के कथित बयान से निकलकर शासन की विश्वसनीयता तक पहुंच जाता है।सरकार के सामने दो रास्ते, लेकिन चुप्पी का रास्ता नहींयदि कथित बयान गलत है तो सरकार को सामने आकर इसे स्पष्ट करना चाहिए और फर्जी बयान फैलाने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए।यदि बयान वास्तविक है तो उसकी परिस्थितियों, संदर्भ और सत्यता की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।और यदि जांच में आर्थिक लेन-देन के प्रमाण सामने आते हैं तो फिर संबंधित सभी व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।यही प्रक्रिया यह भी स्पष्ट कर सकती है कि मामला केवल एक अधिकारी के दावे तक सीमित है या प्रशासनिक पदस्थापन की किसी व्यापक व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।भाजपा नेताओं के कथित सवाल ने बढ़ाई गंभीरताइस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक-प्रशासनिक पहलू यह है कि ‘सर्वव्यापी’ के अनुसार नवा रायपुर मंत्रालय में इस मुद्दे को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बीच भी सवाल उठ रहे हैं।कथित तौर पर सवाल किया जा रहा है कि यदि कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक जैसे पदों की पदस्थापना में करोड़ों रुपये के लेन-देन के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा और जांच की जिम्मेदारी किसकी होगी?यह आरोप किसी विपक्षी दल की ओर से ही नहीं, बल्कि यदि वास्तव में सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोगों की ओर से उठाए जा रहे हैं, तो सरकार के लिए इसकी निष्पक्ष जांच कराना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता।सरकार की अपनी कार्रवाई भी रखती है अलग तस्वीरयह भी तथ्य है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने अगस्त 2026 में बड़े प्रशासनिक फेरबदल में कई IAS अधिकारियों और जिलों के कलेक्टरों की पदस्थापना बदली थी।जुलाई 2026 में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के कलेक्टर को भी बदले जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।ऐसे प्रशासनिक फेरबदल यह दिखाते हैं कि कलेक्टरों की पदस्थापना शासन के प्रशासनिक निर्णयों के माध्यम से होती है। इसलिए किसी अधिकारी द्वारा कथित तौर पर यह कहना कि “मुख्यमंत्री भी नहीं हटा सकते”, यदि सत्यापित होता है, तो इस दावे के पीछे के आधार की जांच जरूरी हो जाती है।सवाल सिर्फ एक कलेक्टर का नहींकलेक्टर जिला प्रशासन का प्रमुख चेहरा होता है। राजस्व प्रशासन, विकास योजनाओं, आपदा प्रबंधन और शासन की अनेक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां उसके माध्यम से संचालित होती हैं।ऐसे पद को लेकर यदि करोड़ों रुपये के लेन-देन की चर्चा सामने आती है तो उसका सीधा असर जनता के भरोसे पर पड़ता है।क्या कलेक्टर की कुर्सी योग्यता, प्रशासनिक अनुभव और शासन के निर्णय से मिलती है या फिर पैसे और पहुंच से?इस सवाल का जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि दस्तावेजी जांच और पारदर्शी कार्रवाई से मिलना चाहिए।अब सरकार को जवाब देना होगासरकार चाहे तो इस पूरे विवाद को कुछ घंटे में समाप्त कर सकती है।कथित बयान की जांच कराए।बयान देने वाले की पहचान और वास्तविक संदर्भ सामने लाए।पदस्थापना की संबंधित फाइलों की जांच कराए।आर्थिक लेन-देन के आरोपों की स्वतंत्र जांच कराए।और यदि आरोप निराधार हों तो स्पष्ट रूप से खारिज करे।लेकिन यदि आरोपों में तथ्य मिलते हैं तो जांच को केवल अधिकारी तक सीमित न रखकर पैसे के स्रोत, माध्यम, लाभार्थी और संरक्षण की पूरी कड़ी तक पहुंचना होगा।क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि एक कलेक्टर की कुर्सी कितने में मिली।असली सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी पद की कीमत तय होने लगी है?और उससे भी बड़ा सवाल—अगर कोई अधिकारी यह कहने का साहस करता है कि मुख्यमंत्री भी उसे नहीं हटा सकते, तो फिर उसके पीछे कौन है?सरकार को अब इस सवाल का जवाब बयान से नहीं, जांच से देना होगा।




