
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बिलासपुर जिला शिक्षा विभाग में युक्तिकरण और अनुकम्पा नियुक्ति से जुड़े मामलों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। विभागीय स्तर पर कथित अनियमितताओं को लेकर जहां जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में होने की चर्चा है, वहीं कार्रवाई की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी मामले में अनियमितता हुई है तो कार्रवाई की दिशा जिम्मेदारी तय करने की ओर है या फिर केवल किसी एक अधिकारी-कर्मचारी को बलि का बकरा बनाने तक सीमित है?मामले को लेकर आरोप लगाया जा रहा है कि एक लिपिक को बचाने में विभागीय स्तर पर प्रभावशाली संरक्षण दिया जा रहा है। यदि यह आरोप निराधार है तो संबंधित विभाग और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। आखिर जांच और कार्रवाई में समान मापदंड क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं?दूसरी ओर, शिक्षा विभाग में वर्षों से कथित रूप से फर्जी शिक्षा कर्मी के रूप में कार्य करने वाले एक शिक्षक नेता की पत्नी से जुड़े मामले को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि पूरे मामले में दस्तावेज और शिकायतें सामने आने के बावजूद अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है। यदि नियुक्ति अथवा सेवा में फर्जीवाड़े के आरोप प्रमाणित होते हैं तो जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं की गई—यह सवाल अब शासन से पूछा जा रहा है।खुलासा करने वाले अधिकारी पर ही कार्रवाई क्यों?इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू संयुक्त संचालक शिक्षा संभाग बिलासपुर कार्यालय के एक सहायक संचालक के निलंबन से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि संबंधित अधिकारी ने कथित फर्जी शिक्षा कर्मी के मामले को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इसके बाद उन्हीं पर निलंबन की कार्रवाई कर दी गई।निलंबन को लगभग एक वर्ष बीतने के बाद भी यदि उनकी बहाली नहीं हुई है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि विभागीय जांच की स्थिति क्या है? आरोप कितने प्रमाणित हुए? जांच पूरी हुई या नहीं? और यदि जांच लंबित है तो इतने लंबे समय तक निलंबन जारी रखने का आधार क्या है?यदि अधिकारी दोषी हैं तो विभाग को जांच पूरी कर नियमानुसार अंतिम निर्णय लेना चाहिए। लेकिन यदि उन्होंने किसी अनियमितता को उजागर करने का काम किया और उसी कार्रवाई के परिणामस्वरूप उन्हें निलंबन झेलना पड़ा, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए और भी गंभीर प्रश्न है।मंत्री और मुख्यमंत्री से सीधे सवालइस मामले में अब निगाहें विभागीय मंत्री और मुख्यमंत्री की ओर भी हैं। सवाल यह नहीं है कि किस अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई हुई, सवाल यह है कि क्या कार्रवाई सभी आरोपितों और जिम्मेदार लोगों के लिए समान है?यदि फर्जी नियुक्ति या फर्जी शिक्षा कर्मी से जुड़े दस्तावेज शासन के सामने हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जा रही? यदि युक्तिकरण और अनुकम्पा नियुक्ति में गड़बड़ी के आरोप हैं तो पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होती? और यदि किसी लिपिक की भूमिका संदिग्ध है तो उसे संरक्षण मिलने की चर्चा पर शासन मौन क्यों है?एक ही विभाग, दो अलग-अलग पैमाने?शिक्षा विभाग में इस पूरे घटनाक्रम ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—क्या नियम सबके लिए समान हैं या कार्रवाई व्यक्ति देखकर तय होती है?एक तरफ कथित अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई की मांग वर्षों से लंबित होने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी तरफ कथित अनियमितता को उजागर करने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई और लंबे निलंबन का मामला सामने है। यदि दोनों मामलों में तथ्य हैं तो शासन को पारदर्शी तरीके से जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक करने चाहिए।अब जरूरत इस बात की है कि युक्तिकरण, अनुकम्पा नियुक्ति और कथित फर्जी शिक्षा कर्मी प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेजों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए और जिसकी भी जिम्मेदारी सामने आए, उसके विरुद्ध बिना किसी राजनीतिक अथवा प्रशासनिक दबाव के कार्रवाई हो।क्योंकि सवाल केवल एक अधिकारी की बहाली या एक कर्मचारी की कार्रवाई का नहीं है। सवाल यह है कि शिक्षा विभाग में नियम चल रहे हैं या रसूख? और यदि नियम समान हैं, तो फिर कार्रवाई के पैमाने अलग-अलग क्यों दिखाई दे रहे हैं?



