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महानदी विवाद के समाधान की राह में विकासशील का अनुभव बना अहम कड़ी।

विकास नंद/ सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच वर्षों से चले आ रहे महानदी जल विवाद के स्थायी समाधान की कोशिशों में अब राजनीतिक संवाद के साथ प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर भी तेजी दिखाई दे रही है। इस पूरी प्रक्रिया में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव विकासशील की भूमिका महत्वपूर्ण प्रशासनिक समन्वय के रूप में सामने आई है।

1 अक्टूबर को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने अपने-अपने राज्यों का पक्ष रखा।

बैठक में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष तथा दोनों राज्यों के मुख्य सचिव और वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

विवाद से समाधान की ओर बढ़ा संवाद

महानदी जल विवाद वर्ष 2018 से महानदी जल विवाद अधिकरण के समक्ष लंबित है। हाल के महीनों में दोनों राज्यों के बीच बातचीत और तकनीकी स्तर पर विचार-विमर्श ने इस लंबे विवाद को समाधान की दिशा में आगे बढ़ाया है। केंद्र सरकार ने भी दोनों राज्यों के बीच संवाद, तकनीकी सहयोग और सहकारी संघवाद के माध्यम से समाधान की दिशा में प्रयास तेज किए हैं।30 जुलाई 2026 को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री की अध्यक्षता में छत्तीसगढ़ और ओडिशा के मुख्यमंत्रियों की बैठक हुई थी। इसके बाद दोनों राज्यों के बीच तकनीकी चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए केंद्रीय जल आयोग की अध्यक्षता में विस्तारित तकनीकी समिति का गठन किया गया। इस समिति की पहली बैठक 29 जुलाई को हुई थी।

प्रशासनिक अनुभव का हो रहा उपयोग

मुख्य सचिव विकासशील लंबे प्रशासनिक अनुभव वाले अधिकारी हैं। जिला प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण विभागों में काम करने के अनुभव ने उन्हें जटिल और बहु-स्तरीय प्रशासनिक विषयों के समन्वय का व्यापक अनुभव दिया है।महानदी विवाद केवल पानी के बंटवारे का विषय नहीं है। इसमें कृषि, सिंचाई, औद्योगिक जरूरत, पेयजल, भविष्य की जल आवश्यकता, नदी प्रवाह, हीराकुंड बांध और दोनों राज्यों के दीर्घकालिक हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में राजनीतिक स्तर पर लिए गए निर्णयों को तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर जमीन तक पहुंचाने में मुख्य सचिव की भूमिका अहम हो जाती है।

टकराव से ज्यादा संवाद पर जोर

महानदी विवाद में छत्तीसगढ़ की मौजूदा रणनीति का प्रमुख आधार वैज्ञानिक आकलन, पारदर्शिता और दोनों राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए समाधान तलाशना है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी महानदी को दोनों राज्यों को जोड़ने वाली नदी बताते हुए निष्पक्ष, वैज्ञानिक और दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है। साथ ही उन्होंने ओडिशा के हीराकुंड बांध के हितों की सुरक्षा के प्रति छत्तीसगढ़ की प्रतिबद्धता भी दोहराई है।यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक स्तर पर मुख्य सचिव विकासशील का अनुभव महत्वपूर्ण हो सकता है। उनका दायित्व राजनीतिक सहमति को प्रशासनिक कार्रवाई, विभागीय समन्वय और तकनीकी तथ्यों के साथ जोड़ना है।

अब सबसे बड़ी चुनौती—जल बंटवारे का फार्मूला

हालांकि समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, लेकिन विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 46 मुद्दों में से 15 मुद्दों पर सहमति बन चुकी है, जबकि 31 मुद्दे अभी लंबित हैं। इनमें पानी के न्यायसंगत बंटवारे, पुराने उपयोग के अधिकार और कम पानी वाले मौसम में जल संचालन जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।केंद्रीय जल आयोग ने दोनों राज्यों से तकनीकी आंकड़े भी मांगे हैं। इनमें भूमि उपयोग, फसल पैटर्न, जलवायु एवं जल विज्ञान, भूजल, औद्योगिक जल उपयोग और सिंचाई जैसी जानकारियां शामिल हैं। ऐसे में आगे की बातचीत में आंकड़ों और वैज्ञानिक आकलन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।

विकासशील के सामने बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी

महानदी विवाद के समाधान में अब चुनौती केवल राजनीतिक सहमति बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है जिसे दोनों राज्य स्वीकार कर सकें और भविष्य में भी उस पर विवाद की गुंजाइश कम हो।

छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव के तौर पर विकासशील के सामने इस प्रक्रिया में तीन प्रमुख जिम्मेदारियां महत्वपूर्ण मानी जा सकती हैं—राज्य के हितों की मजबूती से पैरवी, तकनीकी तथ्यों का प्रभावी समन्वय और ओडिशा के साथ संवाद की सकारात्मक प्रक्रिया को बनाए रखना।यदि दोनों राज्यों के बीच तकनीकी स्तर पर सहमति बनती है और राजनीतिक नेतृत्व उस पर अंतिम सहमति की मुहर लगाता है, तो महानदी विवाद को वर्षों पुराने टकराव से निकालकर सहयोग और साझा जल प्रबंधन के मॉडल की दिशा में ले जाने का रास्ता खुल सकता है।

फिलहाल 1 अक्टूबर की उच्चस्तरीय बैठक ने यह संकेत जरूर दिया है कि महानदी विवाद अब केवल कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक समन्वय और वैज्ञानिक तकनीकी संवाद के जरिए समाधान तलाशने की कोशिश निर्णायक चरण में पहुंच रही है।

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