
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के साथ लोगों को उम्मीद थी कि शासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आएगी, फैसलों में जवाबदेही बढ़ेगी और आम आदमी का काम नियम और कानून के आधार पर होगा। लेकिन आज सत्ता के गलियारों से लेकर प्रशासनिक दफ्तरों तक जिस एक वाक्य की चर्चा लगातार सुनाई दे रही है, वह लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर सवाल खड़ा करता है—“जो सिस्टम चल रहा है, उसका पालन करेंगे तभी काम होगा, अन्यथा नहीं।” सवाल यह है कि आखिर यह सिस्टम है क्या? क्या यह वही संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था है, जिसके तहत सरकार और प्रशासन संचालित होते हैं, या फिर समय के साथ विकसित हुई कोई ऐसी अनौपचारिक व्यवस्था, जिसमें नियमों से ज्यादा महत्व संपर्क, पहुंच, सिफारिश और प्रभाव का हो गया है?विष्णु देव साय सरकार में मंत्री, विधायक, सांसद और अफसरों के बीच इस तरह की बातें सुनाई देने की चर्चा यदि सही है, तो इसे सामान्य राजनीतिक संवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि लोकतंत्र में “सिस्टम” का अर्थ संविधान, कानून, नियम और निर्धारित प्रक्रिया होना चाहिए। किसी व्यक्ति विशेष की इच्छा, किसी अधिकारी की सुविधा, किसी राजनीतिक प्रभाव या किसी बंद कमरे में तय हुए अनौपचारिक तौर-तरीकों को सिस्टम का नाम दे दिया जाए, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आम नागरिक आखिर किस दरवाजे पर जाए?आज स्थिति यह है कि कोई व्यक्ति अपना वैधानिक काम लेकर कार्यालय पहुंचता है तो उसे नियम-कायदे बताए जाते हैं, लेकिन उसी व्यक्ति को यदि यह महसूस होने लगे कि नियमों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह जानना है कि किससे मिलना है, किसकी सिफारिश लगानी है और किस “सिस्टम” का पालन करना है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। लोकतंत्र में व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें नागरिक को अपने काम के लिए किसी सत्ता केंद्र, नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की चौखट न तलाशनी पड़े।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि वास्तव में कोई “चलता हुआ सिस्टम” है, तो उसकी वैधानिकता क्या है? उसे किस नियमावली में परिभाषित किया गया है? उसकी जवाबदेही किसके प्रति है? उसमें निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या उस सिस्टम की जानकारी आम नागरिक को भी उपलब्ध है? यदि नहीं, तो फिर वह पारदर्शी शासन व्यवस्था का हिस्सा कैसे हो सकता है?सरकारें आती-जाती रहती हैं, मंत्री बदलते हैं, अधिकारी बदलते हैं, लेकिन शासन व्यवस्था का आधार नहीं बदलना चाहिए। संविधान और कानून किसी सरकार के बदलने के साथ नहीं बदलते। इसलिए किसी भी सरकार की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि उसके पास कितनी योजनाएं हैं या कितने बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, बल्कि यह होना चाहिए कि आम आदमी का काम कितनी आसानी से, कितनी पारदर्शिता से और कितने समय में होता है।छत्तीसगढ़ की जनता ने भी यही उम्मीद की थी कि सरकार बदलने के बाद प्रशासनिक संस्कृति बदलेगी। भ्रष्टाचार और सिफारिश के आरोपों से मुक्ति मिलेगी। तबादले से लेकर नियुक्ति, ठेके से लेकर खरीदी, शिकायत से लेकर कार्रवाई और सामान्य प्रशासनिक काम से लेकर बड़े नीतिगत फैसलों तक हर जगह एक स्पष्ट प्रक्रिया दिखाई देगी। लेकिन यदि हर काम के पीछे “सिस्टम” की दुहाई दी जाने लगे और सिस्टम का अर्थ ही अस्पष्ट हो जाए, तो सरकार की जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।यहां एक और गंभीर पहलू है। यदि कोई मंत्री, विधायक या सांसद किसी नागरिक की समस्या लेकर अधिकारी के पास जाता है और उसे भी जवाब मिलता है कि “सिस्टम यही है”, तो यह केवल उस जनप्रतिनिधि की परेशानी नहीं है, बल्कि उस क्षेत्र की जनता के विश्वास का सवाल है। जनप्रतिनिधि जनता और सरकार के बीच सेतु होता है। यदि वह भी किसी अदृश्य व्यवस्था के सामने खुद को असहाय महसूस करने लगे, तो आम नागरिक की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।और यदि कोई अधिकारी यह कहता है कि “सिस्टम के अनुसार ही काम होगा”, तो उससे यह पूछना भी जरूरी है कि वह सिस्टम किस कानून के तहत काम कर रहा है। अधिकारी नियमों से बंधा है, इसलिए नियमों का पालन होना चाहिए। लेकिन नियम और “सिस्टम” में अंतर है। नियम लिखित होते हैं, उनकी प्रक्रिया निर्धारित होती है और उनकी समीक्षा संभव होती है। जबकि अनौपचारिक सिस्टम की सबसे बड़ी समस्या यही है कि उसकी कोई स्पष्ट सीमा और जवाबदेही दिखाई नहीं देती।छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ समय से तबादलों, नियुक्तियों, प्रशासनिक निर्णयों, विभागीय प्रक्रियाओं और सरकारी खरीदी को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे वातावरण में “सिस्टम” शब्द अपने आप में संदेह पैदा करता है। हर मामले में अनियमितता हुई है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा, लेकिन जहां सवाल उठ रहे हों वहां सरकार को चुप रहने के बजाय तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। क्योंकि पारदर्शिता का सबसे अच्छा रास्ता यही है कि निर्णयों के पीछे की प्रक्रिया सार्वजनिक हो।सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि राज्य में किसी भी वैधानिक काम के लिए कोई अनौपचारिक “सिस्टम” लागू नहीं है। यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी किसी नागरिक से यह कहता है कि “सिस्टम का पालन करो तभी काम होगा”, तो उस सिस्टम की पहचान और वैधानिक आधार सामने आना चाहिए। यदि यह केवल बोलचाल का शब्द है, तो सरकार को भी स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तविक व्यवस्था केवल कानून, नियम और निर्धारित प्रक्रिया पर आधारित है।लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब जनता को यह लगने लगे कि नियम किताबों में हैं और असली व्यवस्था कहीं और चलती है। यह धारणा अगर मजबूत होती गई तो सरकार के प्रति विश्वास कमजोर होगा। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से मजबूत नहीं होता, बल्कि जनता को यह विश्वास दिलाने से मजबूत होता है कि उसका काम बिना सिफारिश, बिना दबाव और बिना किसी अनौपचारिक रास्ते के भी हो सकता है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली सरकार के सामने इसलिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है—“सिस्टम” शब्द की इस बढ़ती चर्चा को केवल राजनीतिक बयानबाजी मानकर टालने के बजाय इसकी वास्तविकता को स्पष्ट करना। सरकार को यह संदेश देना होगा कि छत्तीसगढ़ में किसी व्यक्ति विशेष का सिस्टम नहीं, बल्कि संविधान और कानून का सिस्टम चलेगा। मंत्री हों, विधायक हों, सांसद हों या अधिकारी—सभी उसी व्यवस्था के अधीन होंगे।क्योंकि जनता को सिस्टम नहीं चाहिए, जनता को न्याय चाहिए। जनता को किसी की कृपा नहीं चाहिए, उसे अपना अधिकार चाहिए। उसे किसी के दरवाजे पर घंटों खड़े होकर सिफारिश नहीं करनी, उसे अपने वैधानिक काम के लिए निर्धारित प्रक्रिया चाहिए। और यही लोकतांत्रिक शासन की असली कसौटी है।आज जरूरत इस बात की है कि सरकार अपने कामकाज की प्रक्रिया को इतना पारदर्शी बनाए कि किसी नागरिक को यह पूछने की जरूरत ही न पड़े कि “काम कराने के लिए किस सिस्टम का पालन करना होगा?” उसे केवल इतना पता हो कि मेरा अधिकार क्या है, आवेदन कहां करना है, निर्णय कितने समय में होना है और यदि काम नहीं होता तो शिकायत किस अधिकारी के पास करनी है।यही सुशासन है। यही जवाबदेही है। यही लोकतंत्र है।वरना “सिस्टम चल रहा है” कहकर हर सवाल को टाल देना आसान जरूर है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब जनता को यह महसूस होने लगता है कि व्यवस्था उसके लिए नहीं बल्कि व्यवस्था के भीतर बैठे लोगों के लिए चल रही है, तब सबसे पहले सरकार से उसका भरोसा टूटता है।छत्तीसगढ़ की जनता को किसी अदृश्य सिस्टम की नहीं, दिखाई देने वाले सुशासन की जरूरत है। सवाल सरकार से यही है—आखिर चलेगा किसका सिस्टम: संविधान का, कानून का या फिर वह अनकहा सिस्टम जिसकी चर्चा आज सत्ता और प्रशासन के गलियारों में सुनाई दे रही है?



