तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
जिला शिक्षा कार्यालय बिलासपुर में युक्तियुक्तकरण एवं संशोधित पदोन्नति प्रकरण में अनियमितता के मामले में कनिष्ठ लेखा परीक्षक एवं तत्कालीन विधि खंड प्रभारी सुनील कुमार यादव के निलंबन के बाद अब कार्रवाई की दिशा को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विभागीय आदेश में जांच समिति की रिपोर्ट, अभिलेखों के परीक्षण और संबंधित अधिकारी के जवाब को असंतोषजनक पाए जाने का उल्लेख करते हुए सुनील यादव को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। लेकिन इसी पूरे प्रकरण के दौरान जिला शिक्षा अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे तत्कालीन डीईओ विजय ताण्डे की भूमिका पर विभाग ने क्या जांच की और यदि की तो उसका परिणाम क्या रहा, यह सवाल अब चर्चा के केंद्र में है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि युक्तियुक्तकरण और संशोधित पदोन्नति जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रकरण में गंभीर अनियमितता हुई और विभागीय जांच में संबंधित कर्मचारी की प्रथमदृष्टया संलिप्तता सामने आई, तो उस समय कार्यालय के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी की भूमिका की भी जांच हुई या नहीं? क्या पूरी प्रक्रिया केवल एक कनिष्ठ अधिकारी की जिम्मेदारी थी, अथवा निर्णय और अनुमोदन की श्रृंखला में अन्य अधिकारियों की भी भूमिका थी? यदि तत्कालीन डीईओ की भूमिका जांच के दायरे में नहीं आई तो इसका कारण क्या था?मामले को और गंभीर बनाने वाला तथ्य यह है कि आज ही विजय ताण्डे को सक्ती जिला शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी दिए जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में शिक्षा विभाग के भीतर और बाहर यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि जिस अवधि से जुड़े प्रकरण में बिलासपुर के एक अधिकारी को निलंबित किया गया, उसी अवधि के तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी को नई जिम्मेदारी सौंपने से पहले क्या विभाग ने संबंधित प्रकरण की पूरी प्रशासनिक जवाबदेही की समीक्षा की?जिला शिक्षा अधिकारी बिलासपुर द्वारा 30 सितंबर 2026 को जारी निलंबन आदेश में बताया गया है कि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से प्राप्त शिकायत पर तीन सदस्यीय जांच दल गठित किया गया था। जांच समिति ने 31 अगस्त और 23 सितंबर को प्रतिवेदन प्रस्तुत किए। इसके बाद सुनील यादव को 24 सितंबर को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और 25 सितंबर को उनके द्वारा जवाब प्रस्तुत किया गया, जिसे विभाग ने संतोषप्रद नहीं माना। इसके बाद छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियमों के तहत उन्हें निलंबित कर दिया गया।यानी विभाग ने शिकायत को गंभीर मानते हुए जांच कराई, जांच रिपोर्ट का परीक्षण किया, संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा और जवाब असंतोषजनक पाए जाने के बाद निलंबन की कार्रवाई भी कर दी। ऐसे में अब असली सवाल जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला को लेकर है।क्या युक्तियुक्तकरण और संशोधित पदोन्नति की प्रक्रिया केवल कनिष्ठ लेखा परीक्षक के स्तर पर संचालित हो रही थी? क्या तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी के स्तर पर किसी प्रकार का परीक्षण, अनुमोदन अथवा पर्यवेक्षण नहीं था? यदि था, तो उसकी जवाबदेही तय क्यों नहीं हुई? और यदि नहीं था, तो इतनी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था आखिर किसके जिम्मे थी?एक पर गिरी गाज, दूसरे को नई जिम्मेदारी—यह कैसा जवाबदेही मॉडल?शिक्षा विभाग के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि एक ही प्रकरण में जिम्मेदारी तय करने का पैमाना क्या है? एक कर्मचारी के विरुद्ध जांच रिपोर्ट के आधार पर निलंबन की कार्रवाई होती है, जबकि उसी कार्यालय के तत्कालीन प्रमुख अधिकारी को नई जगह जिला शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है, तो क्या विभाग ने दोनों भूमिकाओं का अलग-अलग मूल्यांकन किया है?यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल निलंबन आदेश के आधार पर तत्कालीन डीईओ विजय ताण्डे को दोषी माना जाए। लेकिन यह सवाल पूछना पूरी तरह जायज है कि क्या उनकी भूमिका की भी जांच हुई? यदि हुई तो उसका निष्कर्ष क्या है? और यदि जांच नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई?स्कूल शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब कौन मांगेगा?पूरे घटनाक्रम ने स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर विभाग में जवाबदेही का निर्धारण किस आधार पर होता है? क्या जिम्मेदारी केवल उस कर्मचारी तक सीमित रहेगी, जिसके हस्ताक्षर या कार्यवाही किसी फाइल में दिखाई दे रही है, अथवा उस पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की भी समीक्षा होगी जिसके तहत निर्णय लिए गए?विभाग के मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने भी अब यह सवाल है कि यदि जांच में गंभीर अनियमितता प्रथमदृष्टया सामने आई है तो जिम्मेदारी की पूरी कड़ी की निष्पक्ष समीक्षा क्यों नहीं की जाती? कहीं ऐसा तो नहीं कि विभागीय कार्रवाई का दायरा उस स्तर तक पहुंचने से पहले ही रुक जाता है, जहां असली प्रशासनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए?बिलासपुर शिक्षा विभाग से जुड़े इस मामले में अब कर्मचारियों के बीच भी यही चर्चा है कि निलंबन तो हो गया, लेकिन पूरी जवाबदेही कब तय होगी? यदि जांच में तत्कालीन DEO की कोई भूमिका नहीं पाई गई है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें क्लीन चिट किस आधार पर मिली। और यदि उनकी भूमिका की जांच ही नहीं हुई है, तो नई जिम्मेदारी सौंपने से पहले इसकी जांच क्यों नहीं कराई गई?मंत्री जी, सवाल सिर्फ एक कर्मचारी के निलंबन का नहीं हैस्कूल शिक्षा विभाग के जिम्मेदार मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों से अब यह अपेक्षा की जा रही है कि वे केवल निलंबन आदेश जारी कर मामले को समाप्त न मानें, बल्कि युक्तियुक्तकरण और संशोधित पदोन्नति प्रकरण की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा कराएं। किस स्तर पर क्या निर्णय हुआ, किसने उसका परीक्षण किया, किस अधिकारी ने अनुमोदन किया और किस स्तर पर कथित अनियमितता हुई—इन सभी सवालों का जवाब सामने आना चाहिए।क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि सुनील कुमार यादव पर कार्रवाई क्यों हुई? असली सवाल यह है कि जिस व्यवस्था में यह कथित अनियमितता हुई, उस व्यवस्था के जिम्मेदार अन्य अधिकारियों की जवाबदेही किस स्तर तक तय की गई?अब निगाहें स्कूल शिक्षा विभाग पर हैं कि वह इस मामले में केवल एक अधिकारी के निलंबन तक सीमित रहता है या फिर पूरी प्रशासनिक जिम्मेदारी की निष्पक्ष पड़ताल कर वास्तविक जवाबदेही तय करता है।



