तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
तुलसी बाराडेरा विकासखंड धरसीवां, जिला रायपुर स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय इन दिनों स्थायी प्राचार्य की कमी से जूझ रहा है। विद्यालय जैसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थान का संचालन लंबे समय से प्रभारी व्यवस्था के भरोसे चलने की स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विद्यार्थियों की पढ़ाई के साथ-साथ विद्यालय के प्रशासनिक कामकाज, अनुशासन और विकास संबंधी गतिविधियों के संचालन में स्थायी नेतृत्व की आवश्यकता होती है, ऐसे में प्राचार्य का पद रिक्त रहना चिंता का विषय माना जा रहा है।विद्यालय में प्राचार्य की पदस्थापना को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जिम्मेदार विभाग इस ओर कब गंभीरता दिखाएगा। शिक्षा विभाग द्वारा विद्यालयों में बेहतर शैक्षणिक वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रभावी प्रशासन की बात तो लगातार की जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर जब किसी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में नियमित प्राचार्य का अभाव बना रहे तो विभागीय दावों की वास्तविकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।प्राचार्य केवल एक पद नहीं, बल्कि विद्यालय की पूरी प्रशासनिक एवं शैक्षणिक व्यवस्था का केंद्र होता है। विद्यालय में शिक्षकों के बीच समन्वय, विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान, परीक्षा व्यवस्था, शासकीय योजनाओं का क्रियान्वयन, अभिभावकों से संवाद, विद्यालय के विकास कार्यों की निगरानी और विभागीय निर्देशों के प्रभावी पालन जैसी अनेक जिम्मेदारियां प्राचार्य के माध्यम से संचालित होती हैं। ऐसे में लंबे समय तक प्रभारी व्यवस्था पर निर्भरता विद्यालय की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शिक्षा विभाग में अधिकारियों के पास विद्यालयों की प्रशासनिक जरूरतों और रिक्त पदों की जानकारी रहती है, तो तुलसी बाराडेरा के इस शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में नियमित प्राचार्य की पदस्थापना अब तक क्यों नहीं की गई? क्या विभाग को किसी बड़ी समस्या या शिकायत का इंतजार है? यदि प्राचार्य का पद रिक्त है तो उसे भरने की प्रक्रिया कब पूरी होगी और विद्यार्थियों को स्थायी प्रशासनिक नेतृत्व कब मिलेगा?स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि विद्यालय की समस्या को लेकर शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का अपेक्षित ध्यान नहीं है। शिक्षा सचिव और जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) की जिम्मेदारी केवल कार्यालयों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यालयों की वास्तविक स्थिति पर नजर रखना भी है। ऐसे में तुलसी बाराडेरा के विद्यालय में प्राचार्य की कमी जैसे विषय पर तत्काल संज्ञान लेकर आवश्यक कार्रवाई किया जाना जरूरी है।यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरोध या समर्थन का नहीं, बल्कि विद्यालय में बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा हुआ विषय है। ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी वही बेहतर प्रशासनिक और शैक्षणिक सुविधाएं मिलनी चाहिए, जिनकी अपेक्षा शहरों के विद्यालयों से की जाती है। प्रभारी व्यवस्था यदि अल्प अवधि के लिए हो तो परिस्थितियों में स्वीकार्य हो सकती है, लेकिन इसे स्थायी विकल्प बना देना व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।अब जरूरत है कि शिक्षा विभाग इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तुलसी बाराडेरा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में नियमित प्राचार्य की पदस्थापना की दिशा में ठोस पहल करे। साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्राचार्य का पद कब से रिक्त है, वर्तमान में विद्यालय का संचालन किस व्यवस्था के तहत हो रहा है और स्थायी प्राचार्य की नियुक्ति के लिए विभाग ने अब तक क्या कार्रवाई की है।सवाल सीधा है—तुलसी बाराडेरा के इस विद्यालय को आखिर कब तक प्रभारी के भरोसे चलाया जाएगा? शिक्षा व्यवस्था की मजबूती केवल घोषणाओं और योजनाओं से नहीं, बल्कि विद्यालयों में आवश्यक पदों पर सक्षम अधिकारियों की नियमित पदस्थापना से सुनिश्चित होती है। अब देखना होगा कि शिक्षा सचिव और रायपुर जिला शिक्षा अधिकारी इस मामले में कब तक संज्ञान लेते हैं और विद्यार्थियों के हित में प्राचार्य की स्थायी पदस्थापना कब होती है।




