
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक सवाल लगातार उठ रहा है—क्या सरकारी अस्पतालों और सरकारी चिकित्सकों की कार्यप्रणाली में मौजूद कमियों का सीधा फायदा निजी अस्पतालों को मिल रहा है? यदि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को समय पर डॉक्टर, जांच, दवा और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो, तो आखिर कितने मरीज मजबूरी में निजी अस्पतालों की ओर जाएंगे? जमीनी हकीकत यही सवाल खड़ा करती है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की कमजोरियों और अव्यवस्थाओं के कारण मरीजों का एक बड़ा वर्ग निजी अस्पतालों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहा है और इसके बाद इलाज के नाम पर भारी-भरकम खर्च का सिलसिला शुरू हो जाता है।प्रदेश में सरकारी अस्पतालों के निर्माण, चिकित्सा उपकरणों की खरीदी, दवाइयों, डॉक्टरों के वेतन और स्वास्थ्य योजनाओं पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का व्यापक नेटवर्क मौजूद है। सरकार मुफ्त दवा, मुफ्त जांच और गरीबों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा की योजनाओं का दावा करती है, लेकिन मरीज के अस्पताल पहुंचने पर कई बार तस्वीर अलग नजर आती है। कहीं डॉक्टर नहीं मिलते, कहीं विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं होते, कहीं जांच के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है, कहीं मशीन खराब रहती है और कहीं आवश्यक दवा के लिए मरीज को बाहर की मेडिकल दुकान का रास्ता दिखा दिया जाता है।गंभीर मरीज और उसके परिजन इलाज में देरी का जोखिम नहीं लेना चाहते। जब सरकारी अस्पताल में उन्हें तत्काल सुविधा नहीं मिलती, तो वे निजी अस्पतालों की ओर दौड़ पड़ते हैं। निजी अस्पताल में भर्ती होने के बाद जांच, दवा, डॉक्टर विजिट, बेड, आईसीयू और विभिन्न चिकित्सा प्रक्रियाओं के नाम पर खर्च बढ़ता जाता है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार बीमारी के साथ-साथ इलाज के आर्थिक बोझ से भी जूझने लगते हैं। कई परिवारों को कर्ज लेने, जमीन गिरवी रखने या जीवनभर की जमा पूंजी खर्च करने तक की नौबत आ जाती है।यह भी सच है कि प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों और सभी सरकारी चिकित्सकों को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं है। अनेक सरकारी डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी सीमित संसाधनों के बावजूद उत्कृष्ट और समर्पित सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन जहां संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद मरीज को समय पर इलाज नहीं मिलता, वहां जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है। सवाल केवल चिकित्सकों का नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य प्रशासनिक व्यवस्था का है। डॉक्टरों की उपलब्धता, विशेषज्ञों की नियुक्ति, उपकरणों का रखरखाव, दवा की सप्लाई, लैब जांच, नर्सिंग स्टाफ और अस्पताल प्रबंधन—इन सभी की जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए।सरकारी डॉक्टरों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। सरकार उन्हें जनता की सेवा के लिए नियुक्त करती है। यदि अस्पताल के निर्धारित समय में चिकित्सक अनुपलब्ध हों या मरीजों को बिना उचित कारण निजी संस्थानों की ओर जाने के लिए मजबूर होना पड़े, तो इसकी निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग को नियमित निरीक्षण और उपस्थिति व्यवस्था को केवल औपचारिकता नहीं रहने देना चाहिए। मरीज के अनुभव को स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना बनाया जाना चाहिए।दूसरी ओर निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। इलाज की अनुमानित लागत, पैकेज की शर्तें, जांचों की आवश्यकता और बिलिंग में पारदर्शिता सुनिश्चित होना जरूरी है। किसी मरीज की बीमारी और उसके परिजनों की मजबूरी को अनियंत्रित व्यावसायिकता का अवसर नहीं बनाया जा सकता। यदि किसी निजी अस्पताल के खिलाफ अनावश्यक जांच, अनावश्यक भर्ती या अत्यधिक बिलिंग की शिकायत सामने आती है तो उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में निजी अस्पतालों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है, विशेषकर जटिल और विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं में। इसलिए निजी क्षेत्र को खलनायक बनाकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। असली सवाल यह है कि सरकारी अस्पतालों की वे कौन सी कमियां हैं, जिनके कारण आम आदमी को निजी अस्पतालों के महंगे इलाज की शरण में जाना पड़ रहा है? सरकार को इसका जिला और अस्पतालवार अध्ययन कराना चाहिए।कितने मरीज सरकारी अस्पतालों से निजी अस्पतालों की ओर जा रहे हैं? किन बीमारियों के मरीज सबसे अधिक रेफर हो रहे हैं? कौन सी जांचें समय पर उपलब्ध नहीं हैं? कितने अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है? कितनी मशीनें खराब या अनुपयोगी हैं? कितने मरीजों को दवा बाहर से खरीदनी पड़ रही है? इन सभी सवालों की वास्तविक समीक्षा किए बिना स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के दावे अधूरे रहेंगे।सरकारी अस्पतालों को केवल भवनों और मशीनों से नहीं, बल्कि प्रभावी व्यवस्था और जवाबदेही से मजबूत बनाना होगा। डॉक्टरों की नियमित उपलब्धता, आवश्यक विशेषज्ञों की नियुक्ति, मशीनों का रखरखाव, पर्याप्त दवा भंडारण, त्वरित जांच और मरीजों के साथ संवेदनशील व्यवहार—ये स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिक शर्तें हैं। अस्पताल में शिकायत दर्ज होने के बाद उसका समाधान भी समयबद्ध होना चाहिए।निजी अस्पतालों में भी पारदर्शी बिलिंग व्यवस्था, इलाज से पहले संभावित खर्च की स्पष्ट जानकारी और मरीजों के लिए प्रभावी शिकायत तंत्र अनिवार्य होना चाहिए। स्वास्थ्य विभाग को निजी अस्पतालों की नियमित निगरानी करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र मरीजों तक पहुंचे।छत्तीसगढ़ की जनता का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि बीमारी की घड़ी में आम नागरिक को निजी अस्पताल का महंगा दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है तो आखिर इस व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन लेगा? स्वास्थ्य सेवा का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा और नए भवनों का उद्घाटन नहीं है। मरीज को जब जरूरत हो, तब डॉक्टर मिले, जांच मिले, दवा मिले और सम्मानजनक इलाज मिले—यही किसी भी सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था की असली सफलता है।अब प्रदेश सरकार को सरकारी अस्पतालों और सरकारी चिकित्सकों की जवाबदेही से लेकर निजी अस्पतालों की बिलिंग और इलाज की व्यवस्था तक पूरे स्वास्थ्य तंत्र की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। क्योंकि जब सरकारी अस्पताल की व्यवस्था कमजोर पड़ती है, तब मरीज की मजबूरी निजी अस्पतालों के महंगे इलाज का आधार बनती है। और जब बीमारी तथा इलाज दोनों आम आदमी के लिए आर्थिक संकट बन जाएं, तब इसे केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट के रूप में देखना होगा।छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने का समय अब आ गया है। सरकारी अस्पतालों को भरोसेमंद और जवाबदेह बनाना तथा निजी अस्पतालों में पारदर्शिता और नियमन सुनिश्चित करना सरकार की दोहरी जिम्मेदारी है। अन्यथा सरकारी अस्पतालों की कमजोरियों के बीच निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर आम जनता की जेब खाली होने का खेल यूं ही चलता रहेगा और सबसे बड़ा नुकसान उस गरीब परिवार को होगा, जो बीमारी से ज्यादा इलाज के खर्च से डरता है।




