
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बिलासपुर नगर निगम में प्रतिनियुक्ति व्यवस्था को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार निगम में कई अधिकारी और कर्मचारी लंबे समय से प्रतिनियुक्ति पर जमे हुए हैं, जबकि सामान्य रूप से प्रतिनियुक्ति व्यवस्था को एक सीमित अवधि के लिए अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था माना जाता है। आरोप है कि कुछ अधिकारी पांच वर्ष या उससे अधिक समय से नगर निगम में पदस्थ हैं और समय-समय पर औपचारिक तबादले की प्रक्रिया पूरी करने के बाद उन्हें फिर से प्रतिनियुक्ति पर नगर निगम में वापस बुला लिया जाता है। इस व्यवस्था को लेकर निगम के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रतिनियुक्ति नियमों की अवधि और भावना का पालन किस स्तर तक किया जा रहा है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि प्रवेश कश्यप, प्रवीण शर्मा, विभा सिंह, मधुलिका सिंह, सागर राज, रंजना अग्रवाल, खंचाजी कुम्हार, भूपेंद्र उपाध्याय, अभिषेक मिश्रा लिपिक, छाया गोपाल लिपिक, अजय शुक्ला लिपिक, सविना अनंत और दीपिका भगत सहित अनेक अधिकारी-कर्मचारी प्रतिनियुक्ति अथवा उससे जुड़ी व्यवस्थाओं के तहत निगम में लंबे समय से कार्यरत बताए जा रहे हैं। इन सभी की वास्तविक पदस्थापना, मूल विभाग, प्रतिनियुक्ति अवधि और अवधि विस्तार के दस्तावेजों की जांच होने पर ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।बिलासपुर नगर निगम में प्रशासनिक पदों की संरचना को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। निगम में चार उपायुक्त पद स्वीकृत बताए जाते हैं, लेकिन आरोप है कि प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारी महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ उपायुक्त और जोन कमिश्नर के रूप में कार्य कर रहे हैं। विभागीय सूत्रों का दावा है कि कई बार छह महीने या साल भर की औपचारिक प्रक्रिया के तहत तबादला किया जाता है और उसके बाद संबंधित अधिकारी फिर प्रतिनियुक्ति पर निगम में लौट आते हैं। यदि इस प्रकार की प्रक्रिया लगातार चल रही है तो यह जांच का विषय है कि आखिर किसी अधिकारी को लंबे समय तक एक ही नगर निगम में बनाए रखने की प्रशासनिक आवश्यकता क्या है और क्या इस व्यवस्था से निगम के अपने अधिकारियों एवं कर्मचारियों के पदोन्नति के अवसर प्रभावित नहीं हो रहे हैं।नगर निगम आयुक्त प्रकाश कुमार सर्वे बिलासपुर जिले के मस्तूरी क्षेत्र के निवासी हैं और उनके कार्यकाल के दौरान निगम की प्रशासनिक व्यवस्था, प्रतिनियुक्ति पर अधिकारियों की लंबी पदस्थापना और कर्मचारियों के लंबित मामलों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। हालांकि इस पूरे मामले में निगम प्रशासन का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है, क्योंकि प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी की परिस्थितियां, पदस्थापना और विभागीय स्वीकृति अलग-अलग हो सकती हैं। लेकिन विभागीय सूत्रों द्वारा लगातार उठाए जा रहे सवालों ने नगर निगम की कार्यप्रणाली को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।इस पूरे मामले का एक और गंभीर पहलू निगम के तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि नगर निगम के अधिकारियों द्वारा करीब 715 तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों को निरस्त करा दिया गया और उसके बदले बड़े-बड़े उच्च पद स्वीकृत कराए गए। विभागीय गलियारों में इस निर्णय को लेकर यह चर्चा है कि निचले और मैदानी स्तर के पदों को समाप्त करने के बाद उच्चस्तरीय प्रशासनिक पदों की व्यवस्था बढ़ने से प्रतिनियुक्ति पर अधिकारियों की नियुक्ति का रास्ता आसान हुआ। यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नगर निगम के संचालन के लिए सफाई, जलप्रदाय, विद्युत, राजस्व और अन्य मैदानी कार्यों से जुड़े तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के सैकड़ों पदों को समाप्त करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी। नगर निगम जैसे बड़े स्थानीय निकाय में जहां प्रतिदिन नागरिक सुविधाओं से जुड़ी सेवाओं के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता होती है, वहां 715 पदों को समाप्त करने और उच्च पदों के सृजन की पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक हो जाती है।नगर निगम के पुराने कर्मचारियों की सबसे बड़ी पीड़ा नियमितीकरण और पदोन्नति को लेकर बताई जा रही है। आरोप है कि 1997 से पहले के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि बीस वर्ष या उससे अधिक समय से निगम की सेवा कर रहे कई कर्मचारियों का भी नियमितीकरण और पदोन्नति लंबित है। वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों को जहां अपने अधिकारों और पदोन्नति के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतिनियुक्ति पर आने वाले अधिकारियों के महत्वपूर्ण पदों पर लंबे समय तक बने रहने की चर्चाएं कर्मचारियों की नाराजगी बढ़ा रही हैं। कर्मचारी सवाल उठा रहे हैं कि यदि निगम में बड़े प्रशासनिक पदों की आवश्यकता है तो निगम के भीतर लंबे समय से सेवा दे रहे योग्य कर्मचारियों को अवसर क्यों नहीं दिया जा रहा है। आखिर नियमितीकरण और पदोन्नति की प्रक्रिया में वर्षों से विलंब क्यों हो रहा है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है?नगर निगम के कर्मचारियों और विभागीय सूत्रों के बीच अब यह धारणा बनती जा रही है कि प्रतिनियुक्ति की व्यवस्था अस्थायी प्रशासनिक आवश्यकता से आगे बढ़कर कुछ अधिकारियों के लिए लंबे समय तक निगम में बने रहने का माध्यम बनती जा रही है। यह आरोप भी सामने आ रहा है कि एक ही स्थान पर लंबे समय तक जमे रहने के कारण कुछ अधिकारी निगम की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर मजबूत पकड़ बना लेते हैं, जबकि पुराने और नियमित कर्मचारी अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता में रहते हैं। ऐसे में यह प्रश्न केवल अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति अवधि का नहीं है, बल्कि पूरे नगर निगम के प्रशासनिक ढांचे, पदों की संरचना और कर्मचारियों के अधिकारों का है।बिलासपुर नगर निगम में अब प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक किए जाने की मांग जोर पकड़ रही है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन अधिकारी किस मूल विभाग से कब निगम में प्रतिनियुक्ति पर आया, उसकी प्रतिनियुक्ति कितनी अवधि के लिए स्वीकृत हुई, कितनी बार उसका विस्तार किया गया और वह किस पद पर कार्यरत है। इसके साथ ही करीब 715 तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों को निरस्त करने की प्रक्रिया, उससे जुड़े प्रस्ताव और स्वीकृतियां तथा बाद में बड़े पदों के सृजन की पूरी प्रशासनिक फाइल की स्वतंत्र समीक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।वर्षों से नियमितीकरण और पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारियों का मामला भी अब और लंबे समय तक लंबित नहीं रहना चाहिए। 1997 से पहले के कर्मचारियों से लेकर बीस वर्ष या उससे अधिक समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों के मामलों की समयबद्ध समीक्षा कर स्पष्ट निर्णय लिया जाना चाहिए। नगर निगम प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि प्रतिनियुक्ति पर अधिकारियों की आवश्यकता होने पर स्थानीय निकाय संवर्ग और निगम के अपने कर्मचारियों को पदोन्नति के अवसर देने के लिए क्या प्रयास किए गए।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि प्रतिनियुक्ति वास्तव में अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था है तो बिलासपुर नगर निगम में कुछ अधिकारी पांच साल से अधिक समय तक कैसे जमे हुए हैं? यदि समय-समय पर तबादले के बाद फिर उसी निगम में प्रतिनियुक्ति पर वापसी हो रही है तो इस पूरी प्रक्रिया का औचित्य क्या है? और जब निगम में वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों का नियमितीकरण और पदोन्नति नहीं हो पा रहा है, तब महत्वपूर्ण पदों पर लगातार प्रतिनियुक्ति के माध्यम से अधिकारियों की पदस्थापना किस प्रशासनिक आवश्यकता के तहत की जा रही है? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और पारदर्शी जांच के माध्यम से सामने आना चाहिए। क्योंकि मामला किसी एक अधिकारी या कर्मचारी का नहीं, बल्कि नगर निगम बिलासपुर की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था और हजारों कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा हुआ है।




