जांच में सच लिखा तो निशाने पर आया जांचकर्ता! फर्जी नियुक्ति के सवालों से ज्यादा बड़ा सवाल—सच बोलने की सजा क्यों? एक ही जावक क्रमांक, अलग-अलग हस्ताक्षर, कार्यभार ग्रहण पर सवाल, वेतन रिकॉर्ड गायब और छह माह में नियम विरुद्ध स्थानांतरण के गंभीर आरोपों के बावजूद कार्रवाई की बजाय जांचकर्ता पर ही गिरी गाज—अब मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और शिक्षा सचिव से जवाब मांग रहा शिक्षा विभाग का यह पूरा मामला।
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी



छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में एक कथित फर्जी नियुक्ति की जांच अब केवल नियुक्ति और स्थानांतरण की अनियमितताओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसने जांच की निष्पक्षता, प्रभावशाली शिक्षक नेताओं के कथित दबाव, अधिकारियों पर प्रतिवेदन बदलने के आरोप और सच सामने लाने वाले जांचकर्ता को ही निशाने पर लेने जैसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध जांच प्रतिवेदन में शिक्षक नेता की पत्नी चंद्ररेखा शर्मा की नियुक्ति और स्थानांतरण को लेकर कई गंभीर विसंगतियां दर्ज की गई हैं। प्रतिवेदन के अनुसार नगर पंचायत पत्थलगांव ने स्वयं बताया कि संबंधित नियुक्ति और स्थानांतरण के संबंध में उसके पास कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। जांच के दौरान नगर पंचायत के आदेश क्रमांक 229, दिनांक 11 जनवरी 2007 से एक अन्य शिक्षिका नीलम टोप्पो की पदस्थापना शासकीय प्राथमिक शाला उरांवपारा (दर्रापारा) पत्थलगांव में पाई गई, जबकि चंद्ररेखा शर्मा की सेवा पुस्तिका में भी उसी जावक क्रमांक और उसी पदस्थापना स्थल का उल्लेख होना बताया गया। सबसे गंभीर तथ्य यह बताया गया कि दोनों आदेशों में अलग-अलग अधिकारियों के हस्ताक्षर पाए गए, जिससे दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर संदेह उत्पन्न हुआ। कार्मिक संपदा में नियुक्ति आदेश क्रमांक 2229 और सेवा पुस्तिका में 229 अंकित होने को भी जांच में महत्वपूर्ण विसंगति के रूप में दर्ज किया गया।जांच प्रतिवेदन के अनुसार शासकीय प्राथमिक शाला उरांवपारा (दर्रापारा) के तत्कालीन प्रधान पाठक, वर्तमान प्रधान पाठक और वहां पदस्थ शिक्षिका नीलम टोप्पो ने अपने बयान में कहा कि जनवरी 2007 से जुलाई 2007 के बीच चंद्ररेखा शर्मा ने वहां कभी कार्यभार ग्रहण नहीं किया। जांच दल ने उस अवधि के उपस्थिति पंजी का भी परीक्षण किया और प्रतिवेदन में कहा गया कि उसमें संबंधित शिक्षिका की उपस्थिति दर्ज नहीं थी। इतना ही नहीं, कथित रूप से संबंधित लोगों ने उन्हें पहचानने से भी इंकार किया। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि संबंधित शिक्षिका ने मूल पदस्थापना स्थल पर कार्यभार ग्रहण ही नहीं किया था तो फिर उनका स्थानांतरण किस आधार पर हुआ और विभागीय रिकॉर्ड में उनकी सेवा किस प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ी?जांच में यह भी पाया गया कि नगर पंचायत पत्थलगांव के आदेश दिनांक 24 जुलाई 2007 के माध्यम से चंद्ररेखा शर्मा को पति-पत्नी के आधार पर शासकीय प्राथमिक शाला उरांवपारा से शासकीय प्राथमिक शाला गोड़पारा मौपका, जनपद पंचायत बिल्हा में स्थानांतरित किया गया। जांच प्रतिवेदन में कहा गया कि मूल पदस्थापना नगर पंचायत क्षेत्र की थी, जबकि स्थानांतरण जनपद पंचायत क्षेत्र में किया गया। इसके साथ ही मूल शाला टी संवर्ग और नई शाला ई संवर्ग के अंतर्गत होने का भी उल्लेख किया गया। जांच दल के अनुसार नियुक्ति के लगभग छह माह के भीतर और परिवीक्षा अवधि पूरी होने से पहले किया गया यह स्थानांतरण नियमों के विपरीत था। जनपद पंचायत बिल्हा से जारी अनापत्ति प्रमाण पत्र में भी काट-छांट किए जाने और जनपद पंचायत पत्थलगांव के स्थान पर नगर पंचायत लिखे जाने पर सवाल उठाए गए। प्रतिवेदन में यह भी कहा गया कि कथित संशोधन के संबंध में किसी प्रकार के लघु हस्ताक्षर नहीं थे।मामला यहीं समाप्त नहीं होता। विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी पत्थलगांव द्वारा जुलाई 2007 का वेतन भुगतान किए जाने का उल्लेख अंतिम वेतन प्रमाण पत्र में किया गया, लेकिन जांच के दौरान संबंधित वेतन वाउचर कार्यालय में उपलब्ध नहीं होना बताया गया। संबंधित शिक्षिका से वेतन भुगतान के संबंध में बैंक पासबुक और अन्य साक्ष्य भी मांगे गए, लेकिन जांच प्रतिवेदन के अनुसार वे अपने पक्ष में आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकीं। उपलब्ध बैंक पासबुक की प्रति जुलाई 2015 में खोले गए खाते की बताई गई, जिससे वर्ष 2007 के वेतन भुगतान का सत्यापन नहीं हो सका। इन तमाम तथ्यों के आधार पर जांच दल ने अपने अभिमत में कहा कि श्रीमती चंद्ररेखा शर्मा द्वारा न तो शासकीय प्राथमिक शाला उरांवपारा में और न ही कार्यालय विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी पत्थलगांव में कार्यभार ग्रहण किए जाने का प्रमाण मिला। जांच दल ने नियुक्ति आदेशों में विसंगतियों और अलग-अलग अधिकारियों के हस्ताक्षरों को गंभीर मानते हुए कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर शासकीय सेवा प्राप्त करने की आशंका जताई तथा कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की।लेकिन इस मामले में अब सबसे गंभीर आरोप जांच प्रतिवेदन तैयार करने वाले अधिकारी की ओर से सामने आया है। जांचकर्ता का कहना है कि जब उन्होंने शिक्षक नेता की पत्नी की कथित फर्जी नियुक्ति और स्थानांतरण की जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तो उन पर जांच प्रतिवेदन बदलने का दबाव बनाया गया। इसी बीच जांच प्रतिवेदन वायरल हो गया। उनका कहना है कि उन्होंने प्रतिवेदन विधिवत कार्यालय की आवक शाखा में जमा किया था और यह प्रतिवेदन किसने वायरल किया, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। इसके बावजूद शिक्षक नेता की पत्नी द्वारा उन पर ही गोपनीय जांच प्रतिवेदन वायरल करने का आरोप लगाया गया। जांचकर्ता का दावा है कि दबाव में उनसे संशोधित प्रतिवेदन मांगा गया, लेकिन संशोधित प्रतिवेदन में भी उन्होंने वही तथ्य दर्ज किए जो जांच और दस्तावेजों से सामने आए थे। उनका आरोप है कि इससे संबंधित अधिकारी और शिक्षक नेता दोनों नाराज हो गए।जांचकर्ता के अनुसार उनका प्रतिवेदन स्वीकार्य नहीं होने पर उसके परीक्षण के लिए एक नई जांच टीम गठित की गई, जिसमें बैरागी जी को दल प्रभारी बनाया गया। उनका दावा है कि दूसरी जांच टीम ने भी मूल जांच प्रतिवेदन में दर्ज तथ्यों की पुष्टि कर दी। अब यहां सवाल सीधे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी तय करने वाले शीर्ष अधिकारियों से है कि यदि एक जांच दल के बाद दूसरे जांच दल ने भी मूल जांच में दर्ज तथ्यों की पुष्टि की तो फिर संबंधित मामले में निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिर विभागीय जांच का उद्देश्य सत्य तक पहुंचना है या फिर प्रभावशाली लोगों की सुविधा के अनुसार जांच प्रतिवेदन तैयार कराना?जांचकर्ता ने इसके बाद अपने विरुद्ध रची गई कथित साजिश का भी गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जब साझा मंच के लोग कार्यालय में ज्ञापन देने पहुंचे तो उन्हें ज्ञापन लेने की जिम्मेदारी सौंप दी गई, जबकि कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी कथित रूप से कार्यालय से अनुपस्थित हो गए। इसके बाद साझा मंच के कुछ लोगों ने उन पर नशे की हालत में होने का आरोप लगाया। जांचकर्ता का कहना है कि साझा मंच कई संगठनों का सामूहिक मंच था, लेकिन केवल तीन लोगों के बयान के आधार पर उन्हें नशे का आदी बताने जैसी कार्रवाई की गई और उन्हें निलंबित करा दिया गया। उनका दावा है कि बयानों में उनके द्वारा किसी प्रकार के दुर्व्यवहार की पुष्टि नहीं हुई, फिर भी उनके विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला गया।सबसे महत्वपूर्ण आरोप यह है कि जांचकर्ता ने प्रारंभिक जांच के दौरान कार्यालय के उन कर्मचारियों के बयान लेने का आग्रह किया था जो पूरी घटना के संबंध में प्रत्यक्ष जानकारी रखते थे, लेकिन जांच अधिकारी ने उनके बयान लेने से इंकार कर दिया। उनका कहना है कि जिन कार्यालय कर्मचारियों के बयान लिए जाते तो घटना का पूरा सच सामने आ सकता था, उन्हें जानबूझकर जांच से दूर रखा गया। जांचकर्ता का आरोप है कि नियमानुसार उनकी जांच उनके उच्च अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए थी, लेकिन उनके समकक्ष अधिकारी से जांच कराई गई और बिना सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों के बयान लिए निष्कर्ष निकाल दिया गया। उनका साफ आरोप है कि उन्हें पूरी तरह साजिश के तहत निशाना बनाया गया, क्योंकि उन्होंने कथित फर्जी नियुक्ति की जांच में प्रभावशाली लोगों के विरुद्ध प्रतिकूल तथ्य दर्ज कर दिए थे।अब सवाल मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से है कि उनकी सरकार जिस सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई का दावा करती है, उसमें यदि कोई अधिकारी दस्तावेजों और गवाहों के आधार पर गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख करता है तो उस जांच पर कार्रवाई क्यों नहीं होती और जांचकर्ता स्वयं आरोपों और निलंबन की कार्रवाई में क्यों फंस जाता है? क्या मुख्यमंत्री इस पूरे मामले की स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच कराएंगे? क्या जांच प्रतिवेदन में दर्ज नियुक्ति, हस्ताक्षर, जावक क्रमांक, कार्यभार ग्रहण, उपस्थिति, वेतन भुगतान और स्थानांतरण से जुड़े सभी तथ्यों का फिर से निष्पक्ष परीक्षण होगा? क्या यह भी जांचा जाएगा कि गोपनीय जांच प्रतिवेदन किसने वायरल किया और बिना ठोस प्रमाण जांचकर्ता पर ही आरोप क्यों लगाया गया?शिक्षा मंत्री से भी जवाब अपेक्षित है कि आखिर शिक्षा विभाग में किसकी जवाबदेही तय होगी? यदि नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियां थीं, यदि मूल पदस्थापना स्थल पर कार्यभार ग्रहण करने का रिकॉर्ड नहीं मिला, यदि छह माह के भीतर परिवीक्षा अवधि समाप्त होने से पहले संवर्ग और क्षेत्र बदलकर स्थानांतरण किया गया और यदि जांच दल ने कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की, तो उस मामले में कार्रवाई की स्थिति क्या है? क्या किसी शिक्षक नेता की कथित पहुंच और प्रभाव के कारण जांच की दिशा बदलने का प्रयास किया गया? क्या जांचकर्ता को दबाव में लेने और बाद में उन्हें ही विवाद में फंसाने के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होगी?शिक्षा सचिव के सामने भी यह मामला विभागीय विश्वसनीयता की सबसे बड़ी परीक्षा बनकर खड़ा है। नियुक्ति आदेश से लेकर सेवा पुस्तिका तक, कार्मिक संपदा की प्रविष्टियों से लेकर उपस्थिति पंजी तक, वेतन वाउचर से लेकर बैंक खाते तक और अनापत्ति प्रमाण पत्र से लेकर स्थानांतरण आदेश तक पूरे रिकॉर्ड का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक है। साथ ही मूल जांच प्रतिवेदन, संशोधित प्रतिवेदन, बाद की जांच टीम की रिपोर्ट, जांचकर्ता के विरुद्ध निलंबन की प्रक्रिया और उनके द्वारा बताए गए कार्यालय कर्मचारियों के बयान क्यों नहीं लिए गए, इसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता और श्रीमती चंद्ररेखा शर्मा तथा अन्य संबंधित पक्षों को भी अपना पक्ष रखने और निष्पक्ष जांच का पूरा अधिकार है, लेकिन जांच प्रतिवेदन में उठाए गए गंभीर तथ्यों को भी बिना निष्पक्ष परीक्षण के दबाया नहीं जा सकता। यही कारण है कि अब इस मामले में विभागीय फाइलों के भीतर निर्णय लेने के बजाय पूरे प्रकरण की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आखिर सवाल केवल एक शिक्षिका की नियुक्ति का नहीं है, बल्कि यह भी है कि यदि जांचकर्ता का आरोप सही पाया जाता है तो क्या शिक्षा विभाग में प्रभावशाली लोगों के विरुद्ध जांच करने वाले अधिकारी सुरक्षित हैं?सरकार को अब यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर जांच में दोषी कौन है और कार्रवाई किसके विरुद्ध हुई? यदि जांच प्रतिवेदन गलत था तो उसे दस्तावेजों के आधार पर खारिज किया जाए, यदि जांचकर्ता ने गलत तथ्य दर्ज किए तो उनके विरुद्ध कानूनसम्मत कार्रवाई हो, लेकिन यदि जांच में दर्ज तथ्य सही पाए जाते हैं तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई? मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और शिक्षा सचिव से अब सीधा सवाल है—जांच में सच सामने आया तो उस पर कार्रवाई कब होगी, और यदि सच लिखने वाले जांचकर्ता को ही निशाना बनाया गया तो फिर विभाग में निष्पक्ष जांच करने का साहस कौन करेगा?“फर्जी नियुक्ति के आरोपों की जांच करने वाला ही निलंबित हो जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है—जांच में सच लिखना अपराध है या फिर सच को दबाना ही नया प्रशासनिक नियम बन गया है?”




