
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के नगरीय निकाय प्रशासन एवं विकास विभाग में प्रमुख सचिव के रूप में सोनमणि बोरा की जिम्मेदारी संभालते ही प्रदेश के शहरों की व्यवस्थाओं में बदलाव की उम्मीदें दिखाई देने लगी हैं। वर्षों से उपेक्षा, धूल-मिट्टी, पक्षियों की गंदगी और रखरखाव की कमी का शिकार हो रही महापुरुषों की प्रतिमाओं की साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण का काम शुरू होने को विभागीय सक्रियता का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।प्रदेश के नगरीय निकाय क्षेत्रों में स्थापित राष्ट्रनायकों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और समाज सुधारकों की प्रतिमाएं केवल पत्थर या धातु की संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि वे समाज की स्मृति, इतिहास और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के प्रतीक हैं। विडंबना यह रही कि कई स्थानों पर इन्हीं प्रतिमाओं के आसपास लंबे समय तक साफ-सफाई और नियमित रखरखाव की कमी दिखाई देती रही। जयंती और पुण्यतिथि के अवसर पर औपचारिक सफाई के बाद फिर उपेक्षा का पुराना सिलसिला शुरू हो जाता था।लेकिन नगरीय निकाय प्रशासन एवं विकास विभाग की कमान प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा के हाथों में आते ही महापुरुषों की प्रतिमाओं की साफ-सफाई को लेकर सक्रियता दिखाई देने लगी है। नगरीय निकायों में प्रतिमाओं की स्वच्छता, उनके आसपास की सफाई, रंग-रोगन, परिसर के सौंदर्यीकरण और आवश्यक रखरखाव की दिशा में काम शुरू होने की चर्चा है।प्रशासनिक सक्रियता का दिखने लगा असरप्रशासनिक गलियारों में यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है कि शहरों की पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों और महापुरुषों की प्रतिमाओं का नियमित रखरखाव आखिर किसकी प्राथमिकता में है? सड़क, नाली, भवन और प्रकाश व्यवस्था के बीच इन ऐतिहासिक और प्रेरणादायक स्थलों को कई बार नजरअंदाज कर दिया जाता है।प्रमुख सचिव के रूप में सोनमणि बोरा की जिम्मेदारी संभालने के बाद इस दिशा में दिखाई दे रही सक्रियता ने यह संदेश दिया है कि नगरीय विकास का अर्थ केवल सीमेंट-कंक्रीट के निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए। शहर की पहचान, उसका इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और महापुरुषों के प्रति सम्मान भी सुशासित नगरीय व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं।केवल समारोह नहीं, नियमित रखरखाव की जरूरतमहापुरुषों की प्रतिमाओं की साफ-सफाई केवल विशेष अवसरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए नगरीय निकायों को नियमित कार्ययोजना बनानी होगी। प्रतिमाओं की धुलाई, रंग-रोगन, टूट-फूट की मरम्मत, आसपास हरियाली, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था और साफ-सुथरे परिसर की व्यवस्था निरंतर होनी चाहिए।विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्येक नगरीय निकाय को अपने क्षेत्र में स्थापित सभी प्रतिमाओं का सर्वेक्षण कर एक व्यवस्थित रजिस्टर तैयार करना चाहिए। इसमें प्रतिमा का स्थान, स्थापना वर्ष, रखरखाव की स्थिति और जिम्मेदार अधिकारी की जानकारी शामिल हो। इससे किसी भी प्रतिमा की उपेक्षा लंबे समय तक छिपी नहीं रह सकेगी।महापुरुषों के सम्मान से जुड़ा है शहरों का सम्मानकिसी भी शहर की पहचान केवल उसकी चौड़ी सड़कों और ऊंची इमारतों से नहीं होती। उस शहर के चौराहों, स्मारकों और वहां स्थापित महापुरुषों की प्रतिमाओं से भी उसकी संवेदनशीलता और प्रशासनिक संस्कृति का परिचय मिलता है। ऐसे में नगरीय निकाय प्रशासन एवं विकास विभाग द्वारा शुरू की गई यह पहल केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक सम्मान से जुड़ा विषय है।अब देखना यह होगा कि सोनमणि बोरा के नेतृत्व में शुरू हुई यह सक्रियता कितनी व्यापक और स्थायी साबित होती है। यदि प्रदेश के सभी नगरीय निकायों में महापुरुषों की प्रतिमाओं और उनके परिसरों के नियमित रखरखाव के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाती है, तो आने वाले समय में यह पहल नगरीय प्रशासन की कार्यप्रणाली में एक सकारात्मक बदलाव के रूप में देखी जाएगी।संदेश साफ है—महापुरुषों का सम्मान केवल माल्यार्पण के दिन नहीं, बल्कि उनकी प्रतिमाओं की गरिमा बनाए रखने से भी होता है। और प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा के नगरीय निकाय प्रशासन एवं विकास विभाग की जिम्मेदारी संभालते ही शुरू हुई साफ-सफाई ने उम्मीद जगाई है कि अब उपेक्षित प्रतिमाओं को भी उनका उचित सम्मान मिल सकेगा।बड़ी बात : जिम्मेदारी संभालते ही संवेदनशील पहलनगरीय प्रशासन में बदलाव का मतलब केवल नई योजनाएं नहीं, बल्कि शहर की विरासत और महापुरुषों के सम्मान को प्राथमिकता देना भी है। सोनमणि बोरा के कार्यभार संभालते ही इस दिशा में शुरू हुई गतिविधियां सकारात्मक प्रशासनिक संदेश दे रही हैं।




