
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
देशभर में पेट्रोल के साथ 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी E20 पेट्रोल को लेकर वाहन मालिकों की चिंता लगातार बढ़ रही है। एक तरफ केंद्र सरकार वैज्ञानिक परीक्षणों और लंबे समय के फील्ड अनुभव के आधार पर E20 को सुरक्षित बता रही है, वहीं दूसरी तरफ वाहन चालकों की शिकायतें, ऑटोमोबाइल उद्योग के भीतर उठे सवाल और ईंधन में क्लोराइड व नमी की संभावित मिलावट ने पूरे मामले को गंभीर समीक्षा का विषय बना दिया है। सरकार के अनुसार E20 के कारण बड़े पैमाने पर इंजन फेल होने या वाहनों के असामान्य रूप से खराब होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है और देश में करोड़ों वाहन इस मिश्रण के साथ संचालित हो रहे हैं। दरअसल विवाद केवल इस बात का नहीं है कि एथेनॉल पेट्रोल के साथ मिलाने से इंजन खराब होता है या नहीं, बल्कि असली सवाल ईंधन की गुणवत्ता, पुराने वाहनों की अनुकूलता, माइलेज, ईंधन प्रणाली के पुर्जों और उपभोक्ता को मिलने वाले विकल्प का है। सरकार का दावा है कि E20 को लागू करने से पहले ARAI, SIAM, तेल कंपनियों और वाहन निर्माताओं के साथ व्यापक परीक्षण किए गए हैं तथा निर्धारित मानकों के अनुरूप E20 वाहनों के लिए सुरक्षित है। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है। अगस्त 2026 में सामने आई रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ प्रमुख वाहन निर्माताओं के आंतरिक संचार में E20 के कुछ नमूनों में क्लोराइड और नमी की मात्रा को लेकर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में उद्योग के आंतरिक परीक्षणों में कुछ स्थानों पर निर्धारित सीमा से अधिक संदूषण पाए जाने का उल्लेख है। हालांकि SIAM ने बाद में अपनी शिकायत वापस लेते हुए कहा कि उपलब्ध नमूना-आधार और आंकड़े निर्णायक निष्कर्ष के लिए पर्याप्त नहीं थे।यही वह बिंदु है जहां सरकार और उपभोक्ता के बीच पारदर्शिता सबसे ज्यादा जरूरी हो जाती है। यदि समस्या एथेनॉल की नहीं बल्कि दूषित या खराब गुणवत्ता वाले E20 पेट्रोल की है, तो फिर पेट्रोल पंपों पर मिलने वाले ईंधन की नियमित और स्वतंत्र जांच क्यों न हो? उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि वह जिस पेट्रोल के लिए पूरा पैसा दे रहा है, उसमें निर्धारित मात्रा में ही एथेनॉल है और उसमें नमी, क्लोराइड अथवा अन्य संदूषक निर्धारित सीमा से अधिक तो नहीं हैं।एथेनॉल स्वयं इंजन के लिए अपने आप में कोई नया या अनजान ईंधन नहीं है। भारत में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का उपयोग वर्षों से हो रहा है और सरकार के अनुसार E20 के व्यापक इस्तेमाल के बाद भी बड़े पैमाने पर इंजन क्षति का प्रमाण सामने नहीं आया है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं निकाला जाना चाहिए कि हर वाहन, हर उम्र का इंजन और हर परिस्थिति E20 के लिए समान रूप से अनुकूल है। पुराने वाहनों में लगे कुछ रबर सील, पाइप और अन्य ईंधन-प्रणाली के घटकों की एथेनॉल के उच्च मिश्रण के साथ अनुकूलता एक अलग तकनीकी मुद्दा है। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने भी पुराने दोपहिया वाहनों और उनके पुराने रबर सील को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए E10 जैसे कम एथेनॉल मिश्रण वाले विकल्प को E20 के साथ उपलब्ध कराने का सुझाव दिया है। माइलेज का सवाल भी आम वाहन मालिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एथेनॉल की ऊर्जा-सामग्री पेट्रोल से कम होती है, इसलिए समान परिस्थितियों में अधिक एथेनॉल मिश्रण से ईंधन दक्षता में कुछ अंतर आ सकता है। लेकिन किसी वाहन की माइलेज केवल पेट्रोल के मिश्रण पर निर्भर नहीं करती; वाहन का मॉडल, इंजन की तकनीक, ड्राइविंग शैली, टायर प्रेशर, ट्रैफिक, सर्विसिंग और ईंधन की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए हर माइलेज कमी को सीधे E20 के कारण इंजन खराब होने का प्रमाण मानना भी वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।सबसे गंभीर प्रश्न ईंधन की गुणवत्ता की निगरानी का है। सरकार ने भी E20 में क्लोराइड संदूषण को लेकर मानकों को और सख्त करने की दिशा में कदम उठाने की तैयारी की है। इसका सीधा अर्थ यही है कि ईंधन की गुणवत्ता पर निगरानी को और मजबूत किए जाने की आवश्यकता स्वीकार की जा रही है। ऐसे में जरूरत किसी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि स्वतंत्र और पारदर्शी वैज्ञानिक जांच की है। देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों के पेट्रोल पंपों से यादृच्छिक नमूने लिए जाएं, उनकी जांच सरकारी प्रयोगशालाओं के साथ स्वतंत्र मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से कराई जाए और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। साथ ही पुराने वाहनों, नए E20-अनुकूल वाहनों और अलग-अलग कंपनियों के इंजनों पर दीर्घकालीन अध्ययन कराया जाए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि समस्या वास्तव में E20 मिश्रण से है, ईंधन की गुणवत्ता से है, वाहन की उम्र से है या इन सभी कारकों के संयोजन से।उपभोक्ता को भी केवल अफवाहों के आधार पर भयभीत होने के बजाय अपने वाहन के निर्माता द्वारा निर्धारित ईंधन मानक की जानकारी लेनी चाहिए। वहीं सरकार और तेल कंपनियों की जिम्मेदारी इससे कहीं बड़ी है—यदि E20 सुरक्षित है तो उसके पक्ष में आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं और यदि कहीं गुणवत्ता संबंधी समस्या है तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाए।इस पूरे विवाद का निष्कर्ष यही है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर न तो बिना प्रमाण यह कहना उचित है कि “E20 सभी गाड़ियों के इंजन खराब कर रहा है”, और न ही उपभोक्ताओं की हर शिकायत को महज अफवाह बताकर खारिज किया जाना चाहिए। सरकार स्वयं E20 की सुरक्षा को वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रमाणित बताती है, जबकि हालिया उद्योग संबंधी रिपोर्टों ने ईंधन संदूषण की निगरानी को लेकर नए सवाल खड़े किए है।अब समय आ गया है कि पेट्रोल पंप पर उपभोक्ता को सिर्फ पेट्रोल ही नहीं, विश्वसनीयता और पारदर्शिता भी मिले। यदि E20 भविष्य का ईंधन है तो उसके प्रति जनता का विश्वास भी उतना ही मजबूत होना चाहिए। और यह विश्वास दावों से नहीं, बल्कि खुले आंकड़ों, नियमित जांच, पुराने वाहनों के लिए व्यावहारिक विकल्प और उपभोक्ता हित की स्पष्ट नीति से ही कायम होगा।




